इन दिनों : निर्लज्जता और लोकतंत्र 

"हर नेता कहता है कि मैं तो जनता का सेवक हूँ, लेकिन सच यह है कि वह जनता का शासक है। जीत के बाद सेवा का कोई मतलब नहीं होता। यह तो महज एक जुमला है।" - इसी आलेख से

बादल है। हवा भी ठंडी है, लेकिन टहलो तो पसीने भी आते हैं। राजनीति को मैंने गांधी के नजरिये से देखा है, चाणक्य के नजरिये से नहीं। गांधी की मृत्यु के बाद संवेदना, सहकार और सम्मान वाली राजनीति धीरे-धीरे ग़ायब हो गई और अब छल-छद्म वाली राजनीति है। चाहे जैसे भी हो, जीतो।

उत्तरी कोरिया में भी चुनाव होते हैं और वहाँ किम जोंग को 99.93 प्रतिशत वोट मिलते हैं। वहाँ लोगों को इस बात की तलाश है कि आख़िर . 07 में वे कौन से लोग हैं? किम जोंग के खिलाफ इतनी वोट पड़ना भी आश्चर्यजनक है। वहाँ चुनाव नहीं, चुनाव के साथ खिलवाड़ होता है। डर के साये में कोई अपना मत स्वतंत्र रूप से कैसे व्यक्त कर सकता है? बंगाल के चुनाव का ट्रेंड कुछ उसी क़िस्म का है। केंद्र सरकार ने डर को हथियार बना लिया है और सेना और उसके जेनरल को चुनाव में उतार दिया। ईडी तो वैसे भी कठपुतली बनी है। लोकतंत्र ग़ायब आहिस्ते-आहिस्ते होता है।

विपक्षी दलों के साथ निर्दयता से पेश आना- लोकतंत्र की  पराजय का पहला संकेत है।  बार-बार लोग कहते हैं कि लोकतंत्र लोक-लाज से चलता है, लेकिन लोक-लाज अब कमजोरों का लक्षण है। जिसके पास लोक-लाज है, उसकी पराजय निश्चित है। राजा घनानंद को अपदस्थ करने के लिए चाणक्य ने शिखा खोल दी थी। फिर उनकी चाणक्य नीति चली और घनानंद की जगह चंद्रगुप्त बैठाए गए। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री शिखा तो नहीं खोल सकते, लेकिन गाँठ ज़रूर बाँध ली है कि साम, दाम, दंड और भेद का सहारा लेकर बंगाल सरकार को हटाया जाए। बंगाल में कांग्रेस को हटा कर वाम मोर्चे की सरकार आयी और फिर वाम मोर्चे की सरकार को हटा कर तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी। यह प्रक्रिया अस्वाभाविक नहीं थी। जनता ने जिसको समर्थन दिया, उसकी सरकार बनी, लेकिन अभी केंद्र सरकार ने सारी सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग खुलेआम किया। 

हर नेता कहता है कि मैं तो जनता का सेवक हूँ, लेकिन सच यह है कि वह जनता का शासक है। जीत के बाद सेवा का कोई मतलब नहीं होता। यह तो महज एक जुमला है। लोकतंत्र के भीतर एक तानाशाह के उगने की तमाम संभावनाएं हैं। अगर वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सदय नहीं है और वह उसे  स्वायत्त ढंग से काम नहीं करने देता, तो सच मानिए कि उसके अंदर एक तानाशाही-चेतना है। जब भी अवसर आयेगा, किम जोंग उग जाएगा।

भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति- दोनों लोकतंत्र के रास्ते से ही आये हैं, लेकिन उनके मन में लोकतंत्र के लिए बहुत कम सम्मान है। उनके स्वभाव में व्यक्तिवादी प्रवृत्ति पाई जाती है। यहाँ तक कि ये लोग अपने मंत्रिमंडल को भी विश्वास में नहीं लेते। किसी से कोई सलाह मशविरा भी नहीं करते। एक दिन टेलीविज़न पर नमूदार होते हैं और एक हज़ार का नोट बंद करने की घोषणा करते हैं। दावा भी अजीबोग़रीब। काला धन वापस आयेगा और आतंकवादियों की कमर टूट जाएगी। दोनों में से कुछ नहीं हुआ और नोटबंदी के कारण लाइन में लग कर कई लोग मर गये। कोई शर्मिंदा नहीं हुआ। उल्टे दो हजरिया नोट चला दिया। कहा गया कि इसमें चिप्स लगी है। कोई भी शख़्स जमाख़ोरी नहीं कर सकेगा। जमाख़ोरी ने ऐसा तांडव मचाया कि दो हज़ार का चमचमाता नोट बाज़ार से ग़ायब हो गया।

अब प्रधानमंत्री से कौन पूछे? बुद्धिजीवी पूछ नहीं सकते, जनता की पहुँच खेतों-खलिहानों तक है। आजकल का तथाकथित लोकतंत्र लोकलाज से नहीं, लोकलाजहीनता और निर्लज्जता से चलता है।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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