इस कहानी को यहाँ सुन भी सकते हैं –
जॉन की नींद खुली तो उसने खिड़की से बाहर देखा। घना अंधेरा पेड़ों और मकानों को लपेटकर सोया हुआ था। सड़कों के किनारे के खंभों पर जुगनू की तरह टिटिमाते हुए लैंप बुझने की प्रतीक्षा में अपने को ही किसी तरह प्रकाशित रख पा रहे थे। वह उस कारख़ाने को नहीं देख पाया, जिसे दिन के उजाले में अच्छी तरह देख लेता था और जिसमें काम करने के लिए वह थोड़ी देर के बाद ही दाखिल होने वाला था।
अब उसने कमरे में देखा। उसकी बगल में लेटा हुआ उसका बड़ा बेटा टॉम बेसुध सो रहा था। जॉन को उस पर ममता उमड़ आयी कि इस कच्ची उम्र में ही उसे सोलह घंटे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है। वह ख़ुद हड्डियों की उस टूटन से परिचित था। इसीलिए टॉम सुबह पाँच बजे कारखाने में पहुँचने के लिए उठाने पर ‘ऊँ-आँ’ करके करवट बदलता रहता। जॉन अपने हिस्से की दिनचर्या से परिवार को बोझिल नहीं करना चाहता था। फिर भी एलिजा जागकर टॉम को जगाने और उन दोनों के लिए टिफिन तैयार करने में जल्दी से लग जाती थी। वही एलिजा बिस्तर के अंतिम सिरे पर सोयी थी। नींद में उसके कपड़े तितर-बितर हो गए थे और सिर भले ही तकिये पर था, लेकिन पाँव बिस्तर के बाहर निकलकर फर्श पर पसरे हुए थे। टॉम और एलिजा के बीच में छोटा बेटा नूह माँ के पेट पर हाथ डालकर सुकून से सोया हुआ था।
उसने घड़ी की ओर देखा। रात के तीन बज रहे थे।
वह नहीं चाहता था कि टॉम भी उसी की तरह सुबह के अँधेरे से रात के अंधेरे तक लोहों से लड़ता रहे। मगर कोई दूसरा चारा नहीं था। खेती के कामों में मजदूरी भी कम थी और वह काम भी सब दिन नहीं मिलता था। हालाँकि कारख़ाने की मजदूरी से भी घर नहीं चल पाता था। तभी तो सुपरवाइजर की न जाने कितनी चिरौरी करके वह टॉम को भी काम पर लगवा सका था। उसे बच्चा कहकर दूसरे लोगों से कम मजदूरी दी गयी। लेकिन काम उससे भी उतना ही लिया जाता, जितना पूरी मजदूरी पाने वालों से। फिर भी टॉम के काम पर लग जाने से दोनों शाम की रोटी और कपड़ा जुटा पाना आसान हो गया था। उसे बेसुध सोते टॉम पर प्यार उमड़ आया। ग्रीस और मोबिल सनी जींस और बाहों वाले टॉम को उसने प्यार से निहारा और आहिस्ते से उसके बालों को सहलाया, इतने आहिस्ते से कि कहीं उसकी नींद न खुल जाए। फिर उसने गहरी अंगड़ाई ली और बिस्तर छोड़ दिया। वह जल्दी से शौच से निवृत्त हो लेना चाहता था ताकि लंबी कतारों में खड़े होकर देर तक अपनी बारी की प्रतीक्षा न करनी पड़े। कुंडी खुलने की आवाज से एलिजा की नींद खुल गयी और बिस्तर छोड़ने के पहले ही वह टॉम को जगाने लगी – ‘टॉम, टॉम बेटा, जग जा। कारखाना जाने का समय हो गया है।’ सब दिन की तरह टॉम ने एक बार ‘ऊँ’ किया और करवट बदल ली।
जॉन जब तक शौचालय के पास पहुँचा, तब तक शौच के लिए कतारें लग गयी थीं। वह भी एक कतार में पहले से खड़े लोगों के पीछे खड़े होकर अपनी बारी के आने का इंतज़ार करने लगा। पहले के दिनों की तरह ही उस दिन भी उसने सोचा उसे थोड़ा और पहले उठ जाना चाहिए। जब तक शौच से निपटकर बाहर आया, टॉम भी लाइन में लग गया था।
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टॉम के हाथ में खाने की पोटली थी और वह तेज़ी से चलते हुए जॉन के पीछे लगभग दौड़ रहा था। पाँच बजे कारख़ाने का सायरन बज चुका था और आज भी वह देर से था। तीन दिन देर होने पर एक दिन की मजदूरी कट जाती थी। इसीलिए जॉन खीझ रहा था। टॉम पर अपनी खीझ उतारते हुए उसने कहा – ‘तुम्हारे ही चलते देर हो जाती है। सवेरे उठा नहीं जाता।’ सुबह जगते वक्त जो ममता उमड़ी थी, मजदूरी कटने की चिंता में वह तिरोहित हो गयी थी।
टॉम युवा था। उसके भीतर व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह भरा था। उसने भी पिता के प्रति अदब और खीझ में कहा – ‘पाँच बजे भी कहीं काम करने का वक्त होता है डैड! अभी तो चिड़ियाँ भी ठीक से नहीं उठी हैं। पाँच बजे से नौ बजे तक इतना काम करना पड़ता है कि इसके बाद दो-तीन दिन का आराम चाहिए देह सीधी होने के लिए। आप लोग जो पुराने-बड़े लोग हो, मालिक से बात ही नहीं करते हो कि इतनी देर काम तो जानवर भी नहीं कर सकते हैं।’
जॉन समझ गया कि टॉम आज भी खीझा हुआ है। गर्म खून है। बर्दाश्त नहीं कर पाता। कुछ दिन पहले सुपरवाइजर से उसकी झड़प हो गयी थी। वह उसे निकालने पर तुला था। लेकिन जॉन ने टॉम की तरफ़ से माफ़ी माँगकर और आरज़ू-मिन्नत करके सुपरवाइजर को मना लिया था। टॉम का गुस्सा कम करने के लिए किंचित शांत लहजे में उसने कहा – ‘मालिक को तो कहा ही जाता है। सोलह घंटे वह एक दिन केवल खड़े होकर देख ले तो पता चल जाए कि मजदूर इतनी देर कैसे काम करते होंगे। लेकिन कोई सुनने वाला है? काम का समय आठ घंटा करने के लिए हड़तालें भी होती हैं। इसके लिए कुछ ही दिन पहले न्यूयार्क में करीब दस हज़ार मजदूरों ने हड़ताल की और प्रदर्शन किए। लेकिन क्या हुआ? पुलिस की लाठियों और गोलियों ने उनकी माँगों को कुचलकर रख दिया। सरकार भी इन्हीं का साथ देती है। मजदूरों की कौन सुनता है? जहाँ-जहाँ मज़दूरों ने हड़तालें कीं, वहाँ-वहाँ पुराने मज़दूरों को हटाकर नये मज़दूर रख लिए गए। वह भी पहले से कम मजदूरी पर। ये बड़े लोग हैं। इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हमलोगों के भाग्य में इसी तरह जीना लिखा है।’
भाग्य की बात सुनकर टॉम तिलमिला गया। बोला – ‘नहीं डैड, यह भाग्य के चलते नहीं है, हमारे सहने के चलते है। अब फिर एक बड़ी हड़ताल होने वाली है। सभी कारखानों और मिलों के मज़दूर आठ घंटे काम की माँग को लेकर हड़ताल करेंगे। जब सब जगह एक साथ हड़ताल होगी, तब तो मालिकों को मानना ही पड़ेगा।’
जॉन ने भी ऐसा सुना था। कारख़ाने के भीतर मज़दूर इस बारे में बात करते थे। लेकिन सभी कारख़ानों के मज़दूर एक साथ हड़ताल कर देंगे, यह बात उसके गले नहीं उतरती थी। और, इस बात पर तो उसे तनिक भी यकीन नहीं था कि मालिक मज़दूरों की माँगें मान लेंगे। लेकिन प्रत्यक्ष उसने केवल इतना ही कहा – ‘देखते हैं, क्या होता है।’
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जॉन लोहा गलाने वाली भट्ठी में ख़ुद को झुलसाते हुए लोहे को गलने के लिए डाल रहा था। लोहे को गलाने वाली आग उसे इतना झुलसा रही थी कि उसे रह-रहकर पीछे हटना पड़ता था। फिर साहस करके आगे बढ़ता और कुछ लोहे फिर भट्ठी में डालकर पीछे हट जाता। पूरे समय उसे यही करना होता था। तभी हेनरी ने फुसफुसाकर उसे कहा – ‘सुना है, परसों से बड़ी हड़ताल होने वाली है।’
जॉन ने पूछ – ‘क्यों?’
हेनरी ने जवाब दिया – ‘वही, आठ घंटे काम को लेकर।’
जॉन ने फिर पूछा – ‘क्या यह पहली हड़ताल है या अंतिम हड़ताल है? पिछली हड़तालों से कुछ बदला है क्या? यही हुआ है कि कुछ मज़दूर नेताओं को काम से हटाकर नये मज़दूर रख लिए गए। इस बार भी यही होगा।’ जॉन का निराश अनुभव बोल रहा था।
‘नहीं। यह हड़ताल पिछली हड़तालों जैसी नहीं होगी। सुना है कि इसमें ग्यारह हज़ार कारखानों और मिलों के लाखों मजदूर एक साथ भाग लेंगे। यह भी सुना है कि जब तक मालिक आठ घंटे काम करने की माँग मान नहीं लेते, तब तक हड़ताल जारी रहेगी। कोई काम पर नहीं लौटेगा।’
मालिकों के सामने लगातार हारते रहने का इतिहास उसे यह मानने से रोक रहा था कि मालिक आठ घंटे काम की उनकी माँग को मान लेगा। इसलिए हेनरी से भी उसने इतना ही कहा – ‘देखते है, क्या होता है।’
उसी कारख़ाने के दूसरे सिरे पर टॉम ग्रीस और मोबिल से लथपथ हार्वेस्टर के कल-पुर्जों को जोड़ रहा था। चूते हुए पसीने को पोंछने के कारण उसका चेहरा ग्रीस से पुत गया था और उसे पहचानना कठिन हो गया था। लेकिन रोज़ ऐसा होते-होते वह इसका अभ्यस्त हो गया था। तभी माइकल ने धीमी आवाज में उससे कहा – ‘टॉम, 1 मई से हड़ताल होनेवाली है। सुना है तुमने?’
‘हाँ माइकल। इस बार हम किसी तरह झुकेंगे नहीं। अपने बदले में किसी नये मज़दूर को काम पर आने भी नहीं देना है। इस बार हमें जीत हासिल करनी ही है।’ – टॉम के स्वर में उत्साह था। ऐसा उत्साह, जैसे पूरी हड़ताल की रूपरेखा उसके सामने हो।
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1 मई को मजदूरों के सैलाब से शिकागो सहम गया। कारखानों ने धुआँ उगलना बंद कर दिया था और ट्रेनें जहाँ-की-तहाँ खड़ी रह गयीं। शहर ठहर गया। सड़कों पर और गलियों में केवल हवा में लहराती हुई मुट्ठियाँ दिख रही थीं और आकाश को चीरते हुए नारे सुनाई दे रहे थे। मजदूरों के पदचाप से धरती धमक रही थी और धूल धुआँ बनकर आसमान में छा गयी थी। जॉन भी उस जुलूस का हिस्सा था और टॉम तो जैसे मजदूरों का नेता ही बन गया था। शोषण की भट्ठी में उबलते-उबलते उसके शब्द लावा बन गए थे। आग के गोलों की तरह निकलते हुए उसके शब्द और छाती के पूरे जोर से लगाए गए उसके नारों से मजदूरों का उत्साह मचल-मचल जाया करता था। उसने इस हड़ताल को जैसे जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया था।
मजदूरों ने माँगें पूरी होने तक काम न करने का संकल्प लिया था। सारे कारख़ाने बियाबान हो गए थे। लेकिन मैककार्मिक कारख़ाने ने कल होकर नए मज़दूरों को बहाल कर लिया। यह वही मैककार्मिक था, जहाँ जॉन रोज़ आग में झुलसता था और टॉम रोज ग्रीस-मोबिल से लथपथ होता था। कल होकर मैककार्मिक के बाहर वाले मैदान में सभा करने और नए मज़दूरों को काम से रोकने का निर्णय हुआ।
3 मई को मैककार्मिक के बाहर मैदान में विशाल सभा आयोजित हुई। मजदूरों का एक जत्था कारखाने के गेट पर नये मजदूरों को कारखाने में दाखिल होने से रोक रहा था। कारख़ाने के मालिक ने पुलिस के अधिकारियों से शिकायत की कि आंदोलनकारी मज़दूर कारख़ाने में तोड़फोड़ कर रहे हैं। टॉम भाषण देकर उतारा था और ऑगस्ट स्पाइस का भाषण चल रहा था। स्पाइस मजदूरों की एकजुटता, न झुकने और माँगें पूरी होने तक काम पर न लौटने का आह्वान कर रहा था।
तभी सैकड़ों पुलिस की टुकड़ी वहाँ आ धमकी और बिना किसी चेतावनी के लाठियाँ और गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। चार मजदूरों को मारकर और सैकड़ों को घायल करके पुलिस सभा को भंग करने और भीड़ को तितर-बितर करने में कामयाब हुई।
पुलिस की गोलियों ने मजदूरों की देह को तो ठंडा कर दिया, मगर उनके संकल्प को और भड़का दिया। इधर कुछ मज़दूर अपने प्रिय साथी का अंतिम संस्कार कर रहे थे और उधर हजारों मजदूर ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम’, ‘हर ज़ोर-जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ के गगनभेदी नारे लगा रहे थे। अंतिम संस्कार समाप्त होने पर टॉम आगे आया और हाथ उठाकर ग़ुस्से में उबलते मज़दूरों को शांत कराकर घोषणा की – ‘कल शाम में साढ़े सात बजे हेमार्केट में हमारी सभा होगी। सभी मजदूर हौसला बनाये रखें। संघर्ष चाहे जितना हो, अंतिम जीत हमारी होगी। यह हमारी अंतिम लड़ाई है। इस बार यदि हम पीछे हट गए तो फिर कभी हमें अपना हक़ हासिल नहीं हो सकेगा।’ सामने खड़े किसी मजदूर ने पूरी ताकत के साथ नारा लगाया – ‘मजदूर एकता—।’ सामने खड़ी भीड़ के ‘ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद’ ने आसमान को हिला दिया।
देर रात टॉम जब घर लौटा तो जॉन और एलिजा व्यग्रता से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। माँ ने झटपट उसके लिए खाना लगा दिया। जॉन और एलिजा ने भी खाना नहीं खाया था। वे भी साथ ही खाने बैठे। जॉन ने बात छेड़ी – ‘जानती हो एलिजा, टॉम आज सबके आगे-आगे चल रहा था। इसकी बातों को सुनने के लिए मजदूर उमड़ पड़ते थे। लेकिन मुझे डर लगता है। पुलिस और मालिक की पहचान में यह आ गया है।’ एलिजा जानती थी। टॉम के आने के पहले ही जॉन एलिजा को टॉम के ही किस्से सुना चुका था। जॉन को टॉम का इस तरह उभरना अच्छा तो लग रहा था, मगर उसकी सुरक्षा की चिंता भी सताए जा रही थी। इसीलिए टॉम के आने के पहले उसने एलिजा से अनुरोध किया था कि वह टॉम को समझाए कि वह पुलिस और मालिक की नज़र में न आए।
एलिजा ने प्यार से उसे सहलाकर कहा – ‘बेटा, ये पुलिसवाले बड़े निर्दयी होते हैं। कोई ऐसा काम न करो कि वे तुम्हें नज़रों में चढ़ा लें।’
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टॉम माता-पिता की भावनाओं को समझ गया था। उसने शालीनता से कहा – ‘मॉम, मैं ऐसा कोई काम नहीं कर रहा हूँ, जो अपराध हो। अपराध तो पुलिसवाले कर रहे हैं निहत्थे, बेक़सूर, ग़रीब और अपनी जायज माँगें करते हुए मज़दूरों पर गोलियाँ-लाठियाँ चलाकर। मॉम, किसी को तो इस शोषण के ख़िलाफ़ बोलना ही पड़ेगा न! अगर सभी लोग डरकर चुप रहेंगे तो यह शोषण कैसे खत्म होगा?’
जॉन और एलिजा के पास कोई जवाब नहीं था। वे चुपचाप खाना खाते रहे।
कल होकर दोपहर से ही अविराम वर्षा शुरू हो गयी। साढ़े सात बजे भी झमाहम बारिश हो रही थी। फिर भी हजारों मजदूर हेमार्केट में इकट्ठा हुए। बारी-बारी से नेताओं के भाषण हो रहे थे। सभी मजदूरों से एकता और हिम्मत बनाए रखने की अपील कर रहे थे। टॉम भी खड़ा हुआ। अब वह मज़दूरों का प्रिय नेता था। उसने भाषण दिया – ‘कॉमरेड्स, यदि हम थोड़ा बर्दाश्त करेंगे और संघर्ष करेंगे तो उसके बदले इतना कुछ पाएंगे कि इतिहास याद रखेगा। यदि हमारे घरों में चूल्हे नहीं जलेंगे तो मालिकों का भी लाखों का नुक़सान होगा। हम भूखे रहने और आधा पेट खाकर जीने के आदी हैं। लेकिन मालिक को घाटा सहने की आदत नहीं है। वह जल्दी ही घुटने टेकेगा। फिर शोषण का अंत होगा और जीत हमारी होगी। वह दिन जल्दी ही आने वाला है, हमें जितनी उम्मीद है, उसके पहले ही। …..’
मजदूरों की भीड़ में अपने बेटे को बोलते देखकर जॉन गर्व का अनुभव कर रहा था। उसकी इतनी उम्र हो गयी, लेकिन आज तक वह बोला नहीं था। केवल सुनते आया था – कभी मालिक का तो कभी नेता का। उसे कभी पता ही नहीं चला कि कब उसका बेटा मज़दूर से मजदूरों का नेता हो गया। कितना मुग्ध होकर लोग उसकी बातें सुन रहे थे और हरेक बात पर तालियाँ बजा रहे थे और ‘मजदूर एकता, ज़िंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे। उसे अपने बेटे पर प्यार उमड़ आया और इच्छा हुई कि आगे बढ़ाकर उसे भींचकर छाती से लगा ले। तभी रोबदार ऊँची आवाज ने सब कुछ भंग कर दिया – भाषण भी, मजदूरों का उत्साह भी और बेटे के प्रति जॉन के उमड़ते प्रेम को भी। ‘पाँच मिनट में यह जगह ख़ाली करो, नहीं तो पुलिस कार्रवाई करेगी।’ जॉन ने पीछे मुड़कर दखा। पुलिस के सैकड़ों जवान बन्दूकें ताने खड़े थे। किसी अनहोनी के डर से उसका कलेजा काँप गया।
मंच से लगातार अपील की जा रही थी – ‘हमलोग शांतिपूर्ण सभा कर रहे हैं। इससे किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।’ तभी एक बड़ा धमाका हुआ। आग की लपटें उठीं और धुएँ ने पूरे वातावरण को निगल लिया। फिर गोलियों की ‘ठाएँ-ठाएँ’।
जॉन के भी पैर में गोली लगी थी। लेकिन अब उसे अपने बेटे की परवाह थी। अपने को घसीटते हुए वह जल्दी से मंच तक पहुँचना चाहता था, जहाँ उसका बेटा थोड़ी देर पहले खड़ा होकर बोल रहा था। रास्ते में सैकड़ों लोग पड़े थे – कुछ छटपटाते हुए, कुछ बिल्कुल निस्पंद। लेकिन उसके पहुँचने के पहले ही मजदूरों के एक जत्थे ने अपने प्रिय नेता को उठा लिया था। वे गोलियों से छिदी और ख़ून से लथपथ टॉम की क़मीज़ को हवा में लहरा-लहराकर नारे लगा रहे थे – ‘हम तुम्हारे संकल्पों को मंजिल तक पहुँचाएँगे’, ‘सीने पर गोली खायेगे, पर हार नहीं हम मानेंगे’ … । जॉन ने देख, मजदूरों के दिल-दिमाग़ से बंदूकों का डर खत्म हो गया था। वे पिछले दिन की तरह तितर-बितर नहीं हुए थे, बल्कि वहीं डटे थे, पूरे जोश से। अब बन्दूकें और लाठियाँ उन्हें डरा नहीं पा रही थीं। मजदूरों के इस तेवर को देखकर पुलिस पीछे हट गयी। तभी जॉन ने देखा किसी मज़दूर के मज़बूत कंधे पर टॉम औंधा लटका हुआ था। उसके हाथ-पैर झूल रहे थे और वह निस्पंद था। धुएँ के अँधेरे में किसी गोली ने उसके कलेजे को चीर दिया था। अपने कलेजे के टुकड़े को इस तरह लटका देखकर जॉन ग़श खाकर गिर पड़ा।
बीस साल गुज़र गए। पैर में गोली लगने के कारण जॉन कारखाने में काम करने लायक नहीं रह गया था। वह सड़क के किनारे सब्जी बेचने लगा था। उसका छोटा बेटा अब मैककार्मिक में ही काम करता है, जहाँ काम करने कभी वह और टॉम एक साथ जाया करते थे। लेकिन वह नौ बजे कारखाने में जाता है और शाम पाँच बजे लौट जाता है।
उस दिन 1 मई थी। बूढ़ा जॉन अपने पोते को गोद में लेकर घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठा था। उसके सामने से नारे लगाती हुई जुलूस निकल रही थी। उन नारों में एक नारा यह भी था – ‘कामरेड टॉम, ज़िंदाबाद!’ बूढ़े जॉन की आँखें डबडबा गयीं। उसने मन-ही-मन सोचा – ‘Martyrs never die’!

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।








यह कहानी नहीं क्रांति संदेश है, जो यह बताता है कि अपने हक़ और हकूक की लड़ाई में लोग शहीद हो अमर हो जाते हैं ।टॉम आज भी ज़िंदा है हर कामरेड, हर मजदूर के दिल में।