प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हाल में पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेश यात्राएँ टालने, सोने की खरीद घटाने और “वर्क फ्रॉम होम” को फिर अपनाने की अपील केवल नैतिक संदेश नहीं है; यह भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का संकेत भी माना जा सकता है। यदि इन अपीलों को केवल “देशभक्ति” के दायरे में देखा जाए, तो आर्थिक यथार्थ छूट जाएगा। आँकड़े बताते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था इस समय कई मोर्चों पर दबाव में है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। पेट्रोलियम मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के अनुसार भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85-88 प्रतिशत आयात करता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का पेट्रोलियम आयात बिल लगभग 158 से 165 अरब डॉलर के बीच रहा। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत के आयात बिल पर अनुमानतः 13 से 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की कीमत पर पड़ता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार मई 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 640 अरब डॉलर के आसपास बना हुआ है। पहली नजर में यह मजबूत दिखता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत का मासिक आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। केवल पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और सोने के आयात पर ही हर महीने अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं। रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होकर 1 डॉलर के मुकाबले 95 रुपये के स्तर को पार कर चुका है। 2014 में यही दर लगभग 58-60 रुपये थी। यानी 12 वर्षों में रुपया 60 प्रतिशत से अधिक कमजोर हुआ है। इससे आयातित वस्तुएं महंगी होती गईं। पश्चिम एशिया संकट का असर भी गंभीर है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में ब्रेंट क्रूड जहाँ 78-80 डॉलर प्रति बैरल था, वहीं अप्रैल-मई तक यह 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँच गया। भारत में इसका असर तुरंत एलपीजी, एटीएफ और परिवहन लागत पर दिखाई देने लगा।
सरकार का दावा है कि देश के पास पर्याप्त ऊर्जा भंडार है, लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री स्वयं ईंधन बचत की अपील कर रहे हैं। यहीं से राजनीतिक प्रश्न उठते हैं? यदि स्थिति नियंत्रित थी, तो जनता से अचानक इतनी बड़ी मितव्ययिता की माँग क्यों की जा रही है? सरकारी खर्च के आँकड़े भी बहस का विषय हैं। वर्ष 2014 से 2026 के बीच प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व की चुनावी सभाओं, सरकारी आयोजनों, विदेश यात्राओं और प्रचार अभियानों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की विभिन्न रिपोर्टों और संसदीय जवाबों के अनुसार: 2014 से 2024 के बीच केंद्र सरकार ने केवल विज्ञापन और प्रचार पर 6,500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। प्रधानमंत्री के लिए खरीदे गए दो विशेष वीवीआईपी विमान लगभग 8,400 करोड़ रुपये की लागत से आए। जी-20 आयोजन पर केंद्र और राज्य सरकारों को मिलाकर लगभग 4,100 करोड़ रुपये खर्च होने के अनुमान सामने आए। 2024-26 के चुनावी दौर में बड़े राजनीतिक दलों ने हेलीकॉप्टर, चार्टर्ड विमानों और डिजिटल प्रचार पर रिकॉर्ड खर्च किया। यानी जिस समय जनता से पेट्रोल बचाने को कहा जा रहा है, उसी समय राजनीतिक और सरकारी गतिविधियों में ईंधन आधारित खर्च कम होने के संकेत नहीं दिखते। प्रधानमंत्री तेल बचाने और विदेश यात्राओं से बचने की अपील करके ख़ुद विदेश यात्राओं पर निकल जाते हैं।
आर्थिक दबाव का असर आम लोगों की जिंदगी पर पहले से दिख रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय और श्रम सर्वेक्षणों के अनुसार: शहरी बेरोजगारी दर 7-9 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। युवाओं (15-29 आयु वर्ग) में बेरोजगारी कई राज्यों में 20 प्रतिशत से ऊपर है। खुदरा महंगाई दर लगातार 5-6 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। खाद्य महंगाई कई महीनों में 8 प्रतिशत से ऊपर पहुँची।
रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 2014 की तुलना में दोगुनी से अधिक हो चुकी है। खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले पाँच वर्षों में 40-70 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। प्रधानमंत्री ने खाना पकाने के तेल में 10 प्रतिशत कटौती की बात कही, लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़े बताते हैं कि भारत में पहले से ही बड़ी आबादी पोषण संकट और महंगे खाद्य पदार्थों से जूझ रही है। ऐसे में उपभोग घटाने की अपील स्वास्थ्य और जीवन स्तर दोनों पर असर डाल सकती है।
सोने की खरीद रोकने की अपील भी आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से जटिल है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 25,000 टन से अधिक सोना मौजूद है। ग्रामीण भारत में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि अनौपचारिक “सुरक्षा पूँजी” माना जाता है। शादी-ब्याह और स्त्रीधन की परंपरा में इसकी बड़ी भूमिका है। ऐसे में सोना न खरीदने की अपील सीधे सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने वाली बात बन जाती है। इसी बीच शेयर बाजार में गिरावट ने भी चिंता बढ़ाई है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, तेल कीमतों में उछाल और रुपये की कमजोरी के कारण बाजार में अस्थिरता बढ़ी। इसका सबसे बड़ा असर छोटे निवेशकों और मध्यमवर्गीय बचतकर्ताओं पर पड़ता है, जिनकी एसआईपी और रिटायरमेंट बचत बाजार से जुड़ी होती है। ऐसे समय में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आर्थिक संकट का बोझ कौन उठाएगा? क्या केवल आम नागरिक अपनी खपत घटाकर अर्थव्यवस्था बचायेंगे या सरकार भी गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करेगी? क्या राजनीतिक रैलियों, भव्य आयोजनों, विज्ञापन अभियानों और वीवीआईपी संस्कृति पर अंकुश लगेगा?
1965 के संकट में लाल बहादुर शास्त्री ने जनता से त्याग की अपील की थी, लेकिन स्वयं भी सादगी और अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत किया था। आज जनता भी शायद वही देखना चाहती है—साझा जिम्मेदारी, केवल एकतरफा उपदेश नहीं।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







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