सुबह-सुबह आकाश बादलों से लद रहे हैं। रात में भी तेज हवा और हल्की बारिश हुई। यों तो डकैती और चोरी में फ़र्क़ होता है, लेकिन आजकल चोरी से बात शुरू होती है और डकैती पर ख़त्म होती है। तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर पहले बिहार के राज्यपाल थे। अपने कार्यकाल में एक भी ढंग का कुलपति नियुक्त नहीं कर सके। उनके नाम यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे याद किया जा सके। तमिलनाडु में केंचुआ बन कर लोकतंत्र पर धब्बा लगा रहे हैं। बीजेपी के किसी नेता के अंदर लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए सम्मान नहीं है। क़सम संविधान की खाते हैं, लेकिन संविधान को बर्बाद करने के लिए हर वक़्त तत्पर रहते हैं।
अर्लेकर को इतनी बात समझ में नहीं आती कि विधानसभा के पटल पर बहुमत सिद्ध करना होता है, राज्यपाल के घर पर नहीं। लोकतंत्र में अल्पमत की सरकार भी चलती है। नरसिम्हा राव की सरकार उसका उदाहरण है। अटल बिहारी वाजपेयी को भी बहुमत नहीं था, लेकिन बड़े दल होने के कारण उन्हें प्रधानमंत्री की शपथ दिलवाई गई थी। कर्नाटक के यदुरप्पा को भी इसी कारण शपथ दिलाई गई, क्योंकि उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी। फिर तमिलनाडु में टीवीके के विजय को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से क्यों रोका जा रहा था?
कहा जाता है कि लोकतंत्र लोकलाज से चलता है। लेकिन अब लोकलाज की बात करने का कोई मतलब नहीं है। सांप्रदायिक आधार पर जिसने वोट मांगे और निर्लज्ज भाषा का इस्तेमाल किया, सच पूछिए तो उसे जेल में रहना था, लेकिन बंगाल और असम के मुख्यमंत्री बन रहे हैं। हेमंत बिस्वा सरमा और शुभेंदू अधिकारी को इसलिए नेता बनाया जा रहा है, क्योंकि वे खुलेआम हिंदू-मुसलमान करते हैं और आरएसएस और बीजेपी के एजेंडे पर काम करते हैं। बंगाल के बुद्धिजीवी लिख रहे हैं कि शुभेंदु अधिकारी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की तरह सॉफ्ट लाइनर हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि वे अल्पसंख्यकों के प्रति सॉफ्ट रहेंगे, जैसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी रहे। श्यामाप्रसाद मुखर्जी आज़ादी आंदोलन के खिलाफ रहे और वे स्वतंत्रता सेनानियों को पकड़वाने का काम करते थे।
आप सॉफ्ट और हार्ड की बात मत कीजिए। आपने संविधान की शपथ खाई है। संविधान के तहत काम कीजिए। जो संविधान के तहत काम नहीं करता है, उसका व्यवहार चाहे जितना सॉफ्ट हो, वह कम ख़तरनाक नहीं है। बीजेपी के नेता लगातार ऐसे दुष्कृत्यों में संलग्न हैं, जिससे देश की उलझनें बढ़ती जा रही हैं। बंगाल में जो कुछ हुआ, उसे सही सिद्ध करने के लिए तथाकथित बुद्धिजीवी यह कह रहे हैं कि ममता बनर्जी अलोकप्रिय हो गई थी। अगर वह अलोकप्रिय थीं तो ढाई लाख सेना उतारने और 27 लाख वोटरों को मतदाता सूची से बाहर निकालने की क्या ज़रूरत थी? बंगाल में वैसी 77 सीटें जिन पर मुस्लिम आबादी बहुमत में है, उस पर बीजेपी आसानी से जीतती है। दरअसल बीजेपी ने वोट लूट और वोट चोरी दोनों किया है।
जो लोग ऐसे कुकृत्य का समर्थन कर रहे हैं, उसे भारतीय फासीवाद की विशेषताओं पर भी किताब लिखनी चाहिए और जो समय है, इसमें यह किताब बेस्ट सेलर किताब का दर्जा प्राप्त कर सकती है। बहुत से बेरोजगार युवक टौआए फिर रहे हैं। उन्हें रोज़गार चाहिए। ऐसे महान बुद्धिजीवी उनके लिए रोज़गार उपलब्ध करवा सकते हैं। हर्षवर्धन त्रिपाठी नामक एक शख्स है, जो चैनलों पर प्रवक्ता बन कर आता है। पता नहीं, उसे चैनल वाले क्यों बुलाते हैं? उसने लफ़ंगों द्वारा लेनिन की मूर्ति ढहाने फरमाया कि बंगाल में लेनिन की मूर्ति की ज़रूरत क्यों है? सावरकर-गोडसे को भले ज़रूरत नहीं हो, बुद्ध, गांधी, लेनिन, मार्क्स आदि तो वैश्विक धरोहर हैं। ज्ञान और विवेक सीमाओं में नहीं बँधते, लेकिन टुच्चे लोगों ने देश में कुहराम मचा रखा है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं। ‘लोकजीवन’ का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







