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काफ़ी शोर-शराबों के बावजूद संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होते-होते ग्रामीण रोजगार की गारंटी वाले ‘मनरेगा’ (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) को विस्थापित करके ‘वीबी जी राम जी’ (विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)) को दोनों सदनों से पास कर दिया गया। लोकतंत्र का चेक एंड बैलेंस पॉवर (विपक्ष) विरोध करता रहा, अतिरेक तक जाकर बिल की प्रतियों को फाड़-फाड़कर विरोध दर्ज कराने की कोशिश की। इसके बाद भी जब उसे लगा कि न तो उसकी बात मानी जा रही है, न ही सुनी जा रही है, जेपीसी को भेजने तक की बात भी नहीं, अर्थात् संसद के भीतर उनकी आवाज का कोई मतलब ही नहीं है तो मकर द्वार पर उन्होंने धरना भी दिया। सब कुछ किया, जो संसद की चहारदीवारी के भीतर किया जा सकता था। लेकिन सारे तर्क, आवाज़ और प्रयास बेअसर रहे और सुबह होते-होते, शब्द के रूप में ‘गारंटी’ को बिना छेड़े हुए, ग्रामीण श्रमजीवियों की सुरक्षा से संबंधित सबसे बड़े क़ानून को आजीविका मिशन में बदल दिया गया।
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गांधी के नाम का विस्थापन
मीडिया में इसकी खूब खबरें छपीं। ज्यादातर खबरें 100 दिनों को 125 दिन किए जाने की और फिर गांधी के नाम के विस्थापन की। जिस संगठन का संबंध गांधी के हत्यारों से रहा हो और जिस संगठन के नेता आज भी गांधी के चित्र को सामने रखकर प्रतीकात्मक हत्या का सिलसिला जारी रखे हुए हो, जो इतिहास से गांधी को गायब करने की कोशिश करता हो, उस संगठन की सरकार के द्वारा नाम का विस्थापन अचरज की बात नहीं है। गांधी की अहिंसा और सत्य आज भी उसके कलेजे में शूल की तरह चुभते हैं। गांधी के नाम को विस्थापित करके एक ओर तो उसने कलेजे के शूल को कम करने की कोशिश की है, दूसरी ओर देश में आद्यंत-व्यापी इस योजना से गांधी का नाम हटाकर लोगों के ज़ेहन में बसे गांधी की स्मृति को कमज़ोर करने की कोशिश भी है।
नए कानून का नाम
दूसरी ओर इस योजना का नया नाम भी गौर करने वाला है – ‘वीबी जी राम जी’। भाजपा के एजेंडा को देखते हुए सहज ही समझा जा सकता है कि यह संक्षिप्तीकरण महज संयोग नहीं है, बल्कि उसके विशेष सामाजिक अभिप्राय का सायास परिणाम है; मानो गोला बनाकर तीर नहीं चलाया गया हो, बल्कि तीर पहले से गाड़कर उसके चारों ओर गोला बनाया गया हो। असंभव नहीं है कि ‘राम जी’ शब्द पहले तय किया गया हो और फिर उसके अनुसार योजना के लिए शब्द खोजे गए हों। ‘राम’ भाजपा के राजनीतिक हथियार हैं। तो योजना में ‘राम जी’ शब्द से दो उद्देश्य एक साथ सधते हैं – गांधी के विस्थापन का प्रयास और अपने राजनीतिक एजेंडा की स्थापना की कोशिश।
‘कहऊँ नाम बड़ ब्रह्म राम तें।’ भगवान राम से उनका नाम बड़ा है। क्योंकि राम ने तो केवल अहल्या का उद्धार किया, नाम ने तो करोड़ों दुर्जनों का उद्धार किया है। इसलिए ‘चहू चतुर कहँ नाम अधारा।’ सभी प्रकार के चतुरों के लिए नाम सहारा है। प्रसंग से विस्थापित यह क्षेपक विधेयक की सांप्रदायिकता के प्रेरक तत्व की समझ प्रदान करता है।
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बजट में कटौती की योजना
ग्रामीण रोजगार की इस योजना को बदलने का एक अभिप्राय बजट में कटौती करना भी है। भले ही इस बिल में पहले के 100 दिनों के रोजगार की गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन करने का दिखावा किया गया है, जिसको सत्तापक्ष बार-बार बता रहा है। परंतु वह यह नहीं बता रहा है कि विधेयक की धारा 22(2) के अनुसार “इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच निधि-साझेदारी का अनुपात —- 60:40 रहेगा।” उत्तर-पूर्वी राज्यों, पर्वतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा। पहले के मनरेगा में केंद्र सरकार श्रम घटक का 100 प्रतिशत और सामग्री घटक का 75 प्रतिशत वहन करती थी। यह अगला प्रश्न है कि राज्य सरकारें अपने ऊपर थोपे गए इस अतिरिक्त व्यय-भर का वहन करने में कितना समर्थ होगी और कितनी रुचि दिखाएगी, तब, जबकि सारे नियंत्रण केंद्र के पास हों। लेकिन इतना तो ज़ाहिर हो ही जाता है केंद्र ने व्यय के अनुपात की नयी व्यवस्था के द्वारा अपने ऊपर के आर्थिक बोझ को कम करने की कोशिश की है।
वर्तमान केंद्र सरकार इस योजना को भार समझती रही है। यही कारण है कि इसके बजट में लगातार कटौती की जाती रही है। वर्ष 2020-21 (कोरोना के समय) के बजट में जहाँ इसके लिए 1,11,170 करोड़ का प्रावधान किया गया था, वह लगातार घटते हुए क्रम में 2021-22 में 98,000 करोड़, 2022-23 में 90,810 करोड़, 2023-24 में 89,286 करोड़, 2024-25 में 86,000 करोड़ और 2025-26 में भी 86,000 करोड़ रह गया है। यह भी गौरतलब है कि मनरेगा के तहत मिलने वाले काम के 100 दिनों को व्यवहार में लगातार कम किया जा रहा है। (देखें नीचे का चार्ट) और अब तो उसने अपना 40% वित्तीय भार भी कानूनी रूप से राज्यों के कंधों पर डाल दिया है।

(सौजन्य : PRS Legislative Research)
केंद्र सरकार के द्वारा अपने वित्तीय भार को कम किए जाने के कारण को अनेक विश्लेषक अनेक दृष्टियों से देख रहे हैं, जिनमें दो प्रमुख नजरिया अधिक ध्यान आकृष्ट करते हैं। पहला तो वर्तमान सरकार की कॉर्पोरेट परस्त प्रवृत्ति, जिसमें पूँजीपतियों के लिए नीतिगत और व्यावहारिक रूप से अनुकूल व्यवस्था की जाती है और बाक़ी लोगों के लिए विरोध रोकने या वोट देने तक का इंतजाम किया जाता है। दूसरा, अपनी नीतियों और अंतर्राष्ट्रीय कारणों से वित्तीय स्थिति का कमजोर होना, जिसे इस सरकार को स्वीकारने में लाज लगती है। इसीलिए इस व्यवस्था के द्वारा व्यय-भार को कम करने की नकारात्मक कोशिश की गई है। नकारात्मक इसलिए, क्योंकि रोजगार के अवसर को कम करने का अर्थ अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचती है।
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कौन-कौन से काम कराए जाएँगे?
योजना चार बड़े सेक्टर पर फोकस करेगी:
- पानी से जुड़ा काम, जैसे तालाब, जल संरक्षण, सिंचाई से जुड़े स्ट्रक्चर
- गाँव की सड़कें, कनेक्टिविटी और दूसरी बुनियादी सुविधाएँ
- आजीविका से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे स्टोरेज, मार्केट, प्रोडक्शन से जुड़े ढाँचे
- मौसम और जलवायु से होने वाले नुकसान (बाढ़, सूखा आदि) से बचाव वाले काम
इन सभी के तहत बनने वाले एसेट्स को एक बड़े डिजिटल स्ट्रक्चर में जोड़ा जाएगा, जिसे विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक (Vikshit Bharat National Rural Infrastructure Stack) कहा गया है।
इनमें से अधिकांश कार्य इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कार्य हैं और अनेक कार्य हैं, जो पूँजीपतियों के हितों के हैं। इसका मतलब यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मुनाफा कमाने के उद्देश्य से पूँजीपतियों के द्वारा किए जाने वाले कार्यों को सरकार के द्वारा भुगतान किए जाने वाले श्रमिक मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएँगे।
नए क़ानून के किंतु-परंतु
मनरेगा के 100 दिन काम को नए बिल में 125 दिन किए जाने का प्रावधान बाहरी तौर से देखने पर रुचिकर लग सकता है, लेकिन उसके साथ ‘किंतु-परंतु’ लगा हुआ है। इसकी धारा 5(1) के अनुसार “जहाँ अन्य का प्रावधान न हो, राज्य सरकार केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले राज्य के ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में, हर उस परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल श्रम करने के लिए स्वेच्छा से आगे आते हैं, इस अधिनियम के अंतर्गत बनायी गई योजना के अनुसार किसी वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 125 दिनों का गारंटीकृत रोजगार प्रदान करेगी।” अर्थात् क्षेत्रों को चिह्नित और अधिसूचित करने का कार्य केंद्र सरकार करेगी और उसे लागू करने की जवाबदेही राज्य सरकार की होगी। ‘मनरेगा’ की अनिवार्य व्यवस्था को समाप्त कर चयनात्मक व्यवस्था को लागू किया गया है। बहुत ज़्यादा संभावना है कि केंद्र इसके लिए अपने दल के द्वारा शासित राज्यों और क्षेत्रों को चुने तथा उसके लिए अनुकूल योजना लागू करे, लेकिन विपक्ष के द्वारा शासित राज्य उपेक्षा के शिकार हों।
केन्द्रीकरण
केवल नाम बदलने और सार्वजनिक कल्याण के व्यय को संकुचित करने की ही नहीं, बल्कि केंद्रीकरण की प्रवृत्ति, जो केंद्र सरकार के सभी कार्यों में झलकती है, इस विधेयक में भी है। विधेयक की धारा 4(5)के अनुसार “केंद्र सरकार प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए राज्य-वार मानक आवंटन निर्धारित करेगी, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने वाले वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होगा।” इसका तात्पर्य केवल यह नहीं है कि 100 दिनों की गारंटी अब आवंटन आधारित योजना में तब्दील हो गई है, यह अर्थ तो है ही। लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि केंद्र और उसकी नौकरशाही मशीनरी अब आवंटन का स्थान, मात्रा, मानक और कारण तय करेगी। केंद्र निर्देशक होगा, राज्य केवल उसका पालक।
राज्यों के अस्तित्व को कमजोर किया जाना
इस अधिनियम के द्वारा केंद्र न केवल राज्यों को अपने निर्देशों का पालन करने वाला टूल बनाता है, बल्कि राज्यों के हाथों को भी बाँध देता है कि यदि वह अपने राज्य की ग्रामीण बेरोजगारी और संकट को कम करने के लिए अधिक व्यापक रोज़गार प्रदान करना चाहे तो भी नहीं कर सकता। राज्य की सरकारें अपने राज्य के लिए योजना भी नहीं बना सकती हैं। इसकी धारा 4(6) के अनुसार “राज्य द्वारा अपने मानक आवंटन से अधिक किया गया कोई भी व्यय राज्य सरकार द्वारा उसी प्रकार और उसी प्रक्रिया से वहन किया जाएगा, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा।” अर्थात् ‘न ख़ुद करेंगे, न करने देंगे’ की मानसिकता के साथ ही यह संघीय ढाँचे के अतिक्रमण का अगला कदम है।
मनरेगा में क्रियान्वयन संबंधी अनेक त्रुटियाँ थीं। परंतु उसने संकट के समय गाँवों को संभाला है। क्रियान्वयन की त्रुटियों का निराकरण प्रशासनिक कार्य था, कानूनी बदलाव का विषय नहीं। घाव कहीं है, चीरा कहीं लगा दिया गया है।
इस विधेयक की पूरी चादर सांप्रदायिकता, केंद्रीयता, अनौपचारिकता, पूँजीपतियों के हितों के संरक्षण और जनहित की अवहेलना के रेशों से बुनी गई है। विपक्ष विरोध करके हार गया है। राज्यों में इतनी ताक़त नहीं रहने दी गई है कि विरोध कर सके। और जनता? उसके लिए तो ‘राम जी’ ला ही दिए गए हैं।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।





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बहुत ही उपयोगी एवं सार्थक विश्लेषण प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
अलेख के मुद्दों की स्वीकृति और प्रोत्साहन के शब्दों के लिए आभार!
Very important analysis. Hope it gets widely circulated
Thank you for this acknowledgement! If the Government had been heard, it would have been heard in the Parliament. This is to make people hear that look, the Government is not listening.
सार्थक एकेडमिक और प्रेरक तथ्यपरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक साधुवाद।
धन्यवाद अजय कुमार झा जी इस प्रोत्साहन के लिए।
बहुत सटीक एवं निष्पक्ष विशलेष्ण। काश ये आलेख सत्तासीन लोगों के पास पहुँचे।
इस प्रोत्साहन के लिए आभार!