डॉ योगेन्द्र

डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग


पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

इन दिनों : जाति के दड़वों की घुटन

"जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह।" - इसी आलेख से

इन दिनों : राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के संघर्ष में हारता एक देश

"यह देश तय करे कि उसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा चाहिए या देश की तबाही? हम आखिर कहाँ आ गये हैं? क्या सचमुच राजनैतिक नेता गैरतहीन हो गये हैं?" - इसी आलेख से

इन दिनों : जिजीविषा और लोकतंत्र के चीथड़े

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"राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे।" - इसी आलेख से

इन दिनों : गलगोटिया की अपसंस्कृति अचानक नहीं आयी

"जो भी हो, गलगोटिया कोई एक दिन में पैदा नहीं होता। उसकी भी लंबी परंपरा है। झूठ का जो टोकरा प्रधानमंत्री ने जनता को थमाया है, उसमें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ही विकास हो सकता है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : भींगे कंबल, बरसे पानी

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"शिक्षा बीच बाजार में खड़ी है। हर स्तर की डिग्री का मोल भाव हो रहा है। यहाँ तक कि सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत कम खराब नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ नारों में सिमट गई है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : मनुष्य क्या पिंजरबद्ध दुनिया स्वीकार करेगा?

"क्या हम श्रम विहीन दुनिया में प्रवेश करने जा रहे हैं? अभी तक की मनुष्य की संस्कृति श्रम आधारित है। यंत्रों ने मनुष्य को श्रम से काटने की शुरुआत की। पहले उसने मदद की और अब यंत्रों ने उसे घेर लिया है। यंत्र ने शरीर और मन दोनों पर कब्जा करना शुरू किया है।" इसी आलेख से

इन दिनों : वैलेंटाइन और शिव

"प्रेम की गति अजीब होती है। बात बात में ‘आई लव यू' कहने वाला संभव है कोई लव नहीं करे और कोई भितरघुन्ना कुछ न कहे और लव में अपने को शहीद कर दे।" - इसी आलेख से

इन दिनों : लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवहार

"पक्ष और विपक्ष में परस्पर विश्वास न हो, तो लोकतांत्रिक व्यवहार का क्षरण होता है। प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता पर इसकी जिम्मेदारी ज्यादा होती है कि वह लोकतंत्र को बचाये रखे। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी लोकतंत्र को नष्ट करने में सहायक होती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : अनजान क्षितिज पर मिलता नहीं सहारा

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"कार्नेलिया दूसरे देश की है, मगर भारतवर्ष के सौंदर्य और स्वभाव पर मुग्ध है। मगर आज क्या हो रहा है। कार्नेलिया जो अनजान क्षितिज थी, उसे देश सहारा देता था, मगर आज अपने वाशिंदों का भी सहारा छीनने को उत्सुक है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : पप्पू से राउडी

"बीजेपी ने जिसे 'पप्पू' कह कर नीचा दिखाना चाहा, वह 'राउडी' कैसे हो गया? ...... बीजेपी ने इतना नोंचा-खसोटा, लोकतंत्र की जैसी-तैसी की, बार-बार निशाना ठोकता रहा कि सीधा बैल मरखंडा हो गया।" - इसी आलेख से