Category शिक्षा

शोध और विकास : भारत के विश्वविद्यालयों में नवाचार का मेरुदंड

Scientist in a lab coat using a microscope to conduct research, focusing on healthcare improvements.
भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रति अध्यापक औसत अनुसंधान अनुदान 30 लाख रुपये से कम है, जबकि अमेरिका में प्रति प्रोफेसर यह राशि 2 करोड़ रुपये और चीन में 1 करोड़ रुपये से अधिक पहुँचती है। इसके अलावा, भारत में पेटेंट आवेदन दर प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 12-15 पेटेंट है, जबकि चीन में यह 250, अमेरिका में 140 और जापान में 160 से भी अधिक है।

उच्च शिक्षा में महिलाओं का योगदान: एक समग्र विश्लेषण

जहाँ राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तरों पर नीतियों में सुधार हो रहे हैं, वहीं व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारतीय समाज में पारंपरिक मान्यताएँ अभी भी महिलाओं के कैरियर और विकास में एक बड़ी बाधा के रूप में मौजूद हैं।

क्यों बन रही है स्कूल पर गुप्त छापेमारी की योजना?

सांकेतिक चित्र

धूल उड़ाती सन्न-सन्न भागती गाड़ियों का क़ाफ़िला। साहब के इशारे पर गाड़ी घुमाता ड्राइवर। टास्क से अनजान एक-दूसरे का मुँह ताकते ऑर्डर की प्रतीक्षा में बंदूक़ थामे पुलिसकर्मी।  तभी साहब की गाड़ी रुकती है। क़ाफ़िले की दूसरी गाड़ियाँ भी। पुलिसवाले कूदकर…

नो डिटेंशन पालिसी की समाप्ति : अभिजात्य वर्चस्व के सम्मुख वंचितों की पराजय

इस आलेख में 'नो डिटेंशन पालिसी' की समाप्ति की अधिसूचना पर सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से विचार किया गया है। अंत तक पढ़कर यदि आप अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो इससे वैचारिक प्रक्रिया निर्मित होगी।

बीपीएससी पेपर लीक : भ्रष्ट एवं नाकाबिल प्रणाली की प्रताड़ना भुगतते छात्र

बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पेपर लीक मामले के संदर्भ में डॉ० नीरज कुमार का यह आलेख आयोग की प्रणालीगत ख़ामियों को उजागर करता है। यदि ये ख़ामियाँ विद्यमान रहती हैं तो उसके नतीजे इसी प्रकार होते रहेंगे। आवश्यक रूप से पठनीय आलेख।

सामाजिक-मानवीय आधार पर शिक्षा के पुनर्गठन की ज़रूरत

सत्ता और पूँजीवाद के गठजोड़ ने शिक्षा को अपने हितों की पूर्ति का साधन बना लिया है। सामाजिक और मानवीय हित कहीं खो गए हैं। सामाजिक और मानवीय हितों को पुनर्स्थापित करने के लिए समाज और सामाजिक लोगों को ही शिक्षा के स्वरूप के पुनर्गठन की चिंता करनी होगी।

प्रौद्योगिकी के प्रभाव में ज्ञान-सृजन को अमानवीय नहीं बनाना चाहिए

मानवीय संपर्क, जिसके तहत विद्यार्थी कक्षा में दिलचस्प प्रश्न पूछ सकते थे, शिक्षकों को चुनौती दे सकते थे, आत्मनिरीक्षण कर सकते थे या अपनी बहस को कक्षा से बाहर निकालकर गलियारों और कैंटीन तक ले जा सकते थे, धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, क्योंकि शैक्षणिक परियोजना व्यक्तिगत और अलगावकारी होती जा रही है।

शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के हितों की पड़ताल

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यह शिक्षा नीति शिक्षकों के ‘प्राचीन सम्मान’ को लौटाने का वाचिक आश्वासन भले ही देती हो, शिक्षकों से एक स्पंदनशील शैक्षिक वातावरण के निर्माण की अपेक्षा भले ही करती हो, परंतु उनके वेतनमान पर चुप्पी साध लेती है, सेवाशर्तों को कमजोर बनाने की अनुशंसा करती है, उनके व्यक्तित्व के दब्बू होने का इंतजाम करती है और विद्यालीय परिवेश में उनके महत्व का अवमूल्यन करती है।

भारतीय संदर्भ में नई तालीम का प्राणालिक औचित्य

यदि भारत को शिक्षा का सिरमौर होना है, बेरोजगारी की समस्या को दूर करना है, उत्पादन में बढ़ोत्तरी करनी है, गाँवों का विकास करना है और समाज में नैतिकता का वर्चस्व स्थापित करना है तो उसे ‘नई तालीम’ की अवधारणा को स्वीकार करना ही पड़ेगा।