
धर्म और पूँजी के खेल में आमजन इस तरह उलझ गया है कि उसकी स्वचेतना समाप्त हो गई है। वह बाबाओं और मुनाफाखोरों के चश्मे से दुनिया को और ख़ुद अपने जीवन को भी देखने लगा है।

देश के लोगों को लगने लगा है कि मंदिर ही उनके भविष्य को सँवारेगा। यदि सँवार न सका तो रक्षा ज़रूर करेगा।

"यह भयावह वक्त है, जब मृत्यु से भी मुनाफा कमाया जा रहा है और मजा यह है कि देश में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो मृत्योत्सव का समर्थन भी करते हैं और जयकारे भी लगाते हैं।" - इसी लेख से

"डॉ लोहिया ने कहा था कि पांच सालों तक जिंदा कौमें इंतजार नहीं करतीं। सच पूछिए तो जिंदा कौमें की एक शमां तो बननी चाहिए।" - इसी लेख से

"जो खिलवाड़ कर रहा है, वह तो जानबूझकर कर रहा है। वह दोषी कम है, उससे ज्यादा दोषी वह है जो खुली आंखों से देख कर भी नहीं देख रहा है या डर से तालियां पीट रहा है।" - इसी आलेख से

उन्होंने जिसकी गारंटी दी, वह बर्बाद हो गया। इस बार संविधान की बारी है । उन्होंने संविधान को सिर से लगा लिया है। - इसी आलेख से।

"माडल लेरिसा नेरी को मालूम ही नहीं है कि चुनाव आयोग उससे कितना प्यार करता है। वह केवल भारत के नागरिकों को ही वोटर नहीं बनाता, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लोगों को भी शामिल करता है। वह इतना मदमस्त है कि वह किसी को मतदाता सूची से हटा सकता है और किसी को जोड़ सकता है।"

यह सच है कि केंचुआ में रीढ़ नहीं होती, लेकिन तब भी वह मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। वह किसानों का मित्र और धरती का हलवाहा कहा जाता है। चुनाव आयोग तो लोकतंत्र से जन्मा और लोकतंत्र को ही खा रहा है। यह तो पितृहंता है। केंचुआ बहुत बेहतरीन प्राणी है, चुनाव आयोग ने तो अपनी मिट्टी पलीद कर कर ली। - इसी आलेख से

लोकजीवन के "इन दिनों' कॉलम में आज पढ़ें प्रो० योगेंद्र का व्यंग्य 'उतरा है रामराज विधायक आवास में'