कल भागलपुर में पुराने साथियों की बैठक हुई। संदर्भ बिहार का चुनाव था। पुराने साथियों का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि किसी का संबंध जेपी आंदोलन से था, किसी का झुग्गी झोपड़ी आंदोलन से तो किसी का गंगा मुक्ति आंदोलन से।…
देश की विविधता पूर्ण स्वतंत्र वैचारिक चेतना पर नियंत्रण के उद्देश्य से राजनीतिक नियामक समूह विकासोन्मुख नीतियों के नाम पर विद्यालयों में एक ऐसा शैक्षणिक ढाँचा तैयार करने जा रहा है, जो “राष्ट्रीय एकता” के नाम पर विविधता और आलोचनात्मक चेतना को दबा रहा है। - इसी आलेख से
राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का घटते जाना चिंता का विषय है। इसे केवल एक प्रमुख समूह की राजनीतिक उपेक्षा के रूप में नहीं देखा जा सकता है, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक कुप्रभाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
पिछले लेख में आपने पढ़ा था तेघड़ा विधानसभा क्षेत्र के चुनाव का विश्लेषण। इस लेख में प्रस्तुत है बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के चुनाव का विभिन्न आधारों पर विश्लेषण।
इस विश्लेषण में लेखक ने तेघड़ा विधानसभा के चुनावी परिदृश्य का विश्लेषण किया है। लेखक के अनुसार चुनाव आसान नहीं है। लेकिन संभावनाओं का विश्लेषण किस ओर इंगित करता है, इसे जानने के लिए पढ़ें यह लेख -
क्या बिहार में मतदाता सूची वास्तव में 'शुद्ध' हो गई है?इस आलेख में, जमीनी स्तर के प्रमाणों के साथ एसआईआर की अंतिम सूची, जिसे 'शुद्ध' कहा गया है, का विश्लेषण प्रस्तुत है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ऐसे समय पर हो रहे हैं जब युवाओं का पलायन राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। लाखों लोग रोज़गार और बेहतर अवसर की तलाश में बाहर जा चुके हैं, जिससे गांव और कस्बे खाली होते जा रहे हैं। यह चुनाव इस सवाल का सामना करेगा कि क्या राजनीति अब सच में रोजगार और विकास को केंद्र में रखेगी, या फिर बिहार एक बार फिर पीछे छूट जाएगा।
जिस राज्य में महज 22% लोग ही किसी तरह पाँचवीं कक्षा तक पहुँच सके हों, एक तिहाई लोगों ने कभी स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा हो और 21% बच्चे दसवीं कक्षा की चौखट तक पहुँचने के पहले ही स्कूल से बाहर हो जाते हों, वह राज्य तो मध्यकाल के किसी पिछड़े हुए असभ्य समाज की तस्वीर पेश करता है। वहाँ के लिए स्वास्थ्य, रोजगार, समृद्धि आदि की बात ही बेमानी है। - इसी आलेख से