अमेरिका के राष्ट्रपति से पूरी दुनिया ख़फ़ा है। होना भी चाहिए। जिस आदमी ने अहंकार में चूर होकर अन्य देश के प्रतिनिधियों का अपमान किया है। जिस आदमी ने इंसानों की इज्जत से लेकर जान की क़ीमत नहीं समझी, उसने नोबेल शांति पुरस्कार तक हथिया लिया, अब कहता है उसे ग्रीनलैंड चाहिए। किसी बच्चे की तरह वह जिद्द करता है, किसी सनकी बादशाह की तरह आक्रमण। ऐसे व्यक्ति का प्रतिकार तो होना ही चाहिए।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा — “The power of less powerful begins with honesty”, उन्होंने कहा यह परिवर्तन का समय नहीं है। उनके अनुसार पूरा का पूरा सिस्टम अब ध्वस्त हो चुका है। दूसरे विश्व-युद्ध के बाद 1945 में UN की स्थापना हुई थी, एक तरह से समझें , यह विश्व-संसद थी। हर देश के प्रतिनिधि वैश्विक समस्या जैसे मानवाधिकार से लेकर जलवायु परिवर्तन तक यहाँ चर्चा होती थी। आज लगभग अस्सी साल की हो गई है, यह संस्था, लगता है उम्र हो गई है। अब अपने ही देश को देख लीजिए। १९५० में संविधान लागू हुआ था। हाल ही में हमने अमृत महोत्सव मनाया। सपना था कि न्याय का राज स्थापित होगा। और हो क्या रहा है?
कल पटना से खबर आई है कि कैसे एक बेटी को हवस के भेड़ियों ने नोच डाला। हर दिन 80-100 चीरहरण हो रहा है। लगता है, महाभारत शुरू होने वाली है। दिल थाम कर बैठिए किसी भी दिन युद्ध का शंखनाद सुनने को मिल सकता है। क्या आपने सुना शंकराचार्य ने शंखनाद करते हुए प्रयागराज से हमारे प्रधानमंत्री की तुलना औरंगजेब से की है। जो लोग पंथ की राजनीति में इतने तल्लीन थे कि कपड़ों से ही पहचानने की बातें करते थे। जो नफ़रत इतनी थी कि इलाहाबाद का नाम तक नहीं सुनना चाहते थे। हिंदू हो, या मुस्लिम, या कोई भी धर्म जिसका नाम हो, वह पंथ बन जाता है। हमारे सनातन दर्शन में तो धर्म की परिभाषा — “जिसे धारण किया जाए”, वही धर्म है। धारण हम सिर्फ़ कपड़ा ही नहीं करते, आचरण, व्यवहार, भावनाएँ, विचार, और सपने भी हम ही धारण करते हैं। जब धर्म गुरुओं को भी हड़ताल करने की नौबत आ जाए, तब तो हमें इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए कि मंदिर के वहीं बन जाने से कोई चमत्कार नहीं हो पाएगा। यहाँ तो नए संसद की छत को भी हमने चूते देखा है।
न्याय का राज स्थापित हो सके, मेरी समझ से, इसके पहले हमें न्याय की परिभाषा को समझना पड़ेगा। सही और ग़लत के बीच सही का चुनाव, न्याय है। हिंसा और अहिंसा के बीच, अहिंसा का चुनाव, न्याय है। जीवन और मृत्यु के बीच, जीवन का चुनाव, न्याय है। नीतिशास्त्र हमें बताता है कि कल्पनाओं पर नैतिकता का कोई नियम लागू नहीं होता। सपनों पर भी कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए कला और साहित्य को नैतिकता के पैमाने से बाहर रखा गया है। कोई जब दुर्गा की मूर्ति बनाता है, तो उसे महिषासुर को भी बनाना ही पड़ता है। जब कोई अच्छा लिखता है, तो उसे बुरा भी लिखना ही पड़ता है। नियम-कानून विचारों की अभिव्यक्ति से शुरू और व्यक्ति के व्यवहार पर समाप्त हो जाती है। समाज नियम कानून क्यों बनाता है?
ताकि एक ऐसी व्यवस्था क़ायम हो सके जहाँ संवाद से समझ, और समझ से सामंजस्य की स्थापना हो। हम सब मिलजुलकर हँसी-ख़ुशी रह सकें। आज दुनिया इतने नियम बना चुकी है कि अपने ही बनाये तंत्र में उलझ गई है। ऐसा लगता है, हमारे प्रतिनिधि और प्रशासन ऊब चुका है, उसे समझ नहीं आ रहा है, करे तो करे क्या? इसी उलझन में शायद हम सभी उदास हैं, कुछ हाथ-पर-हाथ धरे बैठे हैं, कुछ उत्पात मचा रहे हैं। स्कूल से लेकर हॉस्पिटल, पुलिस थाने से लेकर न्यायालय में हम, भारत के लोग, अपनी संप्रभुता खोते जा रहे हैं। हर कहीं हमें ही घुसपैठिया बताया जा रहा है।
चलते-चलते हर पहिया पुराना हो जाता है। एक-दो पंचर पर तो स्टेपनी लग जाती है। पर पाँच-दस के बाद पहिया ही बदलना पड़ता है। हमारे संवैधानिक पहिए के साथ भी कुछ ऐसा ही हो गया है। संविधान ने विधायिका को नियम बनाने, कार्यपालिका को लागू करने, और न्यायपालिका को लागू करवाने की जिम्मेदारी दी थी। संविधान लागू होने के 75 साल बाद इतने नियम क़ानून बन गए हैं कि कौन सा नियम कहाँ लागू होगा किसी को समझ नहीं आ रहा। तभी तो बलात्कारी बेल पर हैं, और क्रांतिकारी जेल में। तो क्या किया जा सकता है?
मेरे पास एक सुझाव है।
आजादी के बाद हमारे पास कई ऐसी चुनौतियाँ थी, जिसके कारण उस समय हमने केंद्रित अर्थव्यवस्था का चुनाव किया। क्योंकि नए बने राज्यों के पास ना इतनी क्षमता थी, ना ही इतना राजस्व। पर तब भी सपना ग्राम स्वराज का था। इसी सपने को आगे बढ़ाने के लिए 1992 में 73 और 74 संशोधन के तहत पंचायत और वार्ड का गठन किया गया। ये वो दौर था जब उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की तैयारी अपने चरम पर थी। जिस कारण केंद्र को आर्थिक शक्ति अपने पास रखनी पड़ी। परमाणु शक्ति बनना भी जरूरी था, वरना आज हम लाल आँख दिखाने के जुमले कैसे उछल पाते। अफ़सोस! जब विपदा आई तब हम आँख चुराए फिर रहे हैं।
ऐसी हालत क्यों आई? जब दुनिया 21 वीं सदी में प्रवेश कर रही थी, तब सूचना क्रांति घर-घर पहुँचने लगी थी। भारत ने इस क्षेत्र में लगभग दो दशक तक बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। 2010-20 तक भारत में विदेशी निवेश भी हो रहा था। मेरी समझ से यहीं हमें दो-चार बार हुए पंचर पहिए को बदल लेना था। निजीकरण का पहिया पुराना हो चुका था। हमें पंचायत को एक मजबूत आर्थिक शक्ति सौंप देनी चाहिए थी। केंद्र में बैठे कुछ 500-1000 लोग इंदौर का बजट नहीं बना सकते। अगर बना पाते तो लोग पानी पीकर नहीं मर जाते। इंदौर को अपना बजट बनाने का मौका मिलना चाहिए। उनके पास वहाँ के निवासियों की आय से मिलकर सीधा पहुँचना चाहिए, ताकि हमें पता रहे हमारे पास पूँजी कितनी है और जनहित में उसे खर्च करने की हम बना पायें।
Trickle-Down Economy अब पुरानी हो चुकी है। मैं Rainfall Model की प्रस्तावना आपके सामने रखता हूँ। पब्लिक पालिका के मैनिफेस्टो में आप इसे पढ़ सकते हैं। आइए मिलकर स्वराज का एक नया सपना देखते हैं।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)








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