युद्ध में हार-जीत होती है। क्या जीवन एक युद्ध है या जीना एक कला है? जीवन अगर युद्ध है तो हार-जीत अनिवार्य है। अगर वह कला है तो हार-जीत की कोई संभावना नहीं है। तब जीवन सौंदर्य से भरा है। धरती पर मनुष्य करूणा से आपूरित है, खिली हुई धूप है, डालों पर कलियाँ चटक रही हैं। यहाँ प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। करूणा में प्रतियोगिता नहीं है, न तुलना है। धूप और कलियों में आगे-पीछे का भाव नहीं है। भावनाओं से भरी दुनिया कला का विषय है और वस्तुओं से होड़ लेना है तो जीवन युद्ध की तरह है। यह आपका च्वाइस है कि किस राह चलें।
हम बच्चों को कला नहीं सिखाते, युद्ध सिखाते हैं। पूरी व्यवस्था युद्ध की भाषा सिखाती है। सफ़लता का मतलब है प्राप्ति। पद, पैसा, यश की प्राप्ति। हम कुछ प्राप्त करने के लिए छटपटा रहे हैं। इसलिए बेचैन हैं, अशांत हैं। अपने अंदर की भावनाओं की दुनिया को देखिए। कितनी भावनाएँ उठती हैं और गिरती हैं। समुद्र की उत्ताल तरंगों की तरह। समुद्र में अथाह जल है, तब भी कितना छटपटाता है? पर्वत के आकार की लहरें किनारों से टकराती हैं। कितनी धुन है इन लहरों में। हम सबके अंदर लहर ही तो है! समुद्र से कमतर नहीं है अंदर की लहरें।
यह देश जिसे गर्व है कि पहले यहाँ सभ्यता उतरी। दुनिया का सबसे पुराना ग्रंथ वैदिक साहित्य जहाँ सृजित हुआ, वहाँ मल-मूत्र से भरा पानी हजारों लोगों को पिला दिया जाता है। पंद्रह सनातनी मर चुके हैं और सैकड़ों अस्पताल में छटपटा रहे हैं। क्या यह सभ्यता है? क्या इसकी इजाजत किसी धर्म ने दी है? क्या यह सड़ी-गली व्यवस्था की देन है? क्या इसके लिए शर्म करें या गर्व करें? क्या सभी पदधारी चुप रहेंगे या जनता मूकदर्शक रहेगी? ज़िन्दगियाँ यहाँ क्या माँग कर रही हैं? क्या इस दुर्घटना को सफलता-असफलता की कसौटी पर कसेंगे? या मन द्रवित होगा? मन की द्रवणशीलता क्या निष्क्रिय करती है या सक्रिय करेगी? कला युद्ध नहीं है, लेकिन कला निष्क्रियता नहीं है। सत्य के लिए आवाज देना कला है। हाँ, मन में हार-जीत लगी हो तो आप तौल कर चलें। कितना बोलना है, कितना चलना है, इसका हिसाब रखें। कला हिसाब नहीं रखती।
हिसाबी आदमी हार-जीत में भरोसा रखता है। वह लाशों को भी तुला पर तौलता है। संबंधों का भी हिसाब-किताब रखता है। इंदौर में मरती मानवीयता पर प्रधानमंत्री चुप रहेंगे, क्योंकि हिसाब-किताब करना है। गृहमंत्री तो नफा नुकसान देखेंगे ही। उन्हें इसमें भी हार-जीत का अहसास है। वह अपना कदम साध कर रखेंगे। हिसाबी लोगों के पद बहुत बड़े हो सकते हैं, लेकिन वे आदमी बड़े नहीं होते! ऐसे आदमी को पद नाप लेता है। पद के साथ ही उनका सम्मान घटता-बढ़ता है। बुद्ध ने पद का त्याग किया था। वे पद के लिए नहीं जिये, न मरे। पद के पीछे तो गांधी तक पागल नहीं हुए। पद के पीछे पगलाए आदमी को इतिहास याद नहीं रखता। पद मिल जाए तो आप ट्रस्टी बन कर पद का निर्वाह करें। मालिक बन कर नहीं। मालिक बनेंगे तो हारने और जीतने का मन करेगा। ट्रस्टी बन कर रहेंगे तो सौंदर्य से भरे रहेंगे। इंदौर की दुर्घटना असभ्यता की निशानी है। जो पद पर बैठे हैं। वे शर्म न करें, लेकिन जो खुद को सभ्य मानते हैं, वे शर्मिंदा हों और सत्य के लिए प्रतिबद्ध हों।
जीवन युद्ध न हो तो जीवन प्रेम तो हो, न्याय तो हो, सत्य के साथ एकजुटता तो हो। हम कितने वर्षों तक असभ्यता की चादर ओढ़े रहेंगे?

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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