‘लोकजीवन’ पर यह सौंवा लेख है, लेकिन मैंने 23 सितंबर 2024 से प्रत्येक दिन ‘इन दिनों‘ लिखना शुरू किया था। पंद्रह दिनों को छोड़कर तब से लगातार ‘इन दिनों’ लिख रहा हूँ। सौ दिन पूर्व अनिल जी ने मुझे व्हाट्सएप पर लिखा कि अगर आप उचित समझें तो ‘लोकजीवन’ के लिए ‘इन दिनों’ भेज दें। लेखक को और क्या चाहिए? सत्ता विरोधी आलेख अमूमन अखबार नहीं छापना चाहते, इसलिए मैं ‘इन दिनों’ लिख कर सोशल मीडिया पर डालता रहा था। अनिल जी के आग्रह पर ‘लोकजीवन’ को भेजने लगा । लेखक को पाठक की तलाश रहती ही है। ‘इन दिनों’ को कितने पढ़ते या देखते हैं, इसका आकलन संभव नहीं है, लेकिन मैंने तय किया है कि जीवन के अंतिम क्षण तक इसे लिखता रहूँगा।
एम ए करने के बाद भागलपुर का पहला दैनिक पत्र ‘नई बात’ की शुरुआत हुई तो मैं प्रत्येक दिन ‘खियालीराम को ख्याल आया’ कालम लिखा करता था। डेढ़ वर्ष लगातार लिखा। खियालीराम के बहुत से हिस्से खो गए। तब भी चार सौ से अधिक पृष्ठों की टाइप की हुई इसकी सामग्री पड़ी है। यह मूलतः व्यंग्य कालम था और इस कालम के कारण मेरा नाम ही खियाली पड़ गया था। वक्त गुजरता गया। मैं शिक्षक की नौकरी करने लगा। लिखने का काम धीमा पड़ा। स्कूल, विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय पदाधिकारी, विभाग की अध्यक्षता, आंदोलन, चुनावी राजनीति, दो बार जेल- यात्रा, अनगिनत गोष्ठियों से होता हुआ आज मैं ‘यहाँ’ हूँ। रोज लिखना, पढ़ना और देश-समाज के लिए कुछ अच्छा करने की जुगत बैठाना ।
संयोग देखिए कि कल महाशिवरात्रि थी। सुबह जब टहलने जा रहा था तो अलका ने कहा कि अपनी गलती छिपाने के लिए राम के पहले सीता और कृष्ण के पहले राधा लगाते हैं – सीता-राम, राधा-कृष्ण। राम ने सीता के साथ अन्याय किया और कृष्ण ने स्त्रियों के साथ। राम एकनिष्ठ रहे, मगर सीता की परीक्षा बार-बार ली और जिस वक्त राम को सीता के साथ रहना था, उस वक्त जंगल भेज दिया। कृष्ण की तीन पत्नियाँ थीं – सत्यभामा, रुक्मिणी और एक और। कृष्ण के साथ तीनों में से किसी पत्नी के नाम नहीं लिये जाते। उनके साथ उनकी प्रेमिका का नाम लिया जाता है। इसलिए राम और कृष्ण की लाख पूजा हो, लेकिन नवयुवतियाँ पति के लिए उनकी कभी पूजा नहीं करती। पति के लिए पूजा शिव की की जाती है। औघड़नाथ शिव।
शिव के सौ नाम हैं, लेकिन उनकी एकनिष्ठता अभूतपूर्व है। पार्वती लाख नाउम्मीद हों, लेकिन हर जन्म में उन्हें शिव ही चाहिए। शिव के साथी-संगी भी दूत-भूत। शिव भी पल में तोला, पल में माशा। एकदम अस्थिर चित्त। वे प्रसन्न बेलपत्रों से हो जाते हैं। उन्हें गुलाब और गेंदा नहीं चाहिए। और अगर गुस्साये तो तांडव भी शुरू कर देते हैं। विनाश और सृजन का अभूतपूर्व संगम। नवयुवतियाँ शिव के पास जाती हैं, राम और कृष्ण के पास नहीं। लोग राम और कृष्ण के पास धन, संपत्ति और समृद्धि के लिए जा सकते हैं। रोगों से छुटकारे के लिए भी, लेकिन प्रेम और शादी के लिए नहीं। वर चाहिए तो शिव की तरह। परिवार में रहते हुए पति कभी गुस्सा भी जाये, लेकिन तुरंत मुलायम भी हो जाय। प्रेम की गति अजीब होती है। बात बात में ‘आई लव यू’ कहने वाला संभव है कोई लव नहीं करे और कोई भितरघुन्ना कुछ न कहे और लव में अपने को शहीद कर दे।
परसों वैलेंटाइन डे था। वैलेंटाइन एक संत था। उन्होंने सिपाहियों की शादी का प्रस्ताव राजा से किया था, क्योंकि राजा ने सिपाहियों की शादी पर बंदिश लगा रखी थी। वैलेंटाइन तो कब के चल बसे, अब उनके नाम पर अरबों का विजनेस है और उनके नाम पर दो चेतना आमने-सामने हैं । एक प्रेम करने वाली और दूसरी लट्ठ लेकर प्रेमी को पीटने वाली। वैलेंटाइन और शिव क्रमशः आये और शुभकामनायें दीजिए कि लोगों के जीवन में वैलेंटाइन भी रहें और शिव भी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






