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शिक्षक और कुत्तों की गिनती : बिहार सरकार की वैचारिक बीमारी

"बिहार में शिक्षक को कक्षा से बाहर निकालने की एक स्थायी परंपरा बन चुकी है।......... हर बार तर्क एक ही दिया जाता है—“काम ज़रूरी है”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों की पढ़ाई ज़रूरी नहीं? क्या शिक्षा हमेशा स्थगित की जा सकने वाली गतिविधि है?" - इसी आलेख से

उच्च शिक्षा में भेदभाव और ज्ञान-उत्पादन का संकट : एक विश्लेषण

यह आलेख प्रो० रवि कुमार के विचारों पर आधारित है। इस आलेख में बताया गया है कि भारत के उच्च शिक्षा संस्थान, जो ज्ञान, समानता और प्रगतिशील सोच के केंद्र माने जाते हैं, आज भी जाति-आधारित भेदभाव और बहिष्कार की गहरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। वंचित समुदायों के हज़ारों छात्र सामाजिक पूर्वाग्रह, सूक्ष्म भेदभाव और संसाधनों की कमी के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति केवल छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षकों और शोधकर्ताओं के अवसरों तथा प्रतिनिधित्व में भी गहरे असमानता के रूप में दिखाई देती है। विविधता की कमी से न केवल ज्ञान-उत्पादन का दायरा संकुचित होता है, बल्कि छात्रों के बौद्धिक, नेतृत्व और आलोचनात्मक सोच के विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में, आरक्षण नीतियों का सख़्ती से पालन, समावेशी पाठ्यक्रम और संवेदनशीलता प्रशिक्षण जैसे ठोस कदम अनिवार्य हो जाते हैं, ताकि उच्च शिक्षा वास्तव में लोकतांत्रिक और समान अवसर प्रदान करने वाली बन सके।

क्यों बन रही है स्कूल पर गुप्त छापेमारी की योजना?

सांकेतिक चित्र

धूल उड़ाती सन्न-सन्न भागती गाड़ियों का क़ाफ़िला। साहब के इशारे पर गाड़ी घुमाता ड्राइवर। टास्क से अनजान एक-दूसरे का मुँह ताकते ऑर्डर की प्रतीक्षा में बंदूक़ थामे पुलिसकर्मी।  तभी साहब की गाड़ी रुकती है। क़ाफ़िले की दूसरी गाड़ियाँ भी। पुलिसवाले कूदकर…

शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के हितों की पड़ताल

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यह शिक्षा नीति शिक्षकों के ‘प्राचीन सम्मान’ को लौटाने का वाचिक आश्वासन भले ही देती हो, शिक्षकों से एक स्पंदनशील शैक्षिक वातावरण के निर्माण की अपेक्षा भले ही करती हो, परंतु उनके वेतनमान पर चुप्पी साध लेती है, सेवाशर्तों को कमजोर बनाने की अनुशंसा करती है, उनके व्यक्तित्व के दब्बू होने का इंतजाम करती है और विद्यालीय परिवेश में उनके महत्व का अवमूल्यन करती है।