
फर्जी इतिहास-बोध न केवल अपनी विरासत को नकारता है, बल्कि अपने अस्तित्व को भी नकारता है। कैसे? पढ़ें यह लेख।

नीतीश कुमार की कहानी उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जो, राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में, सत्ता के केंद्र से हाशिये की ओर ढकेला जाता है।

व्यतीत का विश्लेषण राजनीतिक उठा-पटक और छल-छद्म को समझने में सहायक हो सकता है। परंतु वास्तविक चिंता राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संभावनाओं की होनी चाहिए। यह आलेख इन्हीं संभावनाओं का विश्लेषण करने की कोशिश करता है।

"भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है।" - इसी आलेख से

"चार महीने पूर्व भी मैंने लिखा था कि नीतीश कुमार के लिए बढ़िया है कि वे अब सम्मानपूर्वक विदा हो जायें, मगर लिप्सा कम खतरनाक नहीं होती। अंततः उनका कारुणिक अवसान हुआ- मुँह लिपलिपाते और पेट पर हाथ फेरते।" इसी आलेख से

"आज भी नीतीश कुमार के अंदर इच्छाएं जोर मारती हैं, लेकिन शरीर उस काबिल नहीं रहा। चेतना भी दूर होती जा रही है। अपने स्वार्थ के लिए कुछ लोग अपना कंधा लगाये हुए हैं। सम्मान सहित कुर्सी से उतरना ज्यादा सारगर्भित होता, धक्के मार कर कुर्सी से हटाना बहुत बुरा होगा।" - इसी आलेख से

बिहार के चुनाव परिणाम ने हज़ार सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे मौजूँ सवाल है कि चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए या नहीं? यदि उत्तर हाँ है तो फिर उसके लिए क्या किया जाना चाहिए? यह आलेख इन्हीं प्रश्नों से जूझता है।