
"यह देश तय करे कि उसे प्रधानमंत्री की प्रशंसा चाहिए या देश की तबाही? हम आखिर कहाँ आ गये हैं? क्या सचमुच राजनैतिक नेता गैरतहीन हो गये हैं?" - इसी आलेख से

"आजकल ऐसा लगता है कि देश दिल्ली से नहीं वाशिंगटन से चलता है। अमेरिका यह कहे कि भारत को तेल खरीदना पड़ेगा और रूस से वह तेल नहीं खरीदेगा। अगर चोरी छुपे रूस से तेल खरीदा तो उस पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगायेंगे। भारत सरकार उसकी बात मान लेता है।" - इसी आलेख से

"जब धर्म गुरुओं को भी हड़ताल करने की नौबत आ जाए, तब तो हमें इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए कि मंदिर के वहीं बन जाने से कोई चमत्कार नहीं हो पाएगा।" - इसी आलेख से

"इतिहास बताता है कि साम्राज्य अपने सबसे घमंडी दौर में ही गिरावट की ओर बढ़ते हैं। ट्रंप का खुला विस्तारवाद, उसकी बेशर्म भाषा और वेनेजुएला पर किया गया हमला उसी घमंड का प्रतीक है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका क्या चाहता है; सवाल यह है कि दुनिया कब तक इस लूट और कब्ज़े को चुपचाप देखती रहेगी।" इसी आलेख से

आलेख में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर के रूप में चुने जाने वाले ममदानी और काउंसलर के रूप में निर्वाचित होने वाले कम्युनिस्ट नेताओं की राजनीतिक रणनीति की विवेचना है और इसके साथ ही जन-जुड़ाव के चुनावी अभियान की संभावना की भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पड़ताल है।