बिहार में करीब 20 साल तक सत्ता का केंद्र बने रहने के बाद नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना एक साधारण राजनीतिक फैसला नहीं है। यह उस पूरे दौर के खत्म होने का संकेत है, जिसे लोग “नीतीश युग” के नाम से जानते रहे हैं। 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तब बिहार की पहचान पिछड़ेपन, खराब कानून-व्यवस्था और टूटी हुई बुनियादी संरचना से जुड़ी थी। उस समय उन्होंने “सुशासन” का नारा दिया और शुरुआती वर्षों में जमीन पर बदलाव भी दिखा। सड़क निर्माण तेजी से हुआ, गाँवों तक बिजली पहुँची, स्कूलों में नामांकन बढ़ा और कानून-व्यवस्था में भी सुधार आया। यही वजह थी कि 2005 से लेकर 2015 तक उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। बिहार की आर्थिक विकास दर भी इस दौरान राष्ट्रीय औसत के करीब पहुँची, जो पहले 3–4 प्रतिशत के आसपास मानी जाती थी, वह कई सालों में 9–10 प्रतिशत तक दर्ज की गई। लेकिन यह भी सच है कि रोजगार, उद्योग और पलायन जैसे मूल मुद्दे आज भी वैसे ही खड़े हैं, जैसे पहले थे।
यहीं से उनकी राजनीति का दूसरा पक्ष शुरू होता है। विकास के साथ-साथ उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए लगातार अपने राजनीतिक समीकरण बदले। कभी नरेन्द्र मोदी के विरोध में एनडीए छोड़ा, फिर लालू प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा, उसके बाद फिर भाजपा के साथ आ गए। 2022 में एक बार फिर पाला बदला और 2024 के चुनाव से पहले फिर एनडीए में शामिल हो गए। यह सिलसिला बताता है कि उनकी राजनीति में विचारधारा से ज्यादा सत्ता बनाए रखना प्राथमिकता रही। लेकिन 2025 के चुनावों के बाद हालात बदल गए। भाजपा, जिसे कभी वे अपने बराबर रखते थे, अब बिहार में उनसे आगे निकल गई। पहले वे गठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखते थे, लेकिन अब वही संतुलन टूटता दिख रहा है। भाजपा अब सिर्फ सहयोगी नहीं रहना चाहती, बल्कि नेतृत्व अपने हाथ में लेना चाहती है। यही वजह है कि नीतीश कुमार के सामने विकल्प सीमित हो गए। ऐसे में मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना कई मायनों में पीछे हटने जैसा लगता है। यह पहली बार है जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री स्वेच्छा से सत्ता छोड़कर राज्यसभा का रास्ता चुन रहा है। तुलना अगर नरेन्द्र मोदी से की जाए तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़कर सीधे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की थी। जबकि यहाँ स्थिति साफ नहीं है। न तो कोई बड़ा पद तय है और न ही कोई स्पष्ट भूमिका। इस फैसले से यह भी संकेत मिलता है कि अब बिहार की राजनीति में उनका नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहा। यह कहना गलत नहीं होगा कि वे अब परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने को मजबूर दिख रहे हैं। भाजपा का बढ़ता प्रभाव और संगठनात्मक ताकत इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण है।
इसका असर जदयू के अंदर भी साफ दिख रहा है। पार्टी के पुराने नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है। कुछ नेता अलग हो चुके हैं और कार्यकर्ताओं के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि अब पार्टी का भविष्य क्या होगा? निशांत कुमार को आगे लाने की चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन राजनीति में केवल नाम से काम नहीं चलता। नीतीश कुमार ने जो राजनीतिक आधार बनाया, उसे बनाए रखना आसान नहीं है। अगर व्यापक नजरिए से देखें तो यह बदलाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह बिहार की पूरी राजनीतिक दिशा बदलने वाला है। एक समय था, जब यहाँ की राजनीति पर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की छाप थी। बाद में लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाया और फिर नीतीश कुमार ने विकास और सुशासन को केंद्र में रखा। लेकिन अब यह पूरा दौर खत्म होता दिख रहा है।
आज की राजनीति में भाजपा का प्रभाव सबसे ज्यादा है और वह बिहार में भी अपनी पूरी पकड़ बनाना चाहती है। 2025 के बाद यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में मुख्यमंत्री पद पर भी भाजपा दावा ठोक सकती है। अगर ऐसा होता है तो जदयू की भूमिका और सीमित हो जाएगी।
नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे हर परिस्थिति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखते थे। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। इस बार वे खुद खेल के केंद्र में नहीं, बल्कि उसके किनारे नजर आ रहे हैं। राज्यसभा जाना उनके राजनीतिक जीवन का नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह अध्याय पहले जितना प्रभावशाली नहीं दिखता।
बात सीधी है—यह सिर्फ मुख्यमंत्री से सांसद बनने की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जिसमें एक मजबूत क्षेत्रीय नेता धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति के दबाव में पीछे हटता दिख रहा है। बिहार की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ शक्ति का केंद्र बदल रहा है और नीतीश कुमार, जो कभी इस केंद्र में थे, अब उससे दूर होते नजर आ रहे हैं।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







