‘अवतार’ फिल्म का गाना है –
‘दिन महीने साल गुजरते जायेंगे, हम प्यार में जीते, प्यार में मरते जायेंगे।’
कोई दिन या क्षण नहीं ठहरा, तो बरस 25 भी नहीं ठहरा। समय ससर रहा है। अविराम बहता-सा रहा है। मनुष्य काल का शिकार है। कबीर लिखते हैं –
“झूठे सुख को सुख कहै, मानत हैं मन मोद/ जगत चबैना काल का, कछु मुख में, कुछ गोद।”
एक क्षण आता है कि कुछ समझ में नहीं आता कि जीवन जीया तो क्यों जीया? जिंदगी का सफर, ये कैसा सफ़र, कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं। आदमी की ख्वाहिश विचित्र होती है। जब जीवन को ठीक से पटरी पर डालने का वक्त होता है तो वह बेपटरी पर चलता है और जब ऊर्जा चुक जाती है तब पटरी पर चलना चाहता है। मुकेश द्वारा गाया गया एक गीत हर वक्त याद आता है –
‘सजन रे झूठ मत बोलो। खुदा के पास जाना है। हाथी है, न घोड़ा है पैदल ही जाना है।’
वे यहीं नहीं रूकते। झूम कर गाते हैं –
‘तुम्हारे महल चौबारे, यही रह जायेंगे सारे। अकड़ किस बात की प्यारे, अकड़ किस बात के प्यारे।’
दुनिया फानी है। जब बुढ़ापा आता है तो लोग अफसोस करता है –
‘लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद में सोया और बुढापा देख कर रोया।’
2025 तो चला गया। अब उसकी स्मृतियाँ हैं। अच्छी या बुरी – वे हमारे हृदय से चिपकी रहेगी।
मैं अपनी निजी जिंदगी को देखता हूँ। यह अन्य जिंदगियों की तरह है। पढ़ा भी खूब, लिखा भी। बेबस भी हुआ, उबरा भी। सेवानिवृत्ति के बाद लगता है कि बहुत कुछ करना बाकी है। निराला ने लिखा है –
“अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत।
हरे-हरे ये पात,
डालियां, कलियां कोमल गात।
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर।
पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं।”
काल नहीं ठहरता तो हम-आप क्यों ठहरें? हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है – ‘‘जो बीत गई सो बात गई।‘ काल ही तो सिखाता है – चरैवेति चरैवेति।
2025 के अंतिम दिन सूर्य उग आया है। दिसम्बर के अंतिम दस दिनों में सूरज कम ही उगा था। मुश्किल से दो दिन, मिरमिरयाया हुआ। सूरज को ठंडे कोहरे ने खूब घेरा है। उसे उगने ही नहीं दे रहा। कभी-कभी हाथी भी चींटी के सामने विवश हो जाता है। हाथी को इस बात का कभी अहसास नहीं होता। वह तो प्रचंड अहंकार में डूबा रहता है। जिधर नजर दौड़ाइए, आपको प्रचंड अहंकार में डूबे लोग मिल जायेंगे। यह जानते हुए कि अहंकार जीवित नहीं रहता। अहंकार की कहानियाँ मनुष्य को बहुत प्रभावित नहीं करती। बुद्ध ईसा पूर्व हुए, लेकिन जीवित हैं। हमारा जीवन अहंकार में नहीं, करूणा में है। विध्वंस में नहीं, सृजन में है। जरूरी नहीं कि बुद्ध, गांधी या ईसा बनें। हम जो हैं, वही रहें। उसी को चटख बनायें। उदासी के रंग तो होते ही हैं, अपने जीवन को हंसी-ठिठोली से भर दें। हमें न हाथी बनना है, न शेर बनना है। न गाय बनना है, न गीदड़ बनना है। हमें तो मनुष्य बनना है और मनुष्य धर्म का निर्वाह करना है। लाख समस्याएँ आयें। उबरने और उबारने की कोशिश करनी है। हमें तो उनको भी शुभकामनाएँ देनी है जो निर्लज्ज हो गये हैं। हमें हरेक के घर संदेश देना है –
“न कोई रंज का लम्हा किसी के पास आए।
खुदा करे कि नया साल सबको रास आए।“

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







[…] इन दिनों : 2025 का सफर, ये कैसा सफर […]