(विकास, सत्ता और आत्मघाती सभ्यता पर एक राजनीतिक विमर्श)
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गाँव के किनारे एक नदी है। पहले एकदम किनारे थी, बिल्कुल सटी हुई। लेकिन अब दूर चली गई है। नदी के साथ चलती हुई एक सड़क भी है। कहते हैं कि जब नदी चली थी तो सड़क भी उसके साथ हो ली थी। नदी चली थी तो सड़क भी चली थी। लोग दोनों के इस आद्यंत संबंध पर आश्चर्य करते थे। लोग उन्हें सदा-संगिनी कहते थे। लोग दोनों के सह-संचरण की कथा सुनाते नहीं अघाते। स्मृतियों में बसी यह मनोहर कथा बताती है कि सभ्यता जहाँ जाती है, नदी भी वहीं जाती है; सड़क जहाँ जाती है, जीवन भी वहीं जाता है। पर धीरे-धीरे यह संबंध टूटता चला गया। सड़क सत्ता के साथ चलने लगी और नदी उद्योगों के साथ।
और गाँव?
वह वहीं पर अपने से अपनों को दूर होते देखता रहा।
गाँव में एक बुजुर्ग है। गाँव का सबसे बुजुर्ग। वह केवल उम्र से बूढ़ा नहीं है। बल्कि उस समय का साक्षी है, जब प्रकृति और मनुष्य के बीच अनुबन्ध था, शोषण नहीं। वह गाँव, नदी और सड़क के बारे में बहुत सारी बातें बताता है। वही बताता है कि नदी कभी इतनी चौड़ी थी कि उसे पार करना मुश्किल था और गहरी इतनी कि हाथी भी डूब जाये। जब नदी गाँव से सटकर बहती थी तो बरसात में उसका पानी खेतों में भर जाता था मानो आलिंगन में ले रहा हो! जब भी ऐसा होता था तो खेतों में सोना उगता था।
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नदी केवल नदी नहीं थी, जीवनधारा थी। वह केवल खेतों को सींचती भर नहीं थी, गाँव के लोग उसके साथ जीते थे। छठ में नदी के किनारे पूरा गाँव इकट्ठा होकर उगते और डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते थे। दीपावली में हरेक घर से एक दीप उसके अविरल जल में प्रवाहित करते थे। नदी की नन्हीं लहरें उन दीपों से झिलमिलाकर अपनी ख़ुशी प्रकट करती थीं। गाँव का हर भाई सामा-चकेवा की डोली को उसके प्रवाह में डालकर भाई-बहन के प्रेम को अनंत के लिए प्रस्थान कराता था। कोई भी पर्व-त्योहार हो, हरेक घर से पकवान उस नदी को अर्पित किया जाता था, मानो वह देवता हो! ऐसी ही और ढेर सारी बातें वह बुजुर्ग बताता है।
लेकिन बताते-बताते वह गहरा उच्छवास लेता है, जैसे उसका कुछ खो गया हो; कल तक जो था, अब उसके पास नहीं है!
वह बताता है कि पहले जो खेतों में पानी भर जाने को उर्वरता कहा जाता था, अब उसे बाढ़ कहा जाने लगा। पहले जिस नदी के कारण खेत सोना उगलते थे, अब उसे जन-धन की तबाही कहा जाने लगा। बाहर से मिट्टी ला-लाकर नदी को अनुशासन सिखाया गया कि उसे कहाँ बहना है और कहाँ नहीं।
यही वह क्षण था, जब प्रकृति से लोकतंत्र छीन लिया गया।
पहले नदी से नहरें निकलती थीं, अब पाइपलाइनें आती हैं। पहले पानी जीवन सींचता था, अब उद्योगों के काम आता है। पहले नदी देवता थी, अब वह ड्रेनेज है। पहले उसकी नन्हीं लहरें दीपशिखाओं से जगमगाती थीं, अब कुछ लोग मिलकर उसकी आरती करते हैं। लोगों ने नदी की जमीन जोत ली। यह ‘अवैध अतिक्रमण’ नहीं कहलाया, इसे ‘कृषि-विस्तार’ कहा गया। नदी अब भी है। लेकिन न उतनी चौड़ी, न ही उतनी गहरी। दिन-दिन कृशकाय होती जा रही है, मानो कोई दुख उसे भीतर-ही-भीतर खाये जा रहा हो!
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केवल नदी ही दूर नहीं हुई, उसके साथ खेतों की उर्वरता भी दूर हो गई, खेती की लागत भी बढ़ गई – खाद की लागत, सिंचाई की लागत। उत्पादन से ज़्यादा। इससे पूँजीपतियों के घर तो भरे, मगर खेतिहर विपन्न हो गए। हैरान-परेशान लोगों ने खेती छोड़कर आजीविका के दूसरे उपायों की ओर रूख किया। उनकी इस जरूरत को पूरा करने के लिए नदी की जमीन पर ही एक फैक्ट्री खुल गई। यह नदी का ‘एनक्रोचमेंट’ नहीं, बल्कि सभ्यता का ‘इन्फ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट’ कहा गया। गाँव के नौजवान वहाँ काम करने लगे। नदी के दूर होने ने जीवन को बदल दिया – अस्तित्व और विचार को भी। कल तक जो अपना काम करते थे, अब वे दूसरे का काम करने लगे।
फैक्ट्री ने नदी की जमीन ली, उसका निर्मल पानी लिया और फिर नदी के पानी को ही जहरीला बनाकर नदी में गिराया – अनुमति के साथ, लाइसेंस के साथ। परिणाम हुआ कि जो मछलियाँ आजीविका का साधन थीं, सारी-की-सारी मार गईं। लोग अब नदी का पानी नहीं पीते। नहाने से भी डरते हैं। जिस नदी ने सभ्यता बनायी, उसी से मनुष्य डरने लगा। जीवन से अधिक मूल्य पूँजी का हो गया।
बताते-बताते बुजुर्ग की साँसें उखड़ने लगती हैं। वह कुछ देर रुकता है। फिर आगे बताता है। वह बताता है कि नदी के पार सघन जंगल हुआ करता था। इतना सघन कि वृक्षों और झाड़ियों से निकलते हुए बदन पर खरोंचें आ जाती थीं। जंगल विशाल वृक्षों और दुर्लभ औषधीय पौधों से पटा था। सूरज जब अपने घर जाने की तैयारी करता, उस समय तरु-शिखाओं पर असंख्य रंग-बिरंगे पक्षियों का कलरव नदी को पार करके गाँव तक आता था। जंगल में कई बड़े-बड़े पहाड़ थे, पृथ्वी के मुकुट की तरह। कितनी गुफाएँ और कंदराएँ थीं। न जाने कितनी पुरानी! लोग उन कंदराओं के बारे में तरह-तरह के किस्से कहते थे – कुछ डरावने, कुछ विस्मयकारी। गाँव के बच्चे तैरकर उस पार जाते थे। लौटते हुए अपने साथ फल और लकड़ियाँ लाते थे – किसी ठेकेदार की अनुमति के बिना, वन विभाग के अपराधी रजिस्टर में दर्ज हुए बिना। क्योंकि तब जंगल संसाधन नहीं था, शासक की ‘सरकारी भूमि’ नहीं था, पूँजी का ‘अप्रयुक्त संसाधन’ नहीं था, बल्कि वह सहचर था। बाहरी लोगों के लिए वह जंगल पर्यटन-स्थल था, प्राकृतिक धरोहर था, सेल्फी-पॉइंट था। लेकिन गाँव के लोगों के लिए राशन कार्ड था, औषधालय था, रोजगार था और सुरक्षा भी।
लेकिन जंगल भी अब वैसा नहीं रहा। सभ्यता की असामान्य जरूरतों ने विशाल वृक्षों को धराशायी कर दिया। जिन जड़ों ने नदी के कटाव को रोका था, वे जड़ें काट दी गईं। पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हुआ—और फिर उसी असंतुलन को नए प्रोजेक्ट्स का कारण बना दिया गया। पूँजी का यही दुष्चक्र है—विनाश पैदा करो, फिर समाधान बेचो।
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बड़े-बड़े धमाकों ने उत्तुंग पर्वतों को मिट्टी में मिला दिया। इतने बड़े धमाके, कि लोगों के मकान दरक गए। लेकिन किसी ने इसकी परवाह नहीं की। इधर जीवन तबाह होता रहा, नदी सिमटती रही, पर्वत मिटते रहे और उधर इन सबकी लाश पर सभ्यता समृद्ध होती रही। क्योंकि सभ्यता को पर्वतों के लोथड़ों की जरूरत थी और पूँजीपति को मुनाफा कमाने की। गाँव के लोग अब उस जंगल से दातून भी नहीं काट सकते थे, लेकिन विशाल वृक्षों को कानूनी कागजों के साथ काट दिया गया और पर्वतों को परियोजनाओं के नाम पर मिटाकर रेल की पटरियों और सड़कों पर बिछा दिया गया।
बुजुर्ग ने बताया कि जंगल और नदी को बचाने के लिए धरती के नीचे से रेल की लाइन निकाली गई। कहने को जंगल और नदी को बहुत परिश्रम करके बचा लिया गया। लेकिन नीचे के ख़ालीपन से मिट्टी सूख गई, उसकी नमी चली गई। इसके साथ ही रहा-सहा हरा-भरा जीवन भी चला गया। इससे शासन का शर्म तो छिप गया, मगर जंगल सूख गया।
अब जंगल पर्यटन-स्थल है। नदी में नावें चलती हैं। शहरों से आए लोग नावों से नदी पार कर जंगल में पिकनिक मनाने आते हैं। अपनी और परिवार की तस्वीरें लेते हैं और जगह की सुंदरता की प्रशंसा करते हैं। ये वे लोग हैं, जो जंगल के अतीत की सुंदरता को नहीं जानते। वे नहीं जानते कि जिसका शव इतना सुंदर है, वह ख़ुद कितना सुंदर रहा होगा।
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मैं बुजुर्ग को प्रणाम कर बाहर आता हूँ तो शाम होने लगी थी। उस दिन पूर्णिमा थी। चंद्रमा की धवल किरणों में कुछ लोग नदी की आरती कर रहे थे। गौर से उन लोगों को देखा। वह आस्था नहीं, विनाश के अपराध बोध का नाट्यांतरण था। इन सबसे निरपेक्ष नदी अनमने भाव से बही जा रही थी, मानो कोई बूढ़ी औरत धरती पकड़कर किसी तरह चल रही हो!
स्पष्ट हो रहा था कि सभ्यता ने पर्यावरण का ही नहीं, मनुष्यता का भी विनाश किया है। यह केवल उस नदी की मृत्यु नहीं है, यह उस सभ्यता की आत्महत्या है, जिसने पानी को संसाधन समझा, जंगल को कच्चा माल समझा और जीवन को बाधा। जो नदी मरी है, वह पहले ग़रीबों की थी। जो जंगल कटा है,वह पहले आदिवासियों का था। जो पानी ज़हरीला हुआ है, वह पहले मेहनतकशों ने पिया था। यह विकास नहीं—एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के भविष्य की लूट है।
नदी दूर नहीं हुई है, हमें दूर कर दिया गया है अपने भविष्य से।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।






[…] दूर हो गई नदी […]
[…] दूर हो गई नदी […]
पृथ्वी पर उपलब्ध जीवनदायिनी को संसाधन के रूप में जब से देखना शुरू किया गया तभी से आत्मघाती विकास की शुरुआत हो गई। जीवन के सहारे को संसाधन बना दिया गया है। लेख सारगर्भित हैं।
धन्यवाद राजीव जी! आपकी यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। आभार।