दूर हो गई नदी

"बाहरी लोगों के लिए वह जंगल पर्यटन-स्थल था, प्राकृतिक धरोहर था, सेल्फी-पॉइंट था। लेकिन गाँव के लोगों के लिए राशन कार्ड था, औषधालय था, रोजगार था और सुरक्षा भी।" - इसी आलेख से

(विकास, सत्ता और आत्मघाती सभ्यता पर एक राजनीतिक विमर्श)

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

Dr. Anil Kumar Roy
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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

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4 Comments

  1. पृथ्वी पर उपलब्ध जीवनदायिनी को संसाधन के रूप में जब से देखना शुरू किया गया तभी से आत्मघाती विकास की शुरुआत हो गई। जीवन के सहारे को संसाधन बना दिया गया है। लेख सारगर्भित हैं।

    • धन्यवाद राजीव जी! आपकी यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। आभार।

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