इन दिनों : बदलते वक्त में बेचैन चेतना

"सुख कब दुख में बदल जाता है, कहा नहीं जा सकता। देह बहुत सुखी हुआ तो डायबिटीज, ब्ल्डप्रेशर, कैंसर। मन को ज्यादा सुख मिला तो अकेलापन।" - इसी आलेख से

पहली जनवरी बीत गई। कुहरे से पटा हुआ संसार है। ताड़ के पेड़ मुझे यों भी संन्यासी की तरह दिखते हैं और सफेद कुहरा जब उससे लिपट जाता है, तब संन्यासी होने में कोई संदेह नहीं रहता। ताड़ हँसता कम ही है। हवा चले तब भी, न चले तब भी। तटस्थ रहता है। हाँ, गर्मी के दिनों में जब उसके पत्ते बूढ़े हो जाते हैं और वे पेड़ में ही लटक कर डमखोले बन जाते हैं तो हवा चलने पर खड़र – खड़र की आवाज आती है। उस वक्त उसका संन्यासी मन भटक जाता है। वर्षों से एक स्थल‌ पर खड़ा ताड़ कुछ तो सोचता होगा! अब तो कोई रस निकालने भी नहीं आता। बल्लारियाँ निकलती हैं और समय के साथ खत्म हो जाती हैं।‌

आम ने भी अपना रूप बदल दिया है। बीजू आम लगभग खत्म हो गये। उसके पेड़ बहुत बड़े होते थे। अब तो शंकर आम का युग है। पेड़ छोटे और आम बड़े। गाँव घर में भी देशी गाय खत्म हो रही है और जर्सी गाय का बाहुल्य है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि देशी गाय माता है। जर्सी गाय नहीं। गाँव घर में माता को बचाने का उपाय त्रिवेदी जी को सोचना चाहिए। जब माँ ही नहीं बचेगी तो उसके नाम पर राजनीति कैसे होगी? बेचारी माता, बहुत कष्ट में है। चाहे वह गाय हो या फिर मानव। माँ को कौन पूछता है। जो खंखर हो जाता है, उसकी औकात ही समाज में क्या है?

कबीर के समय में भी माँ की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। वे लिखते हैं – ‘कर गहि केस करै जो घाता, तऊ न हेत उतारै माता।’ पुत्र इतना बेहया होता है कि माँ के सिर के बाल पकड़ कर घात करता है। लेकिन माँ तो माँ है, वह अपने प्रेम पर दृढ़ रहती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक ललित निबंध लिखा है – शिरीष के फूल। इस निबंध में वे लिखते हैं – दिन दस फूला फूलि के ख़खड़ हुआ पलास।‌ जीवन तो ऐसा ही है। दस दिन ही फूलना है, फिर तो पलास की तरह खंखड़ हो जाना है।‌ लेकिन आदमी सबसे अशांत प्राणी है। हर वक्त कुछ न कुछ करता रहता रहता है। अगर वह कुछ करता नहीं है और बैठा रहता है तो सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। दिमाग की उड़ान उसे थिर रहने नहीं देती। कितनी ही बातें एक साथ सोचता है – परस्पर विरोधी, संभव, असंभव, सबकुछ।

आदमी की दुनिया विचित्र है! उसे विचित्रताओं में ज्यादा रस आता है। विचित्रताओं के पीछे भागता रहता है। कितनी विचित्र चीजों का उसने आविष्कार किया। पहले देह को सुख पहुँचाने के लिए और अब मन को सुख पहुँचाने के लिए। सुख कब दुख में बदल जाता है, कहा नहीं जा सकता। देह बहुत सुखी हुआ तो डायबिटीज, ब्ल्डप्रेशर, कैंसर। मन को ज्यादा सुख मिला तो अकेलापन। अकेलापन एक गंभीर बीमारी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया का युग है। भारत के किसी गाँव में बैठा हुआ बच्चा अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन या दुनिया के किसी अन्य देश के लोगों से मीडिया – दोस्ती कर लेता है। कुछ दिनों तक बहुत मज़ा आता है उसकी चकाचौंध में खोया रहता है। पड़ोस छूटता चला जाता है, फिर अकेला हो जाता है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हजारों दोस्त हैं, मगर कोई साथ में नहीं है।‌ गाँव की गलियों का खेल खत्म हो रहा है। न गुल्ली, न डंडा, ना कबड्डी, कबड्डी में भी दो- राजा कबड्डी और धुआ कबड्डी। गोबर का रस रस, दोलपत्ता। उछलना कूदना, भागना – दौड़ना। आपसी मारपीट, चिढ़ाना, चिढ़ना।

सामाजिकता और हेलमेल के सभी अवसर स्थगित हैं। आदमी को मन और देह दोनों को स्वस्थ रखने की ईमानदार पहल करनी होगी।‌ चेतावनी के स्वर तो उभर ही रहे हैं। उसे सुनना जरूरी है।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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