निराला ने एक कविता लिखी है- ‘स्नेह निर्झर बह गया है।’ उस कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं –
‘स्नेह-निर्झर बह गया है !
रेत ज्यों तन रह गया है ।आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है-“अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-
जीवन दह गया है’
अंधेरा ही है अभी। ठंड हड्डी कंपा देने वाली है। निराला की यह कविता याद आयी। स्नेह-निर्झर का चुक जाना एक हकीकत है। इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। देह को रेत हो जाना है। दुनिया में ओल्ड ऐज होम खुलता जा रहा है। क्यों? बूढ़ों के लिए घर में कोई जगह नहीं है। जवान को लगता है कि वह कभी बूढ़ा नहीं होगा। पत्रहीन वृक्ष पर कोई क्यों आयेगा बैठने? उसे क्या मिलेगा? हरेक आदमी को तो चाहिए। संबंध लेन-देन पर टिका है।
बूढ़ों की बात छोड़ दीजिए। जवानों की हालत देखिए। सत्रह साल की एक युवती को पिता और पुत्र ने मिलकर काट डाला, क्योंकि वह लड़की एक विजातीय लड़का से प्रेम करती थी। स्नेह निर्झर तो यहाँ भी चुक ही गया था। फर्जी इज्जत की भेंट चढ़ गई। पिता और भाई के हृदय का स्नेह कहाँ मर गया? ऐसा नहीं है कि यह समाज सिर्फ बूढ़ों के प्रति ह्रदयहीन है। हमारी उम्मीदें जिसके प्रति चुक जाती हैं, हमारा हृदय रेत बन जाता है। आदमी को अपना स्वभाव नहीं खोना चाहिए। ह्रदय हीनता से संसार पीड़ित है।
विश्व में आप फाइव ट्रिलियन इकोनॉमी हो जायें। अच्छी बात है। आपके जोड़-घटाव की प्रतिभा उजागर होगी। देश के अंदर धधकती आग का अहसास नहीं होगा। फाइव ट्रिलियन इकोनॉमी किसके पास है? किसका नियंत्रण है और कौन मालिक है? मुझे तो लगता है कि देश को बचाना है तो सत्य स्वीकार कीजिए। उसकी कमजोरी की पहचान जरूरी है। अगर आप अंदर से कमजोर होते हैं तो किसी की दादागिरी को न्यौता देते हैं। अमेरिका क्या कर रहा है? भारत को क्या करना चाहिए? अपने ही देश के अंदर नफ़रत बो कर देश को मजबूत नहीं कर सकते। हम तो देश के अंदर ही लड़ रहे हैं। लोगों को घृणा की ट्रेनिंग दे रहे हैं। दो कौड़ी के आदमी के हाथ में तलवार थमा दी है। खैर।
गाँव आ गया हूँ। सुबह टहलने निकला तो मन मुग्ध हुआ। सरसों के सरसाते पीले फूल, तीसी और खेसारी के नीले और केराअव (मटर) के सफेद – गुलाबी फूल। कहीं आलू, कहीं धनिया, कहीं बूंट (चना) और कहीं गेहूँ। सूर्य पू्र्व क्षितिज पर। गाँव की गालियाँ और घर बदल गये हैं। यह स्वाभाविक है। जो मेरे साथ थे। उनमें कुछ गुजर गए। कुछ पहचान नहीं पा रहे। हाँ, आम के नये नये पौधे बहुत लग गये हैं। गाय और बैलों ने अपनी दुनिया समेट ली है। वे कहीं कहीं नजर आते हैं। सुधांशु त्रिवेदी को राजनीति करने में मुश्किल होगी, जब उनकी राजनीति की माता नहीं रहेगी। जो भी गायें हैं, वे जर्सी में बदल जायेगी। जर्सी गायें माता नहीं होतीं। उसकी ब्रीड अलग होती है और सुधांशु त्रिवेदी को यह पसंद नहीं है कि कोई अलग ब्रीड देशी माता का स्थानापन्न हो।
हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक जाति और अनेक संस्कृतियाँ हैं। जो बहुल संस्कृति से प्यार करेगा, वही सच्चा भारतीय होगा। लेकिन कुछ बददिमाग लोगों को लगता है कि एक देश, एक संस्कृति होनी चाहिए। जीने और रहने के तरीके हैं विभिन्न तरह की संस्कृतियां। उसका नाभि-नाल संबंध वहाँ की जमीन, हवा और लोगों के रहन-सहन से है।
हम संस्कृति की जड़ काट कर देश की रक्षा नहीं कर सकते। अगर अपनी जड़ों का सम्मान नहीं करते और उसे काटते हैं तो आप अपनी ही जड़ खोदते हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






[…] इन दिनों : जीने की कला में छेद […]
[…] इन दिनों : जीने की कला में छेद […]
[…] इन दिनों : जीने की कला में छेद […]