(बहुसंरेखण की कसौटी पर ईरान और भारत की विदेश नीति)
भारत की विदेश नीति आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ भावनात्मक आग्रह, वैचारिक निष्ठाएँ या एकपक्षीय दबाव निर्णयों का आधार नहीं बन सकते। बहुसंरेखण—जिसे भारत अपनी रणनीतिक विशेषता के रूप में प्रस्तुत करता है—का वास्तविक अर्थ है राष्ट्रीय हितों के अनुसार विकल्पों का विस्तार। ईरान के साथ भारत के संबंध इसी नीति की सबसे कठिन, लेकिन अनिवार्य परीक्षा है।
भारत अपने कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85–90 प्रतिशत आयात करता है। यह कोई अस्थायी संकट नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक निर्भरता है। वर्ष 2018–19 में ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता था, जिसकी हिस्सेदारी 10–12 प्रतिशत थी। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह आपूर्ति लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई। इसके विपरीत, यूक्रेन युद्ध के पश्चात भारत ने रूस से तेल आयात में असाधारण वृद्धि की। वर्ष 2024–25 में रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना, जिसकी हिस्सेदारी 35–40 प्रतिशत और आयात मूल्य लगभग 52 अरब डॉलर रहा। यह निर्णय किसी वैचारिक समर्थन का नहीं, बल्कि सस्ते तेल, ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति नियंत्रण के ठोस आर्थिक गणित का परिणाम था। यहीं से एक मूल प्रश्न उठता है—जब वही यथार्थवादी गणित रूस के मामले में स्वीकार्य है, तो ईरान के संदर्भ में वही दृष्टिकोण क्यों ठहर जाता है?
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ईरान को केवल ऊर्जा आपूर्तिकर्ता के रूप में देखना भारत की रणनीतिक दृष्टि को सीमित करता है। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भारत की महाद्वीपीय विदेश नीति की रीढ़ हैं। यह गलियारा व्यापार समय को 30–40 प्रतिशत और लागत को 20–30 प्रतिशत तक घटाने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि इसे चीन की ‘बेल्ट एंड रोड पहल’ का सबसे ठोस और व्यावहारिक विकल्प माना जाता है। वर्ष 2024 में हुआ भारत-ईरान का दस वर्षीय चाबहार समझौता इस बात की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि भूगोल को लंबे समय तक कूटनीतिक दबावों के अधीन नहीं रखा जा सकता। यदि भारत ईरान से दूरी बनाए रखता है, तो इसका लाभ केवल तेहरान को नहीं, बल्कि चीन-पाकिस्तान रणनीतिक गठजोड़ को मिलता है। ग्वादर, सीपीइसी और पश्चिम एशिया में बढ़ती चीनी सक्रियता पहले ही क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती दे रही है। ईरान के साथ संबंधों का कमजोर होना भारत की मध्य एशिया, अफगानिस्तान और यूरोप तक पहुँच को सीमित करेगा—और यह एक ऐसी रणनीतिक रिक्तता होगी, जिसे भरने के लिए चीन तत्पर रहेगा।
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अक्सर तर्क दिया जाता है कि अमेरिका के साथ भारत के गहरे रणनीतिक और आर्थिक संबंध ईरान पर स्वतंत्र नीति को अव्यावहारिक बनाते हैं। किंतु आँकड़े इस तर्क की सीमाएँ उजागर करते हैं। भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर से अधिक है, जबकि भारत-ईरान व्यापार 2 अरब डॉलर से भी कम पर सिमट गया है। यह अंतर स्पष्ट करता है कि भारत अमेरिका का विरोधी नहीं है—पर यह भी उतना ही स्पष्ट है कि मजबूत साझेदारी का अर्थ अपने रणनीतिक विकल्पों का आत्मसमर्पण नहीं होता। बहुसंरेखण का वास्तविक अर्थ किसी एक शक्ति के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि सभी विकल्पों को खुला रखना है। इतिहास गवाह है कि जो राष्ट्र अपने रणनीतिक विकल्प स्वयं नहीं चुनते, उनकी विदेश नीति अंततः दूसरों की प्राथमिकताओं से संचालित होने लगती है।
ईरान पर भारत की नीति भावनाओं या दबावों से नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कनेक्टिविटी और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के संतुलन से तय होनी चाहिए। प्रतिबंध अस्थायी होते हैं, भूगोल स्थायी और विदेश नीति का दायित्व स्थायी हितों की रक्षा करना होता है।

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।







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