वर्ष 2020 की 29 जुलाई को केंद्र सरकार के कैबिनेट से स्वीकृत होकर लागू होने के साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 विवादों से घिरी रही है। तब से लेकर आज तक केंद्र सरकार, उसके मंत्री और अनेक बार प्रधानमंत्री ख़ुद जितनी इस नीति की वकालत करते रहे हैं, उससे कहीं ज़्यादा तल्ख़ अंदाज़ में देश भर के शिक्षाविद इसका विरोध करते रहे हैं। अब इस शिक्षा नीति को लागू हुए पाँच वर्ष पूरे हो गए हैं और इसके अनेक दुष्प्रभाव भी दिखने लगे हैं। इस आलेख में इस शिक्षा नीति का विरोध किए जाने के कारणों की पड़ताल करने के साथ ही प्रभावों की भी चर्चा करेंगे।
निरस्तीकरण की माँग क्यों?
1. इस शिक्षा नीति को संसद में न तो कभी पेश नहीं किया गया और न ही पारित कराया गया। केवल मंत्रिमंडल की स्वीकृति के आधार पर इसे लागू कर दिया गया। इस तरह यह एक दल की नीति बनकर रह गई है। इसे लागू करने के लिए लोकतांत्रिक तरीक़े का पालन नहीं किया गया है।
2. संविधान के अनुसार शिक्षा समवर्ती सूची में है। लेकिन यह नीति केंद्र द्वारा राज्यों पर थोपी गयी है। केंद्रीय नियामक निकाय, केंद्रीकृत पात्रता, मूल्यांकन-परीक्षण और केंद्रीय आधार पर पाठ्यक्रम आदि के नियमन एवं निर्देशन के द्वारा राज्यों के अधिकारों का हनन किया गया है। इस तरह यह असंवैधानिक ढंग से देश के संघीय ढाँचे पर आघात करती है। अब वित्तीय अवरोध उत्पन्न करके केंद्र सरकार ने राज्यों को इस नीति का पालन करने के लिए विवश कर दिया है।
3. इस नीति में 3 से 6 वर्ष की उम्र वाले बच्चों को भी 5+3+3+4 के ढाँचे में शामिल कर लिया गया है (राशिनी, स्कूल शिक्षा), (राशिनी, 1.5)। ज़ाहिर है कि 12वीं कक्षा तक के स्कूल सभी टोले में नहीं खुल पायेंगे। जब आंगनबाड़ियों को 12वीं कक्षा तक वाले विद्यालयों से जोड़ दिया जाएगा तो छोटे और कमजोर सामाजिक-आर्थिक समुदाय के बच्चों का स्कूल पहुँचना असंभव हो जाएगा। इस तरह स्कूल की और बढ़ते हुए कदम, बड़ी संख्या में, अपने घर-आँगन में ही ठहर जाएँगे। परिणाम भी दिखने लगा है। यह नीति लागू होने के बाद लाखों की संख्या में नामांकन में कमी आई है।
4. प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा को ‘आदिवासी बहुल क्षेत्रों की आश्रमशालाओं में भी शुरू’ (राशिनी, 1.8) किए जाने की नीति से आदिवासी बहुल पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों के लिए बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा अनौपचारिक हो जाएगी। 2008 में ही शुरू की गई आश्रमशाला की विफल अवधारणा को इस अनुशंसा के द्वारा पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा की जवाबदेही आश्रमशालाओं को सौंपने की अनुशंसा एक कुत्सित साज़िश प्रतीत होती है, जिसमें इसे आरएसएस की आश्रमशालाओं को सौंप दिए जाने की योजना की बू आती है, जहाँ सरकारी वित्तपोषण के द्वारा बाल्यावस्था से ही सांप्रदायिकता तथा संस्कृति एवं इतिहास की विकृत शिक्षा दी जा सकेगी।
5. इस शिक्षा नीति के अनेक प्रावधान राज्य सरकारों के सरकारी विद्यालयों पर ही लागू होंगे, केंद्रीय विद्यालयों तथा केंद्रीय या प्रांतीय संगठनों से संबद्ध निजी विद्यालयों पर नहीं। जिस तरह ‘मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार’ क़ानून केवल राज्य सरकारों पर बाध्यकारी है, केंद्रीय विद्यालयों और निजी विद्यालयों पर नहीं, उसी तरह यह नीति भी केंद्रीय और निजी विद्यालयों को छूट देने की नीति है।
6. प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा में भी ‘पियर ट्यूटरिंग’ और ‘वॉलेंटियर्स के लिए बड़े पैमाने के अभियान में भाग लेना बहुत आसान’ (राशिनी, 2.7) बनाए जाने की नीति निर्धारित की गई है। इन प्रावधानों से प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा को, सरकार के द्वारा दायित्व-निर्वाह की प्रतिबद्धता के बदले, अनौपचारीकरण और निजीकरण की ओर ढकेला जा रहा है। इसके साथ ही विद्यालयों में धार्मिक और सांप्रदायिक कार्यकर्ताओं को प्रवेश दिलाने की राह बनायी गई है।
7. बच्चों के पोषण संबंधी नीति में विचित्र विरोधाभास है। एक ही अनुच्छेद में पहले कहा गया है कि ‘सुबह में पौष्टिक नाश्ते के बाद के कुछ घंटों में कई मुश्किल विषयों का अध्ययन अधिक प्रभावी होता है’। इसलिए मध्याह्न भोजन के साथ सुबह के नाश्ते की भी बात कही गई है। लेकिन उसी जगह पौष्टिक विकल्प के रूप में ‘गुड़ के साथ मूँगफली/गुड़ मिश्रित चना और/या स्थानीय स्तर पर उपलब्ध फल उपलब्ध कराया जा सकता है’ (राशिनी, 2.9) का विकल्प भी सुझाया गया है। इस नीति के द्वारा भर पेट भोजन कराने की मध्याह्न भोजन योजना (अब ‘प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना’), उत्साहवर्धक शब्दों में लिपटी होने के बाद चना-मूँगफली के रूप में रूपांतरित हो गई है। और शायद इसी ‘पौष्टिक’ विकल्प को नियमित बनाने के लिए मध्याह्न भोजन की योजना में लगातार कटौती की जा रही है।
8. पहले ओपन स्कूल के द्वारा माध्यमिक एवं व्यावसायिक स्तर की परीक्षाएँ संचलित की जाती थीं। परंतु अब कक्षा 3, 5 और 8 के बच्चों को भी उसकी जद में लाकर खड़ा किया गया है (राशिनी, 3.5)। किसी के लिये भी यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि प्राथमिक कक्षाओं के, विशेषकर अभिवंचित परिवारों से आने वाले, बच्चे इस दूरस्थ माध्यम से कितना और क्या सीख पायेंगे, जो व्यवहारत: पढ़ाई नहीं, बल्कि परीक्षा लेने और सर्टिफिकेट देकर साक्षरता दर को दुरुस्त करने की एजेंसी है।
9. इस नीति में ‘निजी स्कूल के निर्माण संबंधी नियमों को हल्का’ (राशिनी, 3.6) बनाकर सरकारी विद्यालयों के मुक़ाबले निजी विद्यालयों को प्रोत्साहित किया गया है। शायद निजी हाथों में शिक्षा को सौंपने में सफलता पाने के लिए ही शिक्षा के केंद्रीय बजट में लगातार कमी की जा रही है।
10. विद्यालय की वर्तमान प्रणाली में ‘बड़े पैमाने पर बच्चे नहीं सीख रहे हैं’, यह मानते हुए सुप्रशिक्षित और समर्पित शिक्षकों की व्यवस्था विकसित करने के बदले ‘पियर ट्यूटरिंग’ (साथी के द्वारा पढ़ाया जाना) और ‘वॉलेंटियर्स को बढ़ावा देने के नवीन मॉडल स्थापित करने पर बल’ (राशिनी, 2.7) दिये जाने से शिक्षण-प्रक्रिया अनौपचारिक होगी। यह शिक्षा में अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक लोगों के प्रवेश का रास्ता बनाया गया है।
11. इस शिक्षा नीति में सिद्धांत रूप में स्वीकार किया गया है कि ‘छोटे बच्चे अपने घर की भाषा/मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक तेज़ी से सीखते और समझ लेते हैं’ (राशिनी,4.11)। फिर भी मातृभाषा में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को अनिवार्य नहीं माना गया है। बल्कि यह कहकर कि ‘जहाँ तक संभव हो’, कम-से-कम ग्रेड 5 तक लेकिन बेहतर यह होगा कि यह ग्रेड 8 और उससे आगे तक भी जारी हो। शिक्षा का माध्यम, घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होगी। इसके बाद, घर, स्थानीय भाषा को जहाँ भी संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा (राशिनी, 4.12) यह व्यवस्था विद्यालयों और सरकारों को मातृभाषा/स्थानीय भाषा में पढ़ाने या न पढ़ाने की स्वतंत्रता भी प्रदान कर देता है। इस तरह माध्यम भाषा के रूप में मातृभाषा/स्थानीय भाषा को अपनाने की अवधारण को धराशायी कर देता है। फिर कक्षा 3 से अन्य भाषाओं में भी पढ़ाने की छूट दी गई है (राशिनी, 4.12)।
12. कक्षा 6 से ही कौशल विकास के नाम ‘आनंददायी कोर्स’ (?) के रूप में स्थानीय व्यावसायिक शिल्प, जैसे ‘बढ़ईगिरी, बिजली का काम, धातु का काम, बाग़वानी, मिट्टी के बर्तनों के निर्माण, आदि’ (राशिनी, 4.26) सिखाये जाएँगे। इससे ग़रीब बच्चे कम आय वाले जातीय पेशे की ओर ढकेले जाएँगे। इससे जातीयता की जड़ें भी ज़्यादा गहरी होंगी और जातीय विभेद के उन्मूलन के प्रयासों में रुकावट उत्पन्न होगी।
13. शिक्षा स्वयं में एक संपूर्ण ध्येय है। कौशल उसका सहजात उत्पाद हो सकता है, मुख्य नहीं। इस शिक्षा नीति के अनुसार कक्षा 6 से ही कौशल विकास का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। उधर कक्षा 3, 5 और 8 में परीक्षाएँ ली जायेंगी (राशिनी, 4.40), जिनमें छात्र अनुत्तीर्ण भी हो सकते हैं। फिर विभिन्न विषयों के अंतर को भी समाप्त कर दिया गया है। इससे यह आशंका बलवती होती है कि बाल्यावस्था की प्रारंभिक कक्षाओं में ही बच्चे अनुत्तीर्ण होकर कौशल विकास की कक्षाओं में ढकेल दिये जाएँगे और पाठ्यक्रम के नये विधान के अनुसार उन्हें ड्राप आउट भी नहीं कहा जाएगा।
14. इस शिक्षा नीति में ‘संस्कृति’, ‘परंपरा’, ‘विरासत’, रीति-रिवाज’, ‘भाषा’, ‘दर्शन’, ‘प्राचीन’, स्वदेशी’, ‘पारंपरिक’ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’, “अतुल्य! भारत” आदि शब्दों का बारंबार विशेष बलपूर्वक प्रयोग यह आशंका उत्पन्न करता है कि यह नीति भारत के वैविध्य के सौंदर्य को नष्ट करने तथा समाज को रूढ़िवादी जकड़नों की ओर ढकेलने का शिक्षाशास्त्रीय प्रयास है।
15. इस नीति में नीतिगत रूप से ‘पाठ्यपुस्तक सामग्री को सार्वजनिक परोपकारी भागीदारी और क्राउड सोर्सिंग द्वारा वित्तपोषित’ (राशिनी, 4.32) किए जाने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय से पाठ्यपुस्तक की सामग्री के निर्माण में निजी भागीदारी के लिए स्थान बनाया जा रहा है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि पाठ्यपुस्तक के प्रकाशन के लिए नहीं, बल्कि पाठ्यपुस्तक की सामग्री के लिए बाह्य भागीदारी निमंत्रित किए जाने की बात कही गई है। इससे पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में धार्मिक-राजनीतिक संगठनों के प्रवेश की राह बनायी गई है। इस तरह शिक्षा का मूल अर्थ ही विलुप्त हो जाएगा और वह स्वार्थलिप्त कुछ पिपासुओं के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली मात्र बनकर रह जाएगी।
16. इस नीति में निर्देश है कि राज्यों को अपना पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकें एनसीआरटी के पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों के आधार पर तैयार करना है (राशिनी, 4.32)। राज्यों से बिना सहमति लिए यह निर्णय राज्यों पर थोपा गया है। यह समवर्ती सूची में शिक्षा के होने के संवैधानिक प्रावधान का अतिक्रमण है। यह नीतिगत रूप से शिक्षा के केंद्रीकरण का प्रयास है तथा भारत की भिन्नता को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता की अनदेखी करना है। अनेक प्रदेशों ने अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं को भुलाकर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का ही अनुगमन किया है और उसी आधार पर पुस्तकें तैयार कर रहे हैं। इन पुस्तकों में या तो अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों और घटनाक्रम को हटा दिया गया है या विकृत करके पेश किया गया है, पौराणिक कथाओं और किंवदंतियों को ऐतिहासिक-वैज्ञानिक रूप में परोसा गया है और वैज्ञानिक खोजों की उपेक्षा की गई है।
17. इस नीति में परीक्षामुक्त अध्ययन की नीति को बदल दिया गया है। अब कक्षा 10 और 12 के साथ ही कक्षा 3, 5 और 8 में भी परीक्षा होगी और उसमें छात्र फेल-पास भी होंगे (राशिनी, 4.40)। कई राज्य सरकारों ने इस फेल-पास की योजना पर अमल करना शुरू भी कर दिया है। लेकिन शिक्षा अधिकार क़ानून में आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई में किसी भी बच्चे को किसी भी तरह रोके जाने का निषेध है (RTE Act, Chapter IV, Section 16)। पहले तो शिक्षा अधिकार के उल्लंघन की नीति बनी, फिर शिक्षा अधिकार कानून में ही संशोधन करके “नो डिटेंशन पालिसी” को समाप्त कर दिया गया।
18. परीक्षाओं में फेल अक्सर कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चे ही होते हैं। बच्चों को फेल किए जाने के इस नीतिगत निर्णय से, शिक्षा के माध्यम से वर्ग-विभेद की जिस खाई को पाटने का प्रयास किया जा रहा था, उसे फिर से चौड़ा किए जाने की कोशिश शुरू हो जाएगी।
19. यह नीति ‘कम संख्या वाले’ स्कूल को चलाना ‘व्यावहारिक नहीं’ मानकर स्कूल बंद किए जाने की अनुशंसा करती है। (राशिनी, 7.2) यह अनुशंसा एक ओर तो शिक्षा अधिकार की अनदेखी करती है, दूसरी ओर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में कम छात्र-संख्या वाले स्कूल की आवश्यकता को भी नजरअंदाज करती है।
20. यह नीति ‘स्कूलों का समेकन’ की अनुशंसा करने के साथ 5 से 10 किलोमीटर पर स्कूल क्लस्टर के निर्माण की अनुशंसा करती है। इस क्लस्टर में आंगनबाड़ी से लेकर उच्चतर माध्यमिक तक की कक्षाएँ संचालित होंगी। राशिनी, 7.6) व्यवहारत: ये क्लस्टर स्कूल कमजोर, दिव्यांग और लड़कियों के लिए स्कूल तक पहुँच को मुश्किल बना देंगे, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में बच्चे या तो नामांकित नहीं होंगे या ड्रॉपआउट होंगे। यह नीति कमजोर वर्ग के बच्चों को पढ़ने के अवसर से वंचित करने की नीति है। इस नीति के आने के बाद सभी राज्यों ने ताबड़तोड़ स्कूल बंद करने शुरू कर दिए हैं। और, अब तो स्कूल बंद किए जाने को न्यायालय के द्वारा भी उचित ठहरा दिया गया है।
21. क्लस्टर स्कूल की नीति का अनुपालन करते हुए देश में प्रारंभिक चरण में 14,500 पीएमश्री स्कूल खोले जाने की घोषणा की गई है तथा केन्द्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों को भी पीएमश्री नाम दिए जा रहे हैं। राज्य सरकार के पहले से संचालित विद्यालयों को ही पीएमश्री नाम देकर पड़ोस के विद्यालयों को उसमें समाहित किया जा रहा है।
22. छात्रों का आकलन और मूल्यांकन भी केन्द्रीकृत मानकों पर राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र, परख (समग्र विकास के लिये ज्ञान का प्रदर्शन मूल्यांकन, समीक्षा और विश्लेषण) के द्वारा होगा (राशिनी, 4.41)। विविधतापूर्ण भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्रों के आकलन के लिए एक मानदंड का निर्धारण उस कहानी को चरितार्थ करता है, जिसमें कहा जाता है कि जंगल के स्कूल की परीक्षा पास करने के लिए सभी जानवरों के बच्चों के लिए पेड़ पर चढ़ने की परीक्षा में पास करना आवश्यक था। उस परीक्षा में बंदर का बच्चा तो फर्स्ट डिवीज़न से पास हुआ, लेकिन हाथी का बच्चा फेल होने के कारण मुँह लटकाये हुए घर वापस गया और उस हाथी के बच्चे के माता-पिता ने भी उस बच्चे को ही कोसा। इसलिए सामाजिक बोध का कोई भी समाजशास्त्री इस तथाकथित एकता के दुष्परिणामों को सहज ही समझ सकता है।
23. ‘विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर बोझ को काफ़ी कम करने के लिए’ विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा का केंद्रीकरण कर दिया जाएगा और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के द्वारा एकीकृत अंडरग्रेजुएट, ग्रेजुएट और फेलोशिप की परीक्षा ली जाएगी (राशिनी, 4.42)। प्रवेश परीक्षा के केंद्रीकरण से एक ओर तो महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों का पदानुक्रम स्थापित हो जाएगा, अर्थात् सबसे अच्छा महाविद्यालय-विश्वविद्यालय अमुक है, उससे बाद दो नंबर पर अमुक है, तीन नंबर पर अमुक है, ठीक उसी तरह जैसे समाज में जातियों का पदानुक्रम स्थापित है। दूसरी ओर अधिक अंक लाने वाले छात्र इस पदानुक्रम के कारण ऊपर रहनेवाले महाविद्यालय-विश्वविद्यालय में नामांकित होकर कुलीन छात्रों की तरह देखे जाएँगे, बाक़ी छात्र अंकों के आधार पर पिछड़े और दलित-महादलित महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में ही जगह पाएँगे। इसका परिणाम उन्हें मिलने वाली नौकरियों में भी दिखाई देगा। दूसरी ओर कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले मेधावी छात्र अपने पड़ोस के महाविद्यालय में नामांकन लेकर अपनी पढ़ाई पूरी कर ले पा रहे थे, मगर अब आवंटित महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में ही नामांकित होने की विवशता होगी। लेकिन वे बाहर जाकर पढ़ने के अतिरिक्त व्यय का वहन करने में सक्षम नहीं होंगे। इसलिए प्रवेश परीक्षा की इस नयी व्यवस्था में बहुतेरे छात्रों, विशेषकर छात्राओं, की पढ़ाई बीच में ही छूट जाने की संभावना है। —- केंद्रीकृत परीक्षा लेने वाली एजेंसी अपनी क्षमता, पारदर्शिता और ईमानदारी का लगातार प्रदर्शन कर ही रही है!
24. शिक्षकों के लिए कई सारी सकारात्मक बातें स्वीकार की गई हैं। जैसे, ‘शिक्षक वास्तव में बच्चों के भविष्य को आकार देते हैं’, ‘शिक्षकों के लिए उच्चतर दर्जा और उनके प्रति आदर और सम्मान के भाव को पुनर्जीवित करना होगा’ (राशिनी, 5.1), ‘शिक्षकों की क्षमताओं को अधिकतम स्तर तक बढ़ाना होगा’ (राशिनी, 5.8), प्रशासनिक कार्य, मध्याह्न भोजन एवं अन्य ग़ैर-शैक्षिक कार्यों में संलिप्तता को कम करना (राशिनी, 5.12), पाठ्यक्रम तथा पढ़ाने के तरीक़ों के चयन में स्वायत्तता (राशिनी,5.12), स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय कार्यशालाओं में भाग लेना (राशिनी, 5.15) आदि अनेक बातें सैद्धांतिक रूप से कही गई हैं। लेकिन इसके साथ ही उनकी पदोन्नति और वेतन-वृद्धि को जटिल बनाते हुए कहा गया है कि अब ‘कार्यकाल अवधि या वरिष्ठता के बजाय सिर्फ़ निर्धारित मानकों के आधार पर पदोन्नति और वेतन में वृद्धि होगी’ (राशिनी, 5.20)।
वे मानक क्या हैं? इसके लिए पहले ही कहा गया है कि ‘शिक्षकों के प्रदर्शन के सही आकलन के लिए राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार द्वारा मल्टीपल पैरामीटर्स‘ की एक व्यवस्था को स्थापित किया जाएगा, जो सहकर्मियों द्वारा की गई समीक्षा, उपस्थिति, समर्पण, सीपीडी के घंटे और स्कूल और समुदाय में की गई अन्य सेवा या पैरा 5.20 में दिये गये एमपीएसटी पर आधारित है। इस नीति में, कैरियर के संदर्भ में ‘कार्यकाल’ से आशय प्रदर्शन और योगदान के आकलन के बाद स्थायी रोज़गार से है, जबकि ‘कार्यकाल ट्रैक’ से आशय स्थायी होने से पूर्व परिवीक्षा अवधि है। (राशिनी, 5.17)
इसका आशय क्या है? इसका आशय है कि शिक्षकों को स्थायित्व, वेतन-वृद्धि और पदोन्नति के लिए इन मानदंडों से होकर गुजरना होगा। पहले तो योग्यता के नाम पर शिक्षक पद पर नियुक्ति को ही कई परीक्षाओं, परिवीक्षाओं, प्रदर्शनों आदि से गुजरने के कारण कठिन बना दिया गया है, फिर एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद भी पद पर टिके रहना और वेतन-वृद्धि तथा पदोन्नति पाना और भी दुरूह बना दिया गया है। सहकर्मियों के द्वारा की जाने वाली समीक्षा का अर्थ आपसी तालमेल बैठाने की क्षमता का आकलन से है। परंतु भारतीय शैक्षिक वातावरण में कई बार अच्छा काम करने वाले शिक्षकों को किस प्रकार विरोध की दृष्टि से देखा जाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। गिजुभाई बधेका के ‘दिवास्वप्न’ से परिचित हरेक पाठक इस आदर्शात्मक अपेक्षा की व्यावहारिक परिणति से परिचित है। समर्पण का आकलन करना भावात्मक और व्यक्ति-सापेक्ष निर्णय है। फिर यह अधिकारियों और प्रधान अध्यापक को ही करना होगा। इस तरह अपने ‘समर्पण’ को साबित करके पदोन्नति पाने के लिए शिक्षक को अब अपने अधिकारियों और प्रधान शिक्षक के सम्मुख ‘समर्पित’ रहना होगा। इस तरह शिक्षक गरिमा की बात, जो पहले सैद्धांतिक रूप में कही गई है, व्यावहारिक धरातल पर आते-आते चकनाचूर हो जाती है और व्यवहारतः शिक्षक पहले से भी ज़्यादा दयनीय कर्मचारी के रूप में परिणत हो जाएगा।
25. इस नीति में माना गया है कि छात्रवृत्ति, प्रोत्साहन राशि, नक़द हस्तांतरण, साइकिल योजना आदि के कारण विद्यालयों में बच्चों की भागीदारी बढ़ी है और नीतियों को ‘अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए।’ (राशिनी, 6.4) छात्रों के लिए चलने वाली लाभकारी योजनाओं के लाभकारी प्रभाव की इस स्वीकृति के बावजूद शिक्षा और छात्र कल्याण योजनाओं के बजट में लगातार कटौती हो रही है। (2016-17 के बाद आम बजट का तुलनात्मक अध्ययन) अर्थात् इस नीति के उत्साहवर्धक सैद्धांतिक पक्ष का व्यावहारिक प्रतिफलन एकदम विपरीत हो रहा है।
26. ‘दिव्यांग बच्चों की पहुँच सुनिश्चित करने की दृष्टि से’ (राशिनी, 6.5) ‘प्रारंभिक स्तर से उच्चतर स्तर तक की शिक्षण प्रक्रियाओं में सक्षम’ (राशिनी, 6.10) बनाने के लिए उनकी शिक्षा को अनौपचारिक कर दिये जाने की व्यवस्था कर दी गई है। दिव्यांग बच्चों के लिए उपयुक्त तकनीक का उपयोग, उपयुक्त शिक्षक और विद्यालय के बुनियादी ढाँचे में सुधार की बात तो शिक्षा अधिकार के दायरे में पहले से ही है, लेकिन शिक्षा तक मुश्किल से पहुँच बना सकने वाले इन बच्चों के लिए इस नीति में इन व्यवस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के बदले ‘सहपाठी शिक्षण’, ‘मुक्त विद्यालयी शिक्षा’, ‘काउंसलर’, ‘प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता’ (राशिनी, 6.5) आदि की अनुशंसा के द्वारा उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर किए जाने की व्यवस्था कर दी गई है।
27. गंभीर रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए ‘गृह आधारित शिक्षा’ की व्यवस्था की जाएगी और उनके स्तर को ‘अन्य बच्चे के समतुल्य’ माना जाएगा। (राशिनी, 6.12) एक-एक दिव्यांग बच्चे के लिये अलग-अलग तकनीक और विषय के शिक्षकों को तैनात किए जाने की संभाव्यता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है और फिर जिन बच्चों को घर पर पढ़कर ही सर्टिफिकेट दिया जाएगा, श्रम के बाज़ार में उनकी योग्यता सदैव संदेह के घेरे में रहेगी। इस तरह दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने का एक सैद्धांतिक भ्रम इस नीति में सृजित किया गया है।
28. एक ओर यह तो कहा गया है कि “स्कूल के पाठ्यक्रम में किसी भी पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता को हटा दिया जाएगा” (राशिनी, 6.20), लेकिन नए पाठ्यक्रम पूर्वाग्रह पर ही आधारित हैं। हाल के दिनों में इतिहास, राजनीति विज्ञान और साहित्य के सीबीएसई पाठ्यक्रम में किए गए बदलाव और कुछ पाठों को हटाया जाना राजनीतिक-धार्मिक पूर्वाग्रह का ही परिणाम है। इस तरह इस शिक्षा नीति के सिद्धांत और व्यवहार में अनेकत्र विरोध दिखाई देते हैं।
29. यह प्राचीनकाल के स्वर्णयुग होने की अवधारणा को पुनर्स्थापित करती है। प्राचीनकाल की वह व्यवस्था लिंग और वर्ण-भेद पर आधारित थी। अतः यह आधुनिकता और सामाजिक समानता की विरोधी है। यह प्रचीनकाल में भी केवल ब्राह्मणवादी धारा का महिमामंडन करती है। बुद्ध, महावीर, चार्वाक, सूफ़ी, इस्लामी, सिख आदि परंपराओं की उपेक्षा करती है। अतः यह भेदभाव पर भी आधारित है।
30. यह नीति देश की अधिसंख्यक वंचित आबादी के लिए स्कूल परिसर, एकल शिक्षक विद्यालय, घर बैठे शिक्षा, डिजिटल ई विद्या द्वारा एकपक्षीय डिजिटल शिक्षा, मुक्त विद्यालयी शिक्षा आदि का प्रावधान करती है। इससे शैक्षिक असमानता की वृद्धि होगी। यह समानता के उस मौलिक अधिकार की अवहेलना है, जिसका पालन राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।
31. इस नीति में ‘मेरिट’ को शिक्षकों की योग्यता और पात्रता की शर्तों के रूप में नहीं, बल्कि ‘संस्था और समाज के प्रति नेतृत्व गुणों को दिखाने’ के रूप में समझा गया है। इससे विशेष राजनीतिक प्रतिबद्धता वाले व्यक्तियों को शैक्षिक संस्थानों में प्रशासनिक एवं अन्य दूसरे ऊँचे पदों पर लाने की गुंजाइश का दरवाजा खुलता है।
32. इस नीति में अनुसूचित जाति / जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, विकलांग तथा अन्य वंचित वर्गों को सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान का उल्लेख नहीं करती है।
33. इस नीति में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की अनदेखी की गई है, जो स्वतंत्रता के संघर्ष की विरासत और संविधान की आत्मा है।
34. इस नीति में ‘मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009’ का चलते-फिरते ढंग से उल्लेख हुआ है। एक बार इसे 3 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए विस्तृत करने की बात कही गई है, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं किया गया है। कहीं भी शिक्षा के इस संवैधानिक अधिकार को सभी बच्चों तक पहुँचाने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर नहीं की गई है, बल्कि उसे कमजोर करने के अनेक प्रावधान गढ़े गये हैं।
35. इस शिक्षा नीति में डिजिटल, दूरस्थ और अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था, परीक्षा के तरीक़े और उच्च प्राथमिक कक्षाओं से ही पारंपरिक कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था से 85% बच्चे कम आय वाले पारिवारिक व्यवसायों की और ढकेल दिये जाएँगे। इससे जाति व्यवस्था और जाति-आधारित उत्पादन व्यवस्था की हिलती हुई जड़ें मज़बूत होंगी।
36. उर्दू संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध है। इसके बावजूद यह नीति उसके बारे में कुछ नहीं कहती है। बल्कि हर स्तर पर संस्कृत को थोपने के प्रावधान प्रस्तुत करती है।
37. यह नीति एकरूपता और केंद्रीकरण की नींव पर खड़ी है। पाठ्यचार्य, पाठ्यपुस्तक, नामांकन-प्रणाली, परीक्षा-प्रणाली – सबके केंद्रीकरण की कोशिश की गई है। यह क्षेत्रीय विविधता, भाषायी विविधता और ज्ञान की विविधता की अनदेखी करता है।
38. इस नीति में निजी संस्थानों को ‘परोपकारी संस्थान’ कहा गया है और इनके नियमन में छूट देकर इन्हें बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। इस तरह यह नीति ‘परोपकारी संस्थानों’ के छद्म से बिना किसी प्रभावी नियंत्री तंत्र की स्थापना के निजी व्यावसायिक संस्थानों को बढ़ावा देती है।
39. यह नीति अनुदानों और छात्रवृत्ति में कमी लाकर सेल्फ फ़ाइनेंसिंग कोर्स और छात्र ऋण को प्रोत्साहित करता है। इससे ग़रीब और कमज़ोर पृष्ठभूमि आने वाले बच्चे उच्च शिक्षा में आने से वंचित होंगे।
40. कक्षा 3, 5, 8, 10 एवं 12 में परीक्षा की अनुशंसा करके यह नीति शिक्षाधिकार क़ानून की ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ की अवहेलना करती है। अब ‘नो डिटेंशन पालिसी’ को समाप्त कर भी दिया गया है। इससे शिक्षा से वंचित समुदाय की शिक्षा पर बहुत गहरा असर पड़ेगा।
41. उच्च शिक्षा संस्थानों के अनुदान को NAC और आउटपुट की गुणवत्ता से जोड़ने का मतलब है कि कुछ कुलीन संस्थाएँ ही जीवित रह पायेंगी और अन्य संस्थाएँ, पोषण के अभाव में, स्वतः दम तोड़ देंगी।
42. इस नीति में चार वर्षीय स्नातक डिग्री कोर्स की अनुशंसा है। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में इस चार वर्षीय स्नातक डिग्री कोर्स के विरुद्ध छात्रों और शिक्षकों के प्रदर्शन के कारण खुद भाजपा ने उसे वहाँ ख़त्म किया था। लेकिन इस नीति में फिर से इसकी अनुशंसा की गई है।
43. स्नातकोत्तर को 2 वर्ष से घटाकर एक वर्षीय बनाने तथा एमफिल डिग्री को हटाने की अनुशंसा से उच्चतर शिक्षा की गुणवत्ता और शोध की क्षमता बेतरह प्रभावित होगी।
44. यह नीति औपचारिक शिक्षा से बाहर निकलने के कई विकल्प प्रदान करती है। जैसे, कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा का विकल्प, स्नातक स्तर पर एक साल-दो साल के बाद भी पढ़ाई छोड़ना आदि। इस तरह यह ‘ड्रॉपआउट’ या शिक्षा से बाहर ढकेले जाने को वैध बनाती है। इससे कमजोर सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों का औपचारिक शिक्षा में ठहराव मुश्किल हो जाएगा।
45. उच्च शिक्षा आयोग (HECI) और उसके चार अंग (NHERC, NAC, HEGC और GEC) के कारण उच्च शिक्षा के हरेक स्तर पर केंद्रीकरण बढ़ जाएगा और उच्च शिक्षा संस्थाएँ राज्यों के नियंत्रण से केंद्र के नियंत्रण में चली जायेंगी। इससे राज्यों के अधिकार का हनन होगा।
46. इस नीति में शोध को नियंत्रित करने के लिए ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन’ (NRF) की स्थापना अनुशंसित है। इससे एक तो अकादमिक शोध पर केंद्र का नियंत्रण हो जाएगा; दूसरा, शोध कार्यों को पार्टी के एजेंडा के अन्तर्गत पोषित एवं प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे अकादमिक शोध-कार्य बुरी तरह प्रभावित होगा। जैसा कि दिखाई भी पड़ रहा है कि ‘अग्निवीर’की तर्ज़ पर ‘शोधवीर’ भी ‘हायर’ किए जा रहे हैं।
47. यह नीति संविधान के अनुच्छेद 246 की अवहेलना करते हुए सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में नामांकन के लिए NTA के माध्यम से केन्द्रीकृत परीक्षा-प्रणाली की वकालत करती है। एक ओर तो यह राज्य के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण है, दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में मौजूद भू-सांस्कृतिक भिन्नता की अनदेखी करती है। देश के विभिन्न भागों की स्कूली शिक्षा में मौजूद ग़ैर-बराबरी पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा।
48. NTA और PARAKH के द्वारा केन्द्रीकृत नामांकन एवं मूल्यांकन के कारण कॉरपोरेट कोचिंग को बढ़ावा मिलेगा और इससे वंचित समुदाय बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा से बाहर रह जाएगा।
49. नियमित शिक्षा के विकल्प के रूप में शिक्षा के सभी स्तर पर ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा की व्यवस्था से शिक्षा का अनौपचारीकरण होगा और इससे देश की शिक्षा का स्तर, जो पहले से ही चिंतनीय है, और भी बुरी स्थिति में चला जाएगा।
50. इस नीति के द्वारा विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में शैक्षिक व्यापार करने और उस मुनाफ़े को कहीं भी निवेश करने की छूट दी जा रही है। इससे एक ओर तो देश में पहले से विद्यमान बहु परती शिक्षा व्यवस्था में एक परत और जुड़ जायेगी, दूसरी ओर प्रमाणपत्र पर विदेशी मुहर को लालायित छात्रों-अभिभावकों पर खर्च और कर्ज का बेतहाशा बोझ बढ़ेगा। इन विदेशी विश्वविद्यालयों के बड़ी संख्या में आने से सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का अवमूल्यन भी होगा, जो किसी भी तरह राष्ट्रहित में नहीं है।
51. इस नीति में ‘मेरिट’ के आधार पर केन्द्रीकृत छात्रवृत्ति देने अनुशंसा की गई है। इसका अर्थ होता है कि सामाजिक-आर्थिक मानदंडों पर छात्रवृत्तियाँ बंद कर दी जायेंगी।
52. यह नीति संविदाकरण को बढ़ावा देने के लिए टेन्योर ट्रैक प्रणाली की अनुशंसा करती है।
53. इस नीति के अनुसार वरिष्ठता या अनुभव अब पदोन्नति का आधार नहीं होगा। इससे वरिष्ठ अधिकारियों की मनमर्ज़ी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा तथा शिक्षकों को गरिमापूर्ण सेवा की गुंजाइश से वंचित कर देगा।
54. यह नीति आंगनबाड़ी कर्मियों को न तो पूर्णकालिक पूर्वप्राथमिक शिक्षक का दर्जा प्रदान करती है और न ही उनके पूर्व प्रशिक्षण की व्यवस्था पर कुछ बोलती है।
55. यह नीति निजी विद्यालयों के साथ सरकारी विद्यालयों को जोड़ने की अनुशंसा करती है। इस तरह यह नीतिगत रूप से सरकारी विद्यालयों को हतोत्साहित करने की पेशकश करती है। इससे सरकारी विद्यालयों के निजी विद्यालयों में विलय का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
56. सरकारी और निजी स्कूल की जोड़ी बनाने से सरकारी स्कूल के शिक्षकों के वेतन की शर्तें भी प्रभावित होंगी।
57. शिक्षक और छात्र संगठनों को अपनी आवाज सरकार तक पहुँचाने की गुंजाइश समाप्त हो जाएगी।
58. यह नीति यह कहकर कि प्राचीन भारत में बहुविषयक शिक्षा की परंपरा रही है, आगे के लिए भी बहुविषयक शिक्षा की सिफारिश करती है। इसका अर्थ है कि कला, मानविकी, विज्ञान, व्यावसायिक आदि विषयों के बीच का भेद ख़त्म हो जाएगा। लेकिन कुछ दिन पहले संस्कृति मंत्रालय की ओर से जारी बयान में यह कहा गया कि भारतीय संदर्भ में यह संभव नहीं है।
59. त्रिभाषा फार्मूला काफी पहले से विवाद में रहा है। इसलिए इस नीति में त्रिभाषा फ़ार्मूले की अनुशंसा करने के साथ स्पष्ट करना चाहिए था, जो नहीं है। इस त्रिभाषा फार्मूले को अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिंदी लादने के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में कई राज्यों में हिंदी को लेकर खड़े हुए विवाद इसका प्रमाण है। इस तरह इस नीति में अनुशंसित और सरकार के द्वारा दबाव उत्पन्न किया जाने वाला त्रिभाषा फार्मूला देश के अनेक भागों में विवाद और बेचैनी का कारण बन गया है।
60. इस नीति में संस्कृत को ‘आधुनिक भारतीय भाषा’ मानते हुए अनुशंसा की गई है कि इसे ‘मुख्य धारा में लाया जाएगा’ तथा इस भाषा में गणित, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि विषय पढ़ाए जाएँगे। (राशिनी, 22.15)
61. यह नीति अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों में एकल शिक्षक विद्यालय और बिना पर्याप्त अधिसंरचना एवं प्रशिक्षित शिक्षक के बजट स्कूल को बढ़ावा देती है।
62. यह नीति यह मानती है कि “दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा पर होने वाला व्यय कभी भी कुल सकल घरेलू उत्पाद के 6% तक नहीं पहुँच पाया। —– यह आँकड़ा अधिकांश शिक्षित एवं विकासशील देशों से काफ़ी कम है।” (राशिनी, 26.1) इसके बावजूद सरकार के द्वारा शिक्षा के बजट को बढ़ाने का न तो प्रयास किया गया है और न ही प्रतिबद्धता जाहिर की गई है।
63. यह नीति बिना किसी लाग-लपेट के “शिक्षा के क्षेत्र में निजी परोपकारी गतिविधियों को पुनर्जीवित करने, सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करने और समर्थन करने की अनुशंसा करती है।” (राशिनी, 26.6)
64. यह पहला ऐसा दस्तावेज है, जो निजी संस्थानों को मुनाफ़ा कमाने और देश के भीतर और बाहर निवेश करने की छूट देता है।
65. यह नीति ख़तरनाक रूप से सरकारी शिक्षा संस्थाओं को निजी संस्थाओं के अधीन कर देने की अनुशंसा करती है।
66. यह नीति अभिजात मानसिकता का परिणाम है। इस नीति में संसाधनों की कमी को चतुराई से स्थापित किया गया है। लंबे समय से ऐसा इसलिए किया जाता रहा है ताकि अभिजात वर्ग का ज्ञान, रोज़गार और समाज पर प्रभुत्व क़ायम रहे। जबकि अनेक अर्थशास्त्रियों ने समय-समय पर यह सिद्ध किया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक विकास में व्यय का अभाव संसाधनों की कमी के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी के कारण है।
इस तरह यह पूरी शिक्षा नीति एक राजनीतिक और धार्मिक एजेंडा है। यह शिक्षा के अनौपचारीकरण, संप्रदायीकरण, केन्द्रीकरण और निजीकरण के चार पायों पर खड़ी है। इसीलिए शिक्षा की समझ रखने वाले और चिंता करने वाले तमाम शिक्षाविद और समाजशास्त्री इस शिक्षा नीति को तुरंत निरस्त करने की माँग करते रहे हैं।

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कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।








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