मैं जब तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग का अध्यक्ष था तो मैंने एक छोटी- सी फुलवाड़ी लगायी थी- हरसिंगार, तीन आम, अड़हुल, महोगनी, गुलाब आदि। सामने रामधारी सिंह दिनकर की प्रतिमा लगी थी। दिनकर प्रतिमा के पीछे एक छोटा-सा आम वृक्ष लगा था। मुझे यह आम बहुत भद्दा लगा था, इसलिए मैंने उसे जड़ से कटवा दिया। फिर कुछ दिनों के बाद देखा कि बची हुई जड़ों से कम से दस टहनियाँ स्वतंत्र ढंग से उग आयी हैं। मैंने सोचा कि अब जो हो, इसे नहीं कटवाना है।
विभाग से सेवानिवृत्त हुए ढाई वर्ष बीत गए हैं। कल जब मैं विभाग गया तो फुलवाड़ी में भी गया। दसों की दसों टहनियाँ पूरे वृक्ष बन गयी हैं और इस बार मंजर भी लगा है। इस आम्र-वृक्ष की जिजीविषा अद्भुत थी। न किसी ने पानी दिया, न उसके जीवन की रक्षा के लिए अतिरिक्त कोशिश की और वह तन कर खड़ा हो गया। मन-ही-मन प्रणाम किया और उसके सामने नतमस्तक हो गया।
प्रकृति शिक्षकों का भी शिक्षक है। जब मैं उदासी और निराशा में घिरे बच्चों द्वारा आत्महत्या की बात सुनता हूँ तो पहली धिक्कार की आवाज एक शिक्षक के हृदय से आती है। कैसी पीढ़ी बनाई हमने? मेरा जन्म गाँव में हुआ और पला भी गाँव में। गाँव में अभावों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन आत्महत्या की बात कभी नहीं सुनी। वे समस्याओं से लड़ते थे। लंगर डाल कर कुएँ में छलांग नहीं लगाते थे।
जिस विश्वविद्यालय में पढ़ा, नौकरी की और विश्वविद्यालय पदाधिकारी के बड़े पदों पर दायित्व -निर्वहन किया, उसे जब देखता हूँ और आकलन करता हूँ तो अच्छा नहीं लगता। कुलपति का पद आठ माह से खाली है। कुलाधिपति आठ में एक अदद कुलपति नियुक्त नहीं कर पाते। उनके दफ्तर से निर्देश जारी होते रहते हैं, लेकिन खुद विश्वविद्यालयों की देखरेख में भारी लापरवाही बरतते हैं। राजभवन को लोकभवन बना दिया गया, मगर उसकी कार्यशैली में क्या अंतर आया? अंग्रेजों के ये लाट साहब आजादी के बाद भी लाट ही बने रहे। ये लोक से इतर कोई प्राणी हैं। राज्यपाल का पद नकारा पद बन गया है। या तो केंद्र सरकार का हुक्म बजाओ। राज्य सरकार अगर केंद्र से अलग पार्टी की है, तो राज्यपाल उछलता रहेगा। मुख्यमंत्री के खिलाफ बयानबाजी करेगा और केंद्र का चरण चुंबन।
चुनाव आने के बाद राज्य में जो सरकार रहती है, वह राज्य का धन खूब लुटाती है। राज्य कर्जे में डूबा है, मगर कोई मतलब नहीं। रुपए बाँटो, वोट लो। बिहार में यह खेल चरम पर हुआ। यहाँ तक कि चुनाव के दरम्यान भी दस-दस हजार रुपए महिलाओं के खाते में गये। चुनाव आयोग भी चुप रहा। कोर्ट भी चुप था। वजह यह रही कि केंद्र सरकार समर्थित सरकार थी। अब तमिलनाडु की बारी है। वहाँ सरकार केंद्र समर्थित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने मुफ्त सुविधाओं पर सही सवाल किया है कि अगर सुबह से मुफ्त खाना, मुफ्त गैस, मुफ्त बिजली देंगे और सीधे खाते में पैसे भेजेंगे तो लोग काम क्यों करेंगे? सवाल गलत नहीं है। ग़लत यह है कि जब केंद्र सरकार, मध्यप्रदेश, बिहार, हरियाणा की सरकार ने यह कुकर्म किया तो आप चुप रहे। तमिलनाडु पर आँखें दिखा रहे हैं। यह सर्वथा ग़लत है। बिहार में तो आचार-संहिता का उल्लंघन कर सरकार के करोड़ों करोड़ रुपए लुटाए गये।
अगर बिहार में यह गोरखधंधा नहीं होता तो कम से कम जदयू-बीजेपी गठबंधन को इतनी तो नहीं आती। संदेह गहरा तब और हो जाता है, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा के हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट सुनता ही नहीं, उसे हाई कोर्ट भेज देता है। जिस मुख्यमंत्री को जेल में होना चाहिए। उसने संविधान को तार-तार किया है, लेकिन उसे केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण प्राप्त है। सैंया कोतवाल है तो फिर डर किस बात का।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर








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