“You can cut all the flowers, but you cannot keep spring from coming.” – पाब्लो नेरूदा
अमेरिका के स्थानीय चुनावों में राजनीतिक परिवर्तन की नयी आहट सुनाई पड़ती है। यह पूँजीवादी परेशानियों के विरुद्ध उत्पीड़ित बहुसंख्यकों, कम वेतन भोगियों, छात्रों और परेशान नागरिकों की अकुलाहट है। दूसरी बार सत्ता सँभालते ही ट्रम्प ने वह सब कुछ किया, जो कोई बेलगाम पूँजीवादी शासक कर सकता था। उसने कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा, पर्यावरण आदि अनेक मदों के फंड में कटौती की, अनेक देशों पर बेतुका टैरिफ़ लादकर बेतरतीब महँगाई पैदा की और इजरायल के पक्ष में खड़े होकर गाजा के घृणित नरसंहार को हवा दी। मार्क्स ने न भी कहा होता कि पूँजीवाद की चरम अवस्था के बाद समाजवाद आता है तो भी यह प्राकृतिक सिद्धान्त है कि जब अति हो जाती है तो बदलाव होता है। अमेरिका की नयी राजनीतिक आहट को मार्क्सीय परिप्रेक्ष्य में देखना तो अभी जल्दबाजी होगी, परंतु उसे सामाजिक प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में तो देखा ही जा सकता है।
नया राजनीतिक अंदाज
अमेरिकी चुनावों में डेमोक्रेट जोहरान ममदानी से लेकर कम्युनिस्ट हन्नाह श्वेट्स, डेनियल कार्सन, लुईसा दे पाउला संतोस तक की जीतें वहाँ की राजनीति में नये तरीके के चुनावी कैंपेन और वास्तविक जीवन से जुड़े जन मुद्दों की राजनीति का स्वाद उत्पन्न करती है। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में न्यूयॉर्क जैसे शहर के मेयर के रूप में भारी बहुमत से निर्वाचित होनेवाले ममदानी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर की तरह ही, अपने को ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ कहते हैं। इस ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ ने अमीरों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने, फ्री ट्रांसपोर्ट, यूनिवर्सल फ्री चाइल्ड केयर, होमलेसनेस के लिए ‘एवरी चाइल्ड एंड फ़ैमिली इस नोन’ का फंड बढ़ाने, हेल्थ केयर पर जोर देने, रेंट स्टेबलाइज्ड अपार्टमेंट पर स्थायी फ्रिज आदि योजनाएँ तर्कसंगत रूप से पेश कीं और लोगों का भरोसा जीता। चूँकि वे ग़रीबों के मुद्दे उठा रहे थे, जो अमीरों के विरुद्ध जाते थे, इसलिए छोटे-छोटे चंदों से चुनावी अभियान चलाया और पेड वर्कर्स के बदले वॉलंटियर्स का साथ लिया। बड़े-बड़े और महंगे विज्ञापनों के बदले अपने लगभग 50,000 वॉलंटियर्स के साथ डोर-टू-डोर, माउथ-टू-माउथ, अर्थात् व्यक्तिगत संपर्क पर भरोसा किया। और, परिणाम यह हुआ कि अपने विपक्षियों से भारी मतों से आगे निकलकर अमेरिका के हृदय न्यूयॉर्क के मेयर पद के चुनाव में सबसे आगे रहे।
जोहरान ममदानी तो डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं, अर्थात् अमेरिका के दो प्रमुख राजनीतिक दलों में से एक के। लेकिन हन्नाह, डेनियल और लुईसा तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ यूएसए से हैं। यह वही विचारधारा है, जिसे सोवियत संघ के उदय के साथ ही भय और आशंका की दृष्टि से अमेरिका में देखा जाता रहा है, एक बदनाम पार्टी के रूप में। यह वही पार्टी है, रेड स्केयर (1917-1920) के दौरान जिसके हज़ारों सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया और बिना किसी मुकदमे के हिरासत में रखा गया। दूसरे रेड स्केयर और मैकार्थीवाद (1947-1956) के दौरान हज़ारों कम्युनिस्ट शिक्षकों, मजदूरों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को नौकरी से निकाल दिया गया। केवल इसलिए कि इन्होंने नस्ली समानता, नागरिक अधिकार और श्रमिक अधिकारों के पक्ष में आंदोलन किए। इसलिए उद्योगपतियों, एफबीआई और मीडिया ने कम्युनिस्ट-विरोधी वातावरण बनाया, सरकार का सहयोग लिया और कम्युनिस्टों को नेस्तनाबूद करने के लिए दमन-चक्र चलाया। कम्युनिस्टों के विरोध का वातावरण वहाँ अभी समाप्त नहीं हुआ है। उनकी संख्या भी काफ़ी घट गयी है। इन सारे शासकीय विरोधों और नागरिक भय के बावजूद स्थानीय निकायों के चुनावों में सीपीयूएसए के तीन उम्मीदवारों का जीतना अमेरिका में बड़ी बात तो है ही, दुनिया के लिए भी एक संदेश है।
ये कम्युनिस्ट जीते कैसे?
इन्होंने भी लगभग वही तरीक़े और मुद्दे अपनाये, जो ममदानी ने अपनाये थे। समेकित रूप से वे मुद्दे थे सस्ती आवास नीति, किरायेदारों के अधिकार, ट्रेड यूनियन समर्थन, सरकारी स्कूलों के लिए अधिक फ़ंड तथा नस्लीय और सामाजिक न्याय। मध्य और निम्न आय वाले युवा मतदाता आर्थिक असमानता, स्वास्थ्य, शिक्षा और किराए के मुद्दे पर बेहद नाराज हैं। इथाका, न्यूयॉर्क से जीत हासिल करनेवाली हन्नाह श्वेट्स ने किराया, किरायेदारों के अधिकार, आवास संकट, बेघरपन, नस्लीय न्याय के साथ ही पुलिस जवाबदेही की भी बात की कि अगर पुलिस दुर्व्यवहार करे तो जाँच के लिए कम्युनिटी एकाउंटेबिलिटी बोर्ड बने तथा अप्रवासी LGBTQIA तथा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा-व्यवस्था हो। बैंगोर सिटी, मेन से जीतनेवाले डेनियल कार्सन ने उपर्युक्त आवास, किताया, शिक्षा, स्वास्थ्य, असमानता, सामाजिक न्याय आदि मुद्दों के साथ ही सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करने और कर्मचारियों को सम्मान और स्थिरता देने के वादे किए। काउंसलर के रूप में कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स से जीतनेवाली लुइसा दे पाउला संतोस ने भी उपर्युक्त मुद्दों के साथ ही समाज-केंद्रित नीतियों को मुद्दा बनाया तथा शिक्षा पर विशेष फोकस करते हुए सार्वजनिक शिक्षा, स्कूल के बजट, शिक्षक तथा कर्मचारियों की स्थिति में सुधार के वादे किए। गौरतलब है कि ये मुद्दे, जिसे ये काउंसलर चुनाव के दौरान उठा रहे थे, वे ऐसे मुद्दे थे, जिनसे वहाँ के मध्य एवं निम्न आय वर्ग के लोग परेशान हैं और खस्ताहाल में जी रहे हैं। अर्थात् वे जनता के मुद्दे, जनता के लिए थे।
चुनावी रणनीति
प्रश्न उठता है कि पूँजीपति राजनीतिक दलों के सम्मुख वे आर्थिक मामलों में टिके कैसे रह सके? इसके लिए उन्होंने दो काम किए। पहला यह कि पेड स्टाफ के बदले उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा किया। दूसरा यह कि बड़ा चुनावी चंदा नहीं लिया, बल्कि इसके बदले 15 डॉलर तक के छोटे चंदे लिए। इसके अलावा एक-एक व्यक्ति से सघन संपर्क करके उसे विश्वास दिलाया कि यह उम्मीदवार उनके हितों के लिए सोचता है और जीतने के बाद उनके हितों के कार्य करनेवाला है। यह कठिन था, मगर उन्होंने किया। ममदानी ने भी यही किया था, इन्होंने भी किया। इनकी रणनीति मिसाल कायम करती है कि ग्रासरूट पर जनता के साथ जुड़कर, बड़े विज्ञापनों की अपेक्षा कार्यकर्ताओं पर भरोसा करके और बड़े चंदों की उपेक्षा करके भी चुनावी सफलता के परचम लहराये जा सकते हैं।
चुनाव लड़ने का यह मॉडल दुनिया में अनेक बार अपनाया गया है और सफल रहा है। चिली के राष्ट्रपति गैब्रिएल बोरिक, वर्सिलोना, स्पेन के मेयर एडा कोलाओ, फिनलैंड के प्रधानमंत्री सन्ना मोस्ट्रियल, कनाडा के नगर पार्षद रिया जीन, दक्षिण अफ्रीका के ज़िगिसवा लोसी, कनाडा के जगमीत सिंह, मेक्सिको के राष्ट्रपति क्लाउडिया शैनबाम, फ्रांस के जीन-लुक मेलेंकोन आदि अनेक ऐसे प्रसिद्ध नाम हैं, जिन्होंने चुनाव में पूँजीपतियों के बड़े चंदों के बदले जनता-आधारित छोटे-छोटे चंदे लिए; जनता को अपने अभियान और नीति – दोनों में शामिल किया; जीने, खाने, रहने, आजीविका, शिक्षा, ट्रांसपोर्ट जैसे व्यावहारिक मुद्दे उठाए; बड़े विज्ञापनों के बदले जनता से सीधी बात की और पेड स्टाफ के बदले स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं पर भरोसा किया। भारत के कम्यूनिस्ट इसके उदाहरण हैं कि कुख्यात ‘इलेक्टोरल बांड’ की कालिख से वे अछूते रहे। सीपीआइएमएल 20-20 रुपए चंदा लेकर चुनाव लड़ी। विज्ञापनों के बदले जनसंपर्क तथा कर्मचारियों के बदले कार्यकर्ताओं के सहारे ये चुनाव लड़ते हैं। ये उदाहरण यह साबित करते हैं धन-बल के इस युग में जन-बल के सहारे भी जीत हासिल होती है।
क्या ये जीतें टिकाऊ हो सकती हैं?
अमेरिका में समाजवादी नीतियों और वामपंथी दलों की जीत रोशनी की एक किरण है, आशा का जागरण है। यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि जिस अमेरिका में कम्युनिस्टों को कलंकित माना जाता रहा है, वहाँ 40 वर्षों के बाद, छोटी-सी ही सही, मगर चर्चित जीत इन्होंने हासिल की। नीति और रणनीति दोनों में समाजवादी मुद्दे और वामपंथी तरीक़े को अपनाकर न्यूयॉर्क जैसे शहर के मेयर के रूप में चुने जाकर ममदानी ने बड़ी दस्तक दी है।
काउंसलर के रूप में जीतनेवाले तीन कम्युनिस्ट उम्मीदवारों के संदर्भ में ध्यातव्य है कि उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन की नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के लिए व्यवस्था में सुधार के समाजवादी रास्ते को अपनाया। यह भी वही रास्ता है, जिसे अपने को ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ कहनेवाले ममदानी ने अपनाया था।
आगे भी ये जीतें टिक सकती हैं, क्योंकि अमेरिका में आवास-संकट, बेघरपन, असमानता, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सामाजिक कल्याण की कमी व्यक्ति का नहीं, समाज का व्यापक मुद्दा है। जिन परिवारों को इन मुद्दों के साथ जूझना पड़ता है, वे सामाजिक न्याय, समानता, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक सेवाओं के समर्थन में खड़े होते हैं। 18 से 35 साल के अमेरिकन युवा आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा के महँगेपन से परेशान हैं। इसलिए सामान्य नागरिकों तथा युवाओं-छात्रों को समाजवादी नीतियाँ आकर्षक, भरोसेमंद और व्यावहारिक लगती हैं। ऐसे में यह संभावना बनती है कि आगे भी इन मुद्दों की जीतें हों।
बाधाएँ
लेकिन इन सफलताओं के दूर तक जाने में कई बाधाएँ भी हैं। अमेरिका में प्रोपोशनल रिप्रजेंटेशन नहीं है। इसलिए थर्ड पार्टी का वोट व्यर्थ माना जाता है। इसलिए समाजवादी डेमोक्रेट्स के लिए तो संभव है, लेकिन वामपंथियों के लिए कांग्रेस, गवर्नर या राष्ट्रपति के पद तक पहुँचना कठिन है। दूसरा, Fox, Sinclair, Daily Wire, New York Post आदि कुछ प्रभावशाली दक्षिणपंथी मीडिया हैं, जो समाजवाद/वामपंथ की छवि बहुत ख़राब रूप में पेश करते हैं और लोगों के मन में इनके प्रति आशंका और भय उत्पन्न करते हैं। तीसरा यह कि बड़े राजनीतिक दल जब छोटे दलों के मुद्दों की ओर मतदाताओं को आकर्षित होते हुए देखते हैं तो वे उन लोकप्रिय मुद्दों को हथिया लेते हैं। ऐसी स्थिति में छोटे दलों की ओर आकर्षित होते हुए मतदाताओं का बड़े दलों की ओर शिफ्टिंग हो जाता है। चौथा यह कि समाजवादी/वामपंथी मुद्दों के विरोध में सारे पूँजीपति एकजुट हो जाते हैं, जैसा कि ममदानी के जीतने के बाद कई पूँजीपतियों ने शहर छोड़ने तथा राष्ट्रपति ने न्यूयॉर्क के फंड में कटौती की घोषणा कर दी। पाँचवाँ कि वामपंथी दलों के तीन काउंसलर की जीत को वामपंथी नीतियों की जनस्वीकृति के रूप में देखा जाना जल्दबाजी होगी। जैसा कि Pew, Gallup आदि के सर्वे बताते हैं कि युवा पीढ़ी पूँजीवाद और कल्याणकारी राज्य के पक्ष में हैं। अर्थात् वे पूँजीवादी व्यवस्था और समाजवादी लोक कल्याण का मेल चाहते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वे वामपंथ को पसंद करने लगे हैं। इसलिए अभी वामपंथियों को भी डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट की तरह स्थानीय जनमुद्दों को लेकर आगे बढ़ना होगा।
क्या भारत में यह राजनीतिक रास्ता अपनाया जा सकता है?
भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना अमेरिका से बहुत भिन्न है। अमेरिका में भी नस्ली विभेद है। इसके बावजूद अश्वेत केन्याई पिता के पुत्र बराक ओबामा वहाँ के राष्ट्रपति बने। परंतु भारत के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा नहीं सोचा जा सकता है। यहाँ सांप्रदायिक-धार्मिक ध्रुवीकरण ऐसा है कि सत्ताधारी दल से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। इसलिए सांप्रदायिक आवेग में यहाँ जीवन को प्रत्यक्षतः प्रभावित करनेवाले व्यावहारिक मुद्दे अक्सर अप्रभावी रह जाते हैं।
दूसरा, दुनिया के अन्य देशों से बिल्कुल अलग यहाँ का समाज अनगिनत जातीय साँचों में बँटा है। इन सभी जातियों के अलग-अलग मुद्दे हैं, अक्सर अंतर्विरोध और विद्वेष भी। ऐसे अंतर्विभक्त समाज में वर्ग आधारित समूह बनाने में कठिनाई होती है। यह कठिनाई मुद्दों को बहुसंख्यकों के लिए लोकप्रिय बनाने में भी होती है। चुनाव का समय आने पर मतदाता अक्सर अपनी-अपनी जातीय छतरी के नीचे एकजुट हो जाते हैं, भले ही बाद में वे ठगा हुआ महसूस करें। परंतु अपनी जाति के उम्मीदवार, चाहे वह जैसा भी हो, की जीत उन्हें सामाजिक संतुष्टि प्रदान करती है।
सामाजिक स्थिति से ही जुड़ी हुई भारत की अपनी सांस्कृतिक स्थिति भी है, जो उसे अधिकतर बाहर से आकर बसे अमेरिकियों की सांस्कृतिक स्थिति से भिन्न करती है। भारत के लोग आज भी हजारों वर्ष पूर्व अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े हैं। उन्हें अपनी संस्कृति, अपने रिवाज, अपने समुदाय, अपनी मान्यताओं से लगाव है। इन्हें अपने इन घेरों से बाहर निकलना असहज कर देता है, भले ही वे उनके खस्ताहाल होने के कारण क्यों न हों।
तीसरा यह कि, भारत में भी, बड़े राजनीतिक दल अक्सर छोटे दलों के लोकप्रिय मुद्दों को चुरा लेते हैं। जैसे, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के द्वारा किसानों को सहायता राशि दिए जाने के मुद्दे जब किसानों के बीच लोकप्रिय होने लगे तो उसे भाजपा ने अपना लिया और बिहार चुनाव में महागठबंधन के द्वारा युवाओं को नौकरी देने के मुद्दे के लोकप्रिय होते ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपना लिया। ऐसे में आमलोग विपक्ष की अपेक्षा सरकार पर अधिक भरोसा करते हैं, क्योंकि वह सत्ता में होती है।
चौथा यह कि ममदानी के द्वारा अमीरों पर अतिरिक्त कर लगाने की बात को वहाँ के लोगों ने पसंद किया, लेकिन इसके लिए उसने छोटे चंदों से फंड जुटाने की राह पकड़ी। लेकिन भारत में, वामपंथी दलों को छोड़कर, सारे दल कॉर्पोरेट फंडिंग से चलते हैं। इसलिए वे ऐसा मुद्दा उठा ही नहीं सकते। इसके लिए उन्हें जनजुड़ाव और पब्लिक फंडिंग की कठिन राह पर चलना होगा, जिसके लिए इनकी तैयारी नहीं है। दूसरी ओर यह मोदी के विकास मॉडल से टकराएगा। कहा तो यह जाता है कि पीएमओ के तीन सचिवों को केवल इसलिए पदावनत कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने संचिका पर कॉर्पोरेट टैक्स लगाने की वकालत कर दी थी। इसलिए ऐसी राह अपनाने से वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व, पूँजीपति वर्ग और उनके नियंत्रण की मीडिया उसके ख़िलाफ़ खड़े हो जाएँगे। भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के पास इनकी खिलाफत की काट की न तो रणनीति है, न तैयारी है और मंशा भी नहीं दिखती है।
पाँचवाँ यह कि अमेरिका और भारत की आर्थिक स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है। अमेरिका मुफ्त सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं को दूर तक चला सकता है। परंतु भारत के संदर्भ में इसके लिए सोच-समझकर कदम उठाने पड़ेंगे। चुनावी उत्साह में कई तरह के वादे करके कई राज्य सरकारों की साँस फूल रही है। लोकतंत्र का कल्याणकारी चरित्र होना ही चाहिए। परंतु सत्ता-प्राप्ति के नुस्ख़े के रूप में इसका प्रयोग आत्मघाती हो सकता है और शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जरूरी सेवाओं को प्रभावित कर सकता है।
छठा यह कि भारत में अनेक संस्थागत कमजोरियां हैं, जो प्रगतिशील अभियान में बाधक हैं। वर्तमान केंद्रीय सत्ता से लेकर, चुनाव आयोग, गहन मतदाता पुनरीक्षण, ईवीएम, प्रशासन, मीडिया आदि पर गहरे प्रश्नवाचक चिह्न लगे हैं।
बहुत सारी बाधाएँ हैं। कई ऐसी भी, जो यहाँ कहीं नहीं गई हैं और कई ऐसी भी, जिन्हें पार पाना बेहद कठिन है, जैसे सांप्रदायिक, जातीय, सांस्कृतिक मान्यताओं के अवरोधों को तोड़ना। फिर भी उस रास्ते को भारत में भी अपनाया जा सकता है, क्योंकि देश बदलने से मानवीय आकांक्षाएँ और जरूरतें नहीं बदलती हैं। इसलिए प्रगतिशील राजनीति करनेवालों को इन बाधाओं को पार करने की योजना बनानी होगी। इसके लिए नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरना होगा, उन्हें जनता के बीच जाना होगा, जनता के बीच रहना होगा, उनका भरोसा जीतना होगा, उन्हें भरोसा दिलाना होगा, उन्हें स्थानीय स्तर पर परेशान करने वाले मुद्दों को पहचानना सिखाना होगा और सिखाना होगा मुद्दों को पहचानकर उनको आवाज़ बनाना भी। उन्हें सिखाना होगा कि असली भारत उन्हीं में बसता है। उन्हें बताना होगा कि मुट्ठी भर लोग लोकतंत्र के असली नायक नहीं होते हैं। असली लोकतंत्र उदास घरों और परेशान जीवन के बीच धड़कता है। उन्हें उस धड़कन को सुनने का अभ्यास कराना होगा। कुछ तात्कालिक और कुछ दीर्घकालिक, कुछ स्थानीय और कुछ राष्ट्रीय योजनाओं पर एक साथ काम करना होगा। केवल चुनावी मौसम में ही नहीं, बल्कि लगातार।उह काम कठिन है। परंतु यह करना होगा। पर्वत के शिखर से उतरते हुए झरने को अनेक विशाल चट्टानें रोकने की कोशिश करती हैं। चट्टानें कभी राह नहीं देती हैं। लेकिन निर्झरों का उच्छल आवेग शिलाओं से टकराते हुए अपनी राह निकाल लेता है, कभी अडिग शिलाओं को तोड़कर, कभी उन्हें छोड़कर।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







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