प्रकृति कितनी रहस्यमय है! एक छिपकली है – जीला मान्स्टर। वह साल भर में मात्र एक या दो बार खाती है। वैज्ञानिकों ने उसकी आदतों को देखा-परखा और उन्होंने वजन घटाने वाली दवाओं का आविष्कार करना प्रारंभ किया। आदमी का एक तबका है, जो अनियंत्रित ढंग से जीता है, खाता है और शहरी गंदगी में जीने को विवश हैं। उसके वजन बढ़ रहे हैं, इसलिए वे वजन घटाने की दवाइयाँ भकोस रहे हैं। दवाइयां खाते हुए दूसरी तरह की बीमारियां होती हैं और फिर अन्य दवाइयों के लिए रास्ता खुल जाता है।
मैं अपने शहर में देखता हूँ। डॉक्टरों की क्लीनिक और मेडिकल दूकान अभूतपूर्व ढंग से खुली हैं। जिस भी गली से गुजरिए, आपको डाक्टरों के साइन बोर्ड मिल जायेंगे। हर क्लीनिक में रोगी भरे पड़े मिलते हैं। इनमें शहर के लोग तो हैं ही। दूर-दराज गाँवों के भी लोग हैं। जैसे वकील मुकदमा खत्म नहीं होने देना चाहता, वैसे ही डॉक्टर बीमारी को लंबी खींचता है। दोनों में फीस महत्वपूर्ण है, आदमी का जीवन नहीं। महात्मा गांधी ने दोनों पर कड़ी टिप्पणी की है।
‘हिन्द स्वराज्य’ नामक छोटी-सी पुस्तिका उन्होंने 1908 में लिखी। इस पुस्तिका पर वे अंतिम क्षण तक दृढ़ रहे। इस पुस्तिका में वकील के बारे में वे लिखते हैं – “लोग दूसरों का दुख दूर करने के लिए नहीं, बल्कि पैसा पैदा करने के लिए वकील बनते हैं। वह एक कमाई का रास्ता है। इसलिए वकील का स्वार्थ झगड़ा बढ़ाने में है। यह तो मेरी जानी हुई बात है कि झगड़े होते हैं तब वकील खुश होते हैं। मुखतार लोग भी वकील की जात के हैं। जहाँ झगड़े नहीं होते, वहाँ भी वे झगड़े खड़े करते हैं। उनके दलाल जोंक की तरह गरीब लोगों से चिपकते हैं और उनका खून चूस लेते हैं।” अंत में वे कहते हैं कि जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूं, वे ही शब्द जजों पर भी लागू होते हैं।
डॉक्टर के बारे में वे लिखते हैं – “हम डॉक्टर क्यों बनते हैं, यह सोचने की बात है। उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमाने का धंधा करने की इच्छा है। उसमें परोपकार की बात नहीं है। डॉक्टर सिर्फ आडम्बर दिखाकर ही लोगों से बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसे की दवा के कई रुपए लेते हैं।”
कालेज वकील और डॉक्टर बनाने के कारखाने हैं। वे कैसे डाक्टर और वकील बनते हैं। इसकी जीवंत कहानी सुनिए। मैं उन दिनों टी एन बी कालेज में प्राध्यापक था। मेडिकल छात्रों का परीक्षा सेंटर टी एन बी कालेज दे दिया जाता था, क्योंकि वहाँ नकल नहीं होती थी। एक दिन मैं वीक्षक था। उत्तर पुस्तिका और प्रश्न पत्र देते ही वे नकल करने पर उतर आये। आपस में गप करना तो जैसे उसका अधिकार हो। मैंने कड़ाई की और डांट लगाई- ‘नकल कर तुम लोग डाक्टर बनोगे। थोड़ी सी लज्जा नहीं आती। तुम लोग तो नीम हकीम से भी गये गुजरे हो।’ परीक्षा खत्म होने के बाद उन लोगों ने कालेज में खूब हंगामा किया कि प्रधानाचार्य से शिकायत की कि वीक्षक ने परीक्षा हाल में गालियाँ दीं।
कुछ वर्षों बाद मैं डीएसडब्ल्यू हुआ और परीक्षा इंचार्ज भी। मेरे विश्वविद्यालय में दो कालेज है, जहाँ से छात्र डिग्री प्राप्त कर वकील बनते हैं। सुन रखा था कि ये लोग परीक्षा में धड़ल्ले से नकल करते हैं। मैंने सेंटर पर जब कड़ाई की तो आधे छात्रों ने परीक्षा छोड़ दी। उन लोगों ने परीक्षा हाल से निकल कर खूब हंगामा किया। मैं भी टस-से-मस नहीं हुआ। जब तक परीक्षा इंचार्ज रहा। नकल रुकी रही। फिर धंधे शुरू हो गये।
अपवाद हर पेशे में है। यहाँ भी है। लेकिन सामान्यत: ऐसी घटनाएँ आम हैं। डाक्टर और वकील क्या करते हैं, यह बात किसी से छुपी नहीं है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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