डॉ योगेन्द्र

डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग


पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

इन दिनों : मिसाइलों की चपेट में आदमी के सपने

Four missiles on a launch platform with brick wall background
"हाट से जानवर तक देखभाल कर लेते हैं और जिन्हें देश के नेतृत्व के लिए चुनते हैं, उन्हें कम से कम लापरवाही या भड़काऊ बयानों के आधार पर न चुनें।" इसी आलेख से

इन दिनों : होली के रंग और ज्ञान के संग

people gathering on a concert
"इधर के दिनों में सभी हिन्दू पर्वों की व्याख्या हो रही है। होली की भी। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा में मन प्रह्लाद के पक्ष में रहता था। इधर पता चला कि प्रह्लाद का तो इस्तेमाल किया गया। ......." - इसी आलेख से

इन दिनों : एक अनाड़ी की क्रिकेट-टिप्पणी

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विश्व कप में "मौजूदा टीम सेमीफाइनल में पहुँच गयी है, लेकिन यह टीम बेहतर क्रिकेट नहीं खेल रही है। कैच टपकाना और पिच और ज़रूरत के हिसाब से क्रिकेट नहीं खेलना उनकी आदत बन गई है।" इसी आलेख से

इन दिनों : लोकतंत्र और निरंकुश सत्ता

grayscale photo of people walking on street
"हर तानाशाह के कुछ चमकते नारे होते हैं, जिसमें जनता उलझ-पुलझ कर रहे जाती है। जनता नारों का गुलाम बन कर देश की गुलामी पर दस्तखत कब कर देती है, इसका पता नहीं चलता।" - इसी आलेख से

इन दिनों : राजनीति के दो छद्म चेहरे

"अरविंद केजरीवाल आज आज कैमरे के सामने रो रहे हैं। कैमरे के सामने रोने में नरेंद्र मोदी जी भी अव्वल हैं। दोनों ड्रामा किंग हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : वैश्विक कोतवाली के कोतवाल

"किसी की धरती को पिता और किसी की धरती को माँ कहने में कौन सी बुद्धिमानी है? विदेश नीति इससे कहाँ मजबूत हो जाती है?" - इसी आलेख से

इन दिनों : शर्म पर गर्व और गर्व पर शर्म का अमृत काल

"देश में सत्ता की ओर से फैलाई जा रही नफ़रत और हिंसा के शिकार कौन होगा, कहा नहीं जा सकता। इतना भर जरूर कहा जा सकता है कि आसार अच्छे नहीं हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : गलगोटिया-चेतना के उत्तराधिकारी

"उम्मीद है कि सरकारी विश्वविद्यालयों को अपदस्थ कर जल्द ही गलगोटिया विश्वविद्यालय हमारे सिर पर नाचेगा और हमें अपार प्रसन्नता होगी कि अब हमारे बच्चे गलगोटिया-चेतना से लैस होंगे।" इसी आलेख से

इन दिनों : बच्चों की दुनिया में सेंध

"देश के सिस्टम में भी अंग्रेजी का बोलबाला है और बिहार के बच्चों को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति बेवकूफ बना रही है। अगर पूरे सिस्टम में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व हो तो आप अंग्रेजी के बिना भी काम चला सकते हैं, लेकिन जब कुएं में ही भंग पड़ी हो तो भंग से परहेज़ करना मुश्किल है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : लालटेन युग का सुख और रोबोटिक युग का दुःख

"यह सब जानकर आपको लग रहा होगा कि उन दिनों बहुत पिछड़ा समाज था। हाँ, उन दिनों सामान कम था, मगर संबंधों का अद्भुत आनंद था- माँ, पिता, भाई, बहन तो थे ही, काका, काकी, चचेरा भाई, बहन, भौजाइयों का हुजूम था।" इसी आलेख से