उच्च शिक्षा में ग्रामीण क्षेत्रों का योगदान

"जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।" - इसी आलेख से

मनुष्य की विकास यात्रा में शिक्षा को हमेशा परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। विशेष रूप से उच्च शिक्षा, जो केवल रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, राजनीतिक समझ, आर्थिक प्रगति और नवाचार का आधार मानी जाती है। लेकिन बिहार जैसे ग्रामीण और आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्य में उच्च शिक्षा की वास्तविक तस्वीर उतनी सरल नहीं है, जितनी सरकारी रिपोर्टों और भाषणों में दिखाई देती है। यहाँ उच्च शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का प्रश्न नहीं, बल्कि गरीबी, पलायन, ऋण, सामाजिक असमानता और आर्थिक संघर्ष के बीच जीवित रहने की लड़ाई भी है। बिहार की लगभग 88 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इसलिए राज्य की उच्च शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा आधार गाँवों से आने वाले छात्र-छात्राएँ हैं। गाँव का विद्यार्थी विश्वविद्यालय में केवल पुस्तक ज्ञान अर्जित करने नहीं आता, बल्कि अपने साथ कृषि संकट, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, पंचायत व्यवस्था, पलायन, जातीय असमानता और संसाधनों की कमी के अनुभव लेकर आता है। यही कारण है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थी राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, ग्रामीण विकास और कृषि अध्ययन जैसे विषयों में अक्सर अधिक गहराई से सामाजिक यथार्थ को समझ पाते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार का ग्रामीण समाज अपने बच्चों को उच्च शिक्षा तक पहुँचा पाने की आर्थिक क्षमता रखता है?

यहीं से बिहार की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है। राज्य में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात राष्ट्रीय औसत की तुलना में अब भी काफी कम है। जहाँ देश का औसत 28 प्रतिशत से अधिक है, वहीं बिहार लगभग 17 प्रतिशत के आसपास है। अर्थात् हर 100 युवाओं में केवल 17 ही कॉलेज या विश्वविद्यालय तक पहुँच पा रहे हैं। इससे भी अधिक गंभीर स्थिति यह है कि प्रति एक लाख आबादी पर बिहार में कॉलेजों की संख्या राष्ट्रीय औसत की तुलना में बेहद कम है। ग्रामीण छात्रों को अक्सर जिला मुख्यालय, पटना या दूसरे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता है।

लेकिन उच्च शिक्षा का संकट केवल संस्थानों की कमी का नहीं है। असली संकट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का है। उत्तर बिहार और सीमांचल के अनेक जिलों में पिछले वर्षों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का तेजी से विस्तार हुआ है। स्वयं सहायता समूहों और छोटे ऋणों के नाम पर लाखों ग्रामीण परिवार ऋण व्यवस्था से जुड़े, लेकिन कई मामलों में यह सुविधा आर्थिक जाल में बदलती दिखाई दी। एक ऋण चुकाने के लिए दूसरा ऋण, फिर तीसरा ऋण—यह स्थिति कई परिवारों को वित्तीय अस्थिरता की ओर ले गई। दैनिक मजदूरी और सीमित कृषि आय वाले परिवारों पर साप्ताहिक किस्तों का दबाव बढ़ा। ऐसे परिवारों में सबसे पहला समझौता अक्सर बच्चों की पढ़ाई से होता है। कॉलेज फीस रुक जाती है, कोचिंग छूट जाती है, छात्रावास छोड़ना पड़ता है और कई छात्र उच्च शिक्षा अधूरी छोड़कर कमाने निकल पड़ते हैं। बिहार के हजारों ग्रामीण परिवारों में यह स्थिति आज भी सामान्य सामाजिक यथार्थ है कि ‘पहले घर बचे, फिर पढ़ाई होगी।’

आर्थिक असुरक्षा का यह संकट केवल शिक्षा छोड़ने तक सीमित नहीं रहता। कई बार गरीबी, ऋण और आजीविका संकट परिवारों को मानसिक दबाव की उस स्थिति तक पहुँचा देते हैं, जहाँ आत्महत्या जैसी दुखद घटनाएँ भी सामने आती हैं। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य आर्थिक बोझ से टूटता है, तब सबसे अधिक प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। कई घरों में बेटों की पढ़ाई रुक जाती है और बेटियों की जल्दी शादी कर दी जाती है। उच्च शिक्षा, जो सामाजिक गतिशीलता का माध्यम हो सकती थी, आर्थिक संकट की पहली शिकार बन जाती है। यही कारण है कि बिहार में शिक्षा और गरीबी का संबंध सीधे-सीधे दिखाई देता है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि उच्च शिक्षा मानवीय पूंजी निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम है। अर्थशास्त्री एडम स्मिथ से लेकर थीओडोरे स्चूल्ट्ज तक ने यह माना कि शिक्षा केवल उपभोग नहीं, बल्कि दीर्घकालीन निवेश है। एक शिक्षित समाज अधिक उत्पादक होता है, तकनीक को जल्दी अपनाता है और नवाचार की क्षमता विकसित करता है। लेकिन बिहार का विरोधाभास यह है कि जो राज्य मानव संसाधन में सबसे समृद्ध माना जाता है, वही उच्च शिक्षा की आधारभूत संरचना में सबसे पीछे दिखाई देता है। बड़ी संख्या में छात्र दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि बिहार अपनी प्रतिभा तैयार तो करता है, लेकिन उसे बनाए रखने में सफल नहीं हो पा रहा।

यहाँ विश्वविद्यालयों की भूमिका भी पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बाँटने वाले केंद्र नहीं रह सकते। उन्हें ग्रामीण बिहार की समस्याओं—कृषि संकट, बाढ़, बेरोजगारी, माइक्रोफाइनेंस ऋण, प्रवासन, स्वास्थ्य संकट और पंचायत प्रशासन—पर शोध आधारित समाधान विकसित करने होंगे। यदि विश्वविद्यालय गाँवों तक पहुँचें, किसानों को तकनीकी सहायता दें, युवाओं को स्थानीय रोजगार आधारित कौशल प्रदान करें और सामाजिक विज्ञान विभाग पंचायतों व स्थानीय शासन से जुड़ें, तब उच्च शिक्षा का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।

विशेष रूप से राजनीति विज्ञान के संदर्भ में ग्रामीण बिहार एक जीवंत प्रयोगशाला है। यहाँ लोकतंत्र केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि जातीय राजनीति, पंचायत चुनाव, मतदान व्यवहार, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक संघर्षों के माध्यम से प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। इसलिए ग्रामीण विद्यार्थियों का विश्वविद्यालयों में पहुँचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गहराई को मजबूत करने की प्रक्रिया भी है। हालाँकि सकारात्मक संकेत भी मौजूद हैं। ग्रामीण छात्राओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ रही है। छात्रवृत्ति, साइकिल योजना, पोशाक योजना और कन्या उत्थान जैसी पहलों ने लड़कियों को विद्यालय से कॉलेज तक पहुँचाने में भूमिका निभाई है। लेकिन अब आवश्यकता केवल नामांकन बढ़ाने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा में टिकाए रखने की है। नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि यदि ग्रामीण परिवार कर्ज़, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा से जूझते रहेंगे, तो उच्च शिक्षा का सपना अधूरा रहेगा। बिहार को ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जिसमें गरीब ग्रामीण छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावास, डिजिटल संसाधन, शिक्षा ऋण सहायता, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और माइक्रोफाइनेंस निगरानी को एक साथ जोड़ा जाए।

अंततः बिहार के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा का प्रश्न केवल विश्वविद्यालयों की संख्या का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और ग्रामीण पुनर्निर्माण का प्रश्न है। क्योंकि जब किसी गरीब किसान का बेटा या मजदूर की बेटी विश्वविद्यालय तक पहुँचती है, तब केवल एक छात्र शिक्षित नहीं होता—बल्कि एक पूरा परिवार, एक गाँव और एक पीढ़ी अपने भविष्य को बदलने की संभावना के करीब पहुँचती है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

रुपेश रॉय
रुपेश रॉय

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना 
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।

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