कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ नेतृत्व परिवर्तन केवल व्यक्तियों का बदलाव नहीं, बल्कि सत्ता की स्थिरता, सामाजिक समीकरणों और आर्थिक प्रबंधन की बड़ी परीक्षा बन सकता है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पदत्याग और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व संभालने की संभावना ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी है। किंतु प्रश्न केवल इतना नहीं कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा; असली प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस 1980 के बाद से चले आ रहे उस राजनीतिक चक्र को तोड़ पाएगी, जिसमें कर्नाटक ने किसी भी सत्तारूढ़ दल को लगातार दूसरा स्पष्ट जनादेश नहीं दिया?
यदि पिछले चार दशकों के चुनावी आँकड़ों को देखा जाए, तो कर्नाटक भारतीय लोकतंत्र में ‘संस्थागत सत्ता-विरोध‘ का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 1983 के बाद से राज्य में सत्ता का चक्र निरंतर बदलता रहा है। 1983 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, 1989 में लौटी, 1994 में फिर पराजित हुई, 1999 में वापसी की, 2004 में त्रिशंकु जनादेश आया, 2008 में भाजपा पहली बार पूर्ण सत्ता में आई, 2013 में कांग्रेस लौटी, 2018 में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और 2023 में कांग्रेस ने पुनः स्पष्ट बहुमत हासिल किया। आँकड़े बताते हैं कि राज्य की राजनीति में मतदाता किसी दल को स्थायी स्वीकृति देने के बजाय निरंतर मूल्यांकन की प्रवृत्ति अपनाता रहा है।
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2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीतकर लगभग 60 प्रतिशत सीट हिस्सेदारी प्राप्त की, जबकि उसका मत प्रतिशत करीब 42.9 प्रतिशत रहा। भाजपा लगभग 36 प्रतिशत मत पाकर केवल 66 सीटों तक सीमित रह गई। यह चुनावी परिणाम यह भी बताता है कि कर्नाटक की चुनावी राजनीति में सीट रूपांतरण दक्षता अत्यंत निर्णायक है—सिर्फ 6–7 प्रतिशत मतों के अंतर ने सीटों में दोगुने से अधिक अंतर पैदा कर दिया। यह कांग्रेस के पक्ष में स्पष्ट जनादेश था, किंतु भारतीय राज्यों में स्पष्ट जनादेश हमेशा राजनीतिक स्थिरता की गारंटी नहीं रहा।
यहीं से सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच शक्ति-संतुलन का प्रश्न शुरू होता है। कांग्रेस की जीत के तुरंत बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर जो संघर्ष सामने आया, उसने यह संकेत दे दिया था कि राज्य कांग्रेस दो समानांतर शक्ति केंद्रों में विभाजित है। एक ओर सिद्धारमैया हैं, जिनकी पकड़ पिछड़े वर्गों, विशेष रूप से कुरबा समुदाय, ग्रामीण गरीबों तथा सामाजिक न्याय की राजनीति पर मजबूत मानी जाती है; दूसरी ओर डीके शिवकुमार हैं, जिनका प्रभाव मुख्यतः वोक्कालिगा समुदाय, दक्षिण कर्नाटक और संगठनात्मक संसाधनों पर आधारित है।राजनीतिक दृष्टि से यह केवल नेतृत्व संघर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का संघर्ष भी है। कर्नाटक की राजनीति लंबे समय से लिंगायत–वोक्कालिगा–ओबीसी–दलित–अल्पसंख्यक गठबंधन के इर्द-गिर्द घूमती रही है। भाजपा की पारंपरिक शक्ति लिंगायत समुदाय में रही है, जबकि कांग्रेस ने 2023 में ओबीसी, मुस्लिम, दलित और महिला मतदाताओं के व्यापक समर्थन से सत्ता प्राप्त की। ऐसे में यदि नेतृत्व परिवर्तन के कारण सामाजिक संतुलन बिगड़ता है, तो इसका सीधा असर अगले चुनाव पर पड़ सकता है।
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कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सबक राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ से मिलता है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच वर्षों तक चली खींचतान ने पार्टी की प्रशासनिक विश्वसनीयता को कमजोर किया। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव के बीच कथित ‘ढाई-ढाई वर्ष‘ समझौते को लेकर तनाव बना रहा। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को चुनाव से लगभग एक वर्ष पहले हटाने और बाद में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रयोग गुटबाजी में बदल गया, जिसका सीधा लाभ आम आदमी पार्टी को मिला। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस अंततः सत्ता गँवा बैठी। इसलिए कर्नाटक का नेतृत्व परिवर्तन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय राजनीतिक भविष्य से जुड़ा हुआ है।
लेकिन कर्नाटक की चुनौती केवल राजनीतिक नहीं, आर्थिक भी है। राज्य की अर्थव्यवस्था भारत में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। 2025–26 के अनुमान के अनुसार कर्नाटक का सकल राज्य घरेलू उत्पाद लगभग ₹30 लाख करोड़ के आसपास पहुँच चुका है। भारत के कुल आईटी निर्यात में 35–38 प्रतिशत योगदान अकेले बेंगलुरु से आता है। देश के लगभग 40 प्रतिशत यूनिकॉर्न स्टार्टअप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेंगलुरु आधारित पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े हैं। फिर भी आर्थिक विकास की यह कहानी राज्य के सभी हिस्सों की कहानी नहीं है।
बेंगलुरु और शेष कर्नाटक के बीच आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती दिखाई देती है। राज्य के उत्तरी जिलों—जैसे कलबुर्गी, रायचूर, यादगिर और कोप्पल—में प्रति व्यक्ति आय बेंगलुरु शहरी क्षेत्र की तुलना में कई गुना कम है। कृषि पर निर्भर आबादी अब भी मानसून आधारित अर्थव्यवस्था के जोखिमों से जूझ रही है। ग्रामीण बेरोजगारी, सिंचाई असमानता और क्षेत्रीय अवसंरचना की कमी लंबे समय से राजनीतिक मुद्दा बनी हुई है।
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इसके साथ राज्य की राजकोषीय स्थिति भी चिंता का विषय बन रही है। कांग्रेस सरकार की पाँच प्रमुख गारंटी योजनाओं—गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, शक्ति, अन्न भाग्य और युवा निधि—पर प्रतिवर्ष अनुमानतः ₹52,000–58,000 करोड़ तक खर्च हो सकता है। यह राशि राज्य के कुल वार्षिक बजट का उल्लेखनीय हिस्सा है। आर्थिक विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि अत्यधिक कल्याणकारी व्यय पूँजीगत निवेश और आधारभूत संरचना विकास को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि समर्थकों का तर्क है कि इससे उपभोग माँग बढ़ती है और गरीब तबकों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होती है।
कर्नाटक का अनुभव यह भी बताता है कि केवल ‘विकास‘ चुनाव नहीं जिताता। 2008–2013 के बीच भाजपा सरकार के दौरान आर्थिक वृद्धि हुई, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों और नेतृत्व संकट के कारण सत्ता चली गई। इसी प्रकार 2013–2018 में कांग्रेस सरकार के कई सामाजिक कार्यक्रमों के बावजूद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसका अर्थ यह है कि कर्नाटक का मतदाता आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व विश्वसनीयता—तीनों का संयुक्त मूल्यांकन करता है।
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डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे सिद्धारमैया के जनाधार को साथ रखते हुए प्रशासनिक प्रभावशीलता कैसे स्थापित करते हैं। यदि नेतृत्व परिवर्तन सत्ता संघर्ष का रूप लेता है, मंत्रिमंडल पुनर्गठन में असंतोष बढ़ता है, या क्षेत्रीय एवं जातीय संतुलन बिगड़ता है, तो भाजपा को सत्ता में वापसी का अवसर मिल सकता है। भाजपा पहले ही दक्षिण भारत में अपनी पुनर्स्थापना की रणनीति के तहत कर्नाटक को सबसे महत्वपूर्ण राज्य मान रही है।
स्पष्ट है कि डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना जितना महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षण होगा, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा उनका शासन मॉडल। कर्नाटक के मतदाता ने पिछले चार दशकों में यह संकेत बार-बार दिया है कि वह किसी भी दल को स्थायी सत्ता का अधिकार नहीं देता। यदि कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन को राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक संतुलन और सामाजिक समावेशन में बदलने में विफल रहता है, तो 1983 से चली आ रही सत्ता परिवर्तन की परंपरा 2028 में एक बार फिर दोहराई जा सकती है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
रुपेश रॉय एक समर्पित शोधार्थी हैं जिनका राजनीतिक विज्ञान में किया गया कार्य शासन, नीति और सामाजिक न्याय के बीच के अन्तर्संबंधों का अन्वेषण करता है। उनका शोध समकालीन समाज के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने और संबोधित करने की प्रतिबद्धता से निर्देशित है।






