हिंदी-प्रदेशों में बिहार ही इकलौता ऐसा राज्य था, जहाँ भाजपा का प्रत्यक्ष शासन नहीं था। यहाँ अपनी बढ़त बनाने के लिए जिस तरह और जिन उपायों को वह अपना रही थी, उससे यह तय था कि वह बिहार को अपने कब्जे में कर लेगी। नीतीश कुमार जी के पिछले कार्यकाल के अंतिम दिनों से ही यह जाहिर किया जाने लगा था। सत्तापलट का यह अंदेशा उस समय सघन हो गया था, जब करीब एक साल पहले चुनाव के बाद यह सरकार बनी थी। लेकिन चुनाव के पहले से ही इसकी भूमिका बनायी जाने लगी थी। नीतीश कुमार के दिमाग का ठीक से काम नहीं करने का प्रोपेगंडा उसी भूमिका का एक प्रमुख अंग था। इसके लिए नेता प्रतिपक्ष ने कई बार चिंता और आशंका भी ज़ाहिर की थी। मगर वह अनसुनी कर दी गयी। इसलिए नीतीश कुमार को हटाकर भाजपा का सत्ता पर काबिज हो जाना हैरतअंगेज़ बात नहीं हुई। हैरान करने वाली बात सत्ता से च्युत करने की प्रक्रिया में थी। राज्यसभा की सीट के लिए नामांकन भरते समय का उनका फ़ोटो देखिए। वह फ़ोटो ‘पकड़ुआ विवाह’ की याद दिला देता है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ की तरह यह ‘पोलिटिकल अरेस्ट’ का सीन था। उनके आजू-बाजू भाजपा के शीर्ष नेता खड़े होकर उनसे फॉर्म ‘सबमिट’ करवा रहे थे। एकाएक ट्वीट से दी गयी जानकारी के बाद उनको मनाने के लिए उमड़ पड़ी उनके उतावले समर्थकों की भीड़ को उनके पास फटकने तक नहीं दिया गया। इसके लिए भारी सुरक्षा का प्रबंध किया गया और उसी सुरक्षा-घेरे में वे नामांकन दाखिल करने पहुँचे। यह सारा दृश्य राजशाही के समय में सत्तापलट की प्रक्रिया जैसा लग रहा था। इसका अनुमान किसी को नहीं था।
नामांकन दाखिल करने के पहले नीतीश कुमार ने एक ट्वीट करके इसकी जानकारी दी। उसकी दो-तीन बातें ध्यान खींचती हैं। एक तो यह कि ‘दो दशक से राज्यसभा जाना चाह रहा हूँ।’ राज्यसभा जाने के लिए दिया गया यह एक बचकाना और लाचार तर्क है। बल्कि तर्क नहीं, एक विवश स्पष्टीकरण है। जो व्यक्ति दो दशकों से दूसरों को राज्यसभा भेज रहा था, उसके स्वयं के जाने में क्या अवरोध था, यह समझ में आने की बात नहीं है। फिर मुख्यमंत्री का पद छोड़कर साधारण सांसद होने की ललक गले के नीचे नहीं उतरती। दूसरा कि ‘दोनों सदनों का सदस्य बनने की इच्छा’ थी। समीक्षक इस बात का अर्थ निकालते हैं कि वे लोकसभा के सदस्य तो रहे थे, राज्यसभा के कभी नहीं। बिहार में जेपी आंदोलन से उभरे तीन कद्दावर नेताओं में लालू यादव और स्व० सुशील मोदी राज्यसभा के भी सदस्य रह चुके हैं, नीतीश कुमार नहीं। इसलिए उनकी इच्छा राज्यसभा में जाने की थी। यह भी एक लचर तर्क है, पहले वाले तर्क की तरह ही। उसी ट्वीट में तीसरी बात नयी सरकार को सहयोग और मार्गदर्शन देने की बात उन्होंने कही। इसके दो अर्थ हैं कि बिहार में अब उनकी पार्टी जदयू नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं रहेगी। नेतृत्व (मुख्यमंत्री का पद) अब भाजपा संभालेगी और जदयू समर्थन की भूमिका अदा करेगा। इस पंक्ति से यह भी स्वीकारोक्ति निकलती है कि राजनीति में उनकी मुख्य भूमिका का अवसान हो गया है। अब वे ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका में होंगे।
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यह घटना हो चुकी है। व्यतीत का विश्लेषण राजनीतिक उठा-पटक और छल-छद्म को समझने में सहायक हो सकता है। परंतु वास्तविक चिंता राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संभावनाओं की होनी चाहिए।
राजनीतिक संभावना :
मुख्यमंत्री के रूप में कई नाम अख़बारी चर्चा में उछल रहे हैं। लेकिन यह लेख लिखे जाने तक किसी के नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगी है। ऐसा नहीं हो सकता है कि भाजपा के जिस शीर्ष नेतृत्व ने सत्ता-पलट के इस पूरे खेल को रणनीतिक सहूलियत के साथ अंजाम दिया, उसने ‘इसके बाद क्या?’ के बारे में नहीं सोच रखा हो। संभावना यह भी है कि मुख्यमंत्री बनने की होड़ में शामिल होकर उछल-कूद करने वालों में से कोई मुख्यमंत्री नहीं बने और वह पद किसी मामूली विधायक को दे दिया जाए, जैसी की प्रवृत्ति आजकल भाजपा में दिखाई पड़ रही है। संभावना के तौर पर वह महिला हो सकती है, क्योंकि नीतीश कुमार के महिला मतदाताओं को अपने साथ ले आने की जरूरत होगी। उसमें भी अति पिछड़ा समुदाय से किसी का नाम सामने आए, क्योंकि उस समुदाय के मतदाताओं को साधने की जरूरत नयी सरकार को होगी। लेकिन ये सब क़यास हैं, हवा में तीर चलाना है। यह अनुमान पर बहस अखबारी पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए जरूरी है, चिंताशील लोगों के लिए नहीं। क्योंकि कोई भी आकर करेगा वही, जो भाजपा की नीति है।
मुख्यमंत्री के नाम का अंदाज़ लगाने में उलझाने से ज़्यादा बड़ी चिंता प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को अपने इशारे पर नचाने का है। भाजपा की केंद्र और राज्य की सरकारें बखूबी यह काम कर रही हैं। बिहार में ऐसा न होगा, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। ब्यूरोक्रेसी का मनमाना उपयोग करके वह अपने विरोधियों पर तो शिकंजा कस ही देगी, बल्कि अपने शासन की निरंतरता को भी बनाए रखने में उपयोग करेगी। अब भाजपा ऐसे उपायों को अमल में ला रही है, जिससे कभी सत्ताच्युत ही न हुआ जाए। बिहार जैसे बड़े राज्य पर दीर्घकालिक शासन करके वह केंद्र के शासन में भी अपना वर्चस्व कायम रख सकेगी।
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जदयू के अधिकांश शीर्ष नेताओं का तन जदयू में और मन भाजपा में है। अनेक मीडिया-स्रोत सत्ता-पलट के इस खेल में उनका भी हाथ मानते हैं। आश्चर्यजनक नहीं होगा कि जदयू के वे नेता भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल हो जाएँ और पार्टी बिखर जाए, क्योंकि जदयू नीतीश जी के चेहरे के इर्द-गिर्द घूमने वाली पार्टी है। वंशवाद के विरोधी नीतीश जी ने अपने बेटे को राजनीति में प्रवेश कराकर इस संभावना को रोकने की कोशिश की है। परंतु निशांत नेतृत्व की इस थाती को संभाल पायेंगे, इसमें पूरा संदेह है।
बिहार के विभाजन के संबंध में बार-बार बयान दिए जा रहे हैं। हाल ही में गृहराज्यमंत्री के बयान से भी इसकी पुष्टि होती है। योजना बिहार के पूर्वांचल के कुछ अल्पसंख्यक बहुल जिलों और पश्चिम बंगाल के कुछ सीमावर्ती ज़िलों को मिलाकर एक संघ-शासित प्रदेश बनाने की है। इस तरह बिहार को पुनः विभाजन की एक त्रासदी झेलने की संभावना है, जिसमें अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में होंगे।
सामाजिक संभावना :
भाजपा एक सांप्रदायिक पार्टी है, जो हिन्दूवाद और हिंदीवाद को प्रोत्साहित करती है। हिन्दीवाद तो बिहार का मुद्दा नहीं है, लेकिन हिंदूवाद है। भाजपा के हिंदूवाद को ब्राह्मणवाद से अलग करके देखना चाहिए। उसके हिन्दुवाद का अर्थ है – उच्च वर्ग (वर्ण नहीं) का प्रभुत्व। बिहार में अब तक उसका यह हिंदूवादी एजेंडा, सामाजिक तौर पर, उछल-उछल कर गिर जाया करता था। चाहे वह रामनवमी में गालियों के साथ तलवार-प्रदर्शन हो या सीमांचल में तलवार-यात्रा या अन्य कोशिशें। उसकी लपटें फैलने के पहले ही बुझ जाया करती थीं। अब प्रशासनिक ताक़त के बल पर उसके इस एजेंडे का रथ घरघर नाद करते हुए घूमेगा और लपटों को फैलाने की पूरी कोशिश की जाएगी। प्रोपेगंडा तो यह होगा कि यह रथ अल्पसंख्यक-आतंकवाद और घुसपैठियों को रोकने के लिए है। लेकिन, जैसा कि अन्य स्थानों पर देखने को मिल रहा है, आतंकवादी तो उस रथ से नहीं कुचले जा सके, उनके बदले निरीह अल्पसंख्यक कुचल कर कराहते रहे। यह हिंदूवाद का रथ केवल अल्पसंख्यकों को ही नहीं कुचल रहा है, बल्कि महिलाएँ, दलित और आदिवासी भी उस पहिए के नीचे आकर अपना दम तोड़ रहे हैं।
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संप्रदायवाद की जो लपटें फैलेंगी, उसमें केवल अल्पसंख्यक ही नहीं झुलसेंगे। बल्कि हिंदू भी झुलसेंगे। भाजपा चाहेगी कि हिंदू इस लपट में झुलसें। क्योंकि अल्पसंख्यकों का मारा जाना या उत्पीड़ित होना हिंदुओं के लिए केवल संतोष का विषय हो सकता है, लेकिन हिंदुओं का मारा जाना या उत्पीड़ित होना उसके वोट-बैंक को मजबूत बनाएगा। यह प्रयोग गोधरा में सफल रहा और उत्तरप्रदेश, असम आदि में भी सफलतादायक रहा। बिहार में भी उसी नीति को अपनाये जाने की संभावना है।
दिल्ली में भाजपा की सरकार बनते ही पहला काम गरीबों की झोपड़ियों को उजाड़ने का किया गया। बिहार में भी गृहमंत्रित्व भाजपा के पास जाते ही पहला फरमान झोपड़ियों को उजाड़ने का जारी हुआ। जिनकी झोपड़ियाँ उजाड़ी जा रही थीं, वे वही लोग थे, जिन्होंने उस गठबंधन को वोट देने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अब सरकार का पूरा स्वामित्व हाथ में आ जाने के बाद यह काम बेरोक-टोक हो सकेगा।
बिहार में न तो जंगल अधिक हैं और न ही आदिवासी। लेकिन जितना भी जंगल है, उसे कारोबारियों के हाथों में सौंपा जाएगा। वे कारोबारी जब जंगल उजाड़कर अपना उद्योग-धंधा स्थापित करेंगे तो जंगल के साथ आदिवासी भी उजड़ेंगे। आदिवासी को राष्ट्रपति मनोनीत करने के बावजूद भाजपा का आदिवासियों के प्रति न तो रूख अच्छा रहा है, न व्यवहार। यहाँ तक कि राष्ट्रपति के प्रति भी नहीं। वह रूख और व्यवहार बिहार में भी देखने को मिलेगा।
आर्थिक संभावना :
भाजपा राजनीतिक सफलता के लिए हिंदूवाद का नारा भले ही लगाती हो, मगर आर्थिक रूप से वह पूँजीपति-समर्थक है। पूँजीपति उसे चंदा देते हैं। इस चंदे के लिए उसने इलेक्टोरल बांड जैसा जघन्य और पीएम केयर्स फण्ड जैसा अनैतिक कार्य तक किया है। बदले में वह पूँजीपतियों को मुनाफ़ा कमाने की छूट देती है, उसकी सहूलियत के अनुकूल क़ानून बनाती है और देश के संसाधन सौंपती है। बिहार में प्राकृतिक संसाधन के नाम पर जमीन और जल हैं, जंगल उतना नहीं है। आबादी के हिसाब से यहाँ जमीन भी उतनी नहीं है, जिससे सबका भरण-पोषण भी हो सके। बिहार जाति गणना के हिसाब से यहाँ प्रति व्यक्ति 0.078 हेक्टेयर जमीन है। इतनी जमीन का अर्थ है – एक छोटा-सा घर और आँगन। उसी में जंगल, पहाड़, नदी, नाले, सड़क, तालाब आदि भी हैं। अर्थात् सबके लिए मकान भी मुहैया नहीं कराया जा सकता है। उसी में बड़े पैमाने पर पूँजीपतियों को जमीन दी जाने लगी है। पीरपैंती ही एकमात्र उदाहरण नहीं है, दर्जनों ऐसी जगहें हैं, जहाँ दो सौ-चार सौ एकड़ जमीन किसी पूँजीपति के हवाले कर दी गयी है। यह सब उद्योग, विकास और रोजगार के नाम पर होता है। लेकिन जितने बड़े पैमाने पर लोग उजड़ते हैं, रोजगार उन सबमें कुछ के ही हाथ में आता है। शासन हाथ में आ जाने के बाद अब यह और बड़े पैमाने पर होगा। ऐसे में बिहार में बेरोजगारी, भूमिहीनता, बेघरपना और पलायन बड़े पैमाने पर बढ़ेगा।
निष्कर्ष :
राजनीतिक मनमानेपन को रोकना विपक्ष का दायित्व होता है। लेकिन बिहार में विपक्ष के राजनीतिक दल कमजोर हो गए हैं और वे आपसी कलह के भी शिकार हैं। जब राजनीतिक रूप से सदन में आम लोगों की त्रासदी की आवाज़ नहीं उठायी जाती है या नहीं सुनी जाती है तो जनता अपनी बात कहने के लिए ख़ुद सड़कों पर चली आती है। हाल ही में दुनिया के अनेक देशों और भारत के पड़ोसी मुल्कों में ऐसा हो चुका है। लेकिन जहाँ कहीं भी स्वयंजात जनांदोलन हुए हैं, वे या तो अराजक हो गए हैं या, कम-से-कम, किसी नीतिगत परिवर्तन के वाहक नहीं बने हैं, सत्ता-परिवर्तन तक सीमित रह गए हैं। जनांदोलनों का राजनीतिक नेतृत्व ही उन्हें सही परिणाम तक पहुँचा पता है। फिर यह भी प्रश्न है कि वह राजनीतिक नेतृत्व किस तरह की नीतियों वाले राजनीतिक दल के हाथों में है। अन्ना आंदोलन हमारे यहाँ उदाहरण है।
तो आख़िरी बात यह कि यदि उपर्युक्त संभावनाएँ साकार होती हैं तो यह अंतिम संभावना भी असंभव नहीं है।

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।








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तथ्यपरक और तार्किक सहजभाषा में प्रस्तुत की गई आलेख के लिए साधुवाद।
Nice and true information of Bihar.
Good