बुद्धिखोरों का अजीब धंधा है। ऐसे लोग धरती पर जीवित क्यों हैं? बुद्धि का कीमा बना दिया है इन लोगों ने। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को ट्रंप ने उठवा लिया तो भारत के बुद्धिखोरों ने घोषणा की कि इससे भारत को अरबों का मुनाफा होगा। बुद्धिजीवी जब अपनी बुद्धि को हाट-बाजार में बेच देते हैं और रीढ़ की हड्डी पूरी तरह गायब हो जाती है तो इस तरह के सुभाषित उनके मुँह से निकलते हैं।
मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तो डालर की कीमत बढ़ गई और रुपये की घट गयी तो बुद्धिखोरों के इस समूह ने प्रधानमंत्री की खूब लानत भेजी। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और रुपए की कीमत डालर के मुकाबले बेहतर गिरी है तो ये बुद्धिखोर गणना कर बता रहे हैं कि इससे भारत को कितना फायदा होगा। कहाँ से ये लोग बुद्धि लाते हैं। दो- गला शब्द अच्छा नहीं है, लेकिन इनके दो गले तो हैं ही। नोटबंदी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की तो उसे मास्टर स्ट्रोक बताते हुए कितने फायदे गिनाए। काला धन पकड़ने से लेकर आतंकवाद खत्म होने की बात कही गई। दो हजार के नये रंग-बिरंगे नोट जारी हुए। कोई श्वेता सिंह किसी चैनल में काम करती हैं। उसने तो इस नोट में चिप्स ढूँढ ली और कहा कि धरती के अंदर नोट को गाड़ देने के बाद भी पता चल जाएगा। आज वह दो हजरिया नोट वैसे ही गायब है, जैसे गदहे के सिर पर से सींग। किसी को कोई शर्म महसूस नहीं हो रही। सभी शर्म प्रूफ हो गये हैं।
मैं देहाती आदमी हूँ। बचपन में खूब गालियाँ दी हैं। पढ़-लिख कर शिक्षक बना तो गालियाँ मौके-मौके पर आती हैं, लेकिन प्रकट रूप में देता नहीं हूँ। भद्रता का मामला है। ज्ञान ने मुँह सिल दिया है,पर ऐसे बुद्धिखोरों के लिए रह-रह कर गालोयाँ दिमाग में घूमने लगती हैं। मैं इसे अपनी कमजोरी माना। गालियों को उच्चरित नहीं करता। ये बुद्धिखोर इतने गिर चुके हैं कि चुल्लू भर पानी भी इन्हें उपलब्ध नहीं है। ये लोग भैंस की देह में लगा चिमोकन है।
अमेरिका की आबादी तीस करोड़ है और भारत की एक लाख चालीस करोड़। एक लाख चालीस करोड़ का नेता चुप है। उसके चमचे इसमें भी मास्टर स्ट्रोक ढूँढ निकालेंगे। ये बहुत पाज़िटिव लोग हैं। बुरी-से-बुरी दशा में भी अपना मुनाफा ढूँढ लेते हैं। अमेरिका में लोकतंत्र भले हो, लेकिन ट्रंप का व्यवहार डिक्टेटर वाला है। अमेरिका ने कभी इराक तो कभी लीबिया को तंग किया। झूठे आरोप लगाये और राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दी। मुझे गर्व होता है कि मैं उस देश का वासी हूँ, जहाँ बुद्ध हुए हैं, लेकिन मुझे बुद्धिखोरों को लेकर शर्म आती है कि तात्कालिक लाभ के लिए इन्होंने अपने को गिरवी रख दिया है। थाली बजाने से कभी बीमारी भागती है? लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की कि थाली बजाओ तो कोरोना भाग जायेगा। बुद्धिखोरों की इस जमात ने अपनी छतों पर जम कर थाली बजायी।
पिछले दस पंद्रह सालों से कथावाचकों की एक टोली निकल आयी है। माथे पर चंदन लपेस कर कथावाचन से करोड़ों कमा ही रहे हैं, देश की राजनीति पर भी प्रवचन देने लगते हैं। वे कथा के माध्यम से समाज को बेवकूफ बना रहे हैं और उसके समर्थक बुद्धिखोर उसमें जन जागरण का सपना देख रहे हैं। लफंगों की एक टोली का जन्म मौजूदा सत्ताधारियों ने दिया है। वे अपने ही नागरिकों की लींचिंग कर रहे हैं। त्रिपुरा के एक युवक एंजेल चकमा को चीनी-चीनी कह कर मार दिया। वह चिल्लाता रहा कि मैं भारतीय हूँ, लेकिन ये सरकारी दामाद क्यों मानें उनकी बात!
हर कर्म का प्रत्युत्तर आता है। आज जो सरकार कर रही है, उसके प्रत्युत्तर भी आयेंगे। बुद्धिखोरों को अपने बौद्धिक दुष्कर्म का हिसाब तो देना पड़ेगा ही।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






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