क्रिकेट का कभी बैट नहीं पकड़ा, न कभी गेंद फेंकी, लेकिन क्रिकेट पहले सुनने और बाद में देखने की लत लग गई। मैच फिक्सिंग की खबर से आहत होकर कुछ दिनों तक इससे अलग रहा, लेकिन फिर धीरे-धीरे शामिल हो गया। फेसबुक पर आलोचक कर्मेंदु शिशिर और इतिहासकार हितेंद्र पटेल की टिप्पणी क्रिकेट पर पढ़ता रहता हूँ। वे गौतम गंभीर से बेहद खफा रहते हैं। मेरा भी आकलन ऐसा ही है। उन्होंने रोहित शर्मा और विराट कोहली के साथ बहुत अन्याय किया है।
विराट कोहली का अब भी भारतीय क्रिकेट में कोई जोड़ा नहीं है। उनकी टेक्नीक, उनका जज्बा, खेल अवेयरनेस, उनका फिटनेस और फुर्ती – देखते बनते हैं। ऐसे क्रिकेटर को टेस्ट और ट्वेंटी-ट्वेंटी खेल से बाहर करना अच्छा नहीं है। पता नहीं विराट कोहली से आखिर क्या दुश्मनी है? चल रहे विश्व कप में विराट कोहली रहते तो रह-रह कर भारतीयों की धड़कनें बेमतलब नहीं धड़कतीं। मौजूदा टीम सेमीफाइनल में पहुँच गयी है, लेकिन यह टीम बेहतर क्रिकेट नहीं खेल रही है। कैच टपकाना और पिच और ज़रूरत के हिसाब से क्रिकेट नहीं खेलना उनकी आदत बन गई है।
दक्षिण अफ्रीका के साथ हुए मैच में हर खिलाड़ी अतिरिक्त हमलावर थे। हर गेंद पर टूट पड़ना। अभिषेक शर्मा को क्रिकेट की समझ विकसित करनी है। उसकी तुलना में ईशान किशन में क्रिकेट की समझ लगती है। दोनों को गेंद के स्वभाव के आधार पर हिट करना चाहिए। सूर्यकुमार की तकनीक ठीक लगती है। ग्राउंड शाट की उस वक्त बहुत अहमियत होती है, जब रन बन नहीं रहे हों। कल संजू सैमसन अड़े रहे और हड़बड़ाहट नहीं दिखाई। खूँटा गाड़कर सधे हुए और जरूरत के हिसाब से क्रिकेट खेला और टीम सेमीफाइनल में पहुँची। वरना बेड़ा गर्क हो चुका था।
लंबे समय से क्रिकेट सुनता और देखता रहा हूँ। जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो पाँच दिनों का टेस्ट मैच होता था और रेडियो पर कमेंटरी आती थे। सुशील दोषी, जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी आदि कमेंटेटर थे। कान से रेडियो लगा रहता था और कमेंटेटर की भाषा में ऐसा दृश्यगत प्रवाह होता था कि आँखों के सामने क्रिकेट दृश्यमान हो उठता था। अक्सर ठंड के दिनों में टेस्ट मैच होता था। खेत-खलिहान में पुआल पर पड़े कमेंट्री सुनता। सुनील गावस्कर, अंशुमान गायकवाड़, विश्वनाथ, दिलीप वेंगसरकर, कपिल देव, चंद्रशेखर, विशन सिंह बेदी, मदन लाल, रोजर बिन्नी, महेंद्र अमरनाथ, सुरेंद्र अमरनाथ श्रीकांत आदि का जमाना था, लेकिन बेस्ट इंडीज का क्रिकेट में दहशत थी। उसके तेज गेंदबाज खूंखार लगते और सभी देशों पर राज करते।
टेस्ट मैच से क्रिकेट वन डे पर आया। पहले भारत जीतता कम, हारता ज्यादा। तभी 1983 का समय आया और कपिल देव के नेतृत्व में भारत विश्व कप जीत गया। क्रिकेट इसके बाद अभूतपूर्व ढंग से बदल गया। धन संपत्ति से लेकर जुगाड़ तक। उसकी घृणित राजनीति भी और साथ-ही-साथ क्रिकेट में चमक भी। टेलीविजन के आगमन के बाद रेडियो कमेंट्री बंद हो गई और टेलीविजन कमेंट्री होने लगी। गली-गली में बच्चों ने बैट पकड़ लिया। घरेलू खेलों पर इसका बुरा असर पड़ा। हाकी लगभग खत्म हो गई। स्कूलों में फुटबॉल और वालीबाल आदि लुप्त होने लगे। क्रिकेट ने अन्य खेलों के हिस्से को हड़प लिया। पैसे का अभूतपूर्व प्रवाह और चकाचौंध ने भी खेल और खेल भावना को बर्बाद किया। क्रिकेट खिलाड़ी पैसे के लोभ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रचारक बन गये और उन चीजों का भी प्रचार किया जो जनता के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
मौजूदा दौर में क्रिकेट युद्ध की तरह हो गया है। पाकिस्तान से भारत खेल खेलता है, लेकिन भारत पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलायेगा। अगर सत्ता के इशारे पर मुँह ही फुलाना है तो ढंग से फुलाइए। हँसना और मुँह फुलाना एक साथ नहीं हो सकता।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







