पृथ्वी सात महाद्वीपों में बँटी हुई है — एशिया, अफ़्रीका, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया। पृथ्वी के इस भौगोलिक मानचित्र पर आज कुल 195 स्वतंत्र राष्ट्र हैं। विश्व का राजनैतिक मानचित्र भी मुख्यतः भौगोलिक कारकों पर ही आधारित है, कहीं पहाड़ हैं, तो कहीं खाई, कहीं नदियाँ हैं, तो कहीं जंगल। कुछ ऐतिहासिक, राजनीतिक और धार्मिक कारण भी रहे हैं। कारण जो भी रहा हो, हर राजनीतिक इकाई का उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना रही है, जहाँ आर्थिक विकास की संभावना प्रबल रहे।
जंगलों से लेकर अपने कमरे में बैठकर जंगल देखने का हमारा इतिहास कम से कम 3 लाख साल पुराना है। इतिहास हमें इसी आर्थिक विकास की कहानी सुनाता है। इसी कहानी के हम सब किरदार हैं। नाम हो ना हो, योगदान तो सबका होता है।
कल्पना कीजिए जब हमारे पूर्वज गुफाओं और जंगलों में रहते होंगे, तब उनका जीवन कितना कठिन रहा होगा? जंगल में तो शेर भी होगा, साँप भी। शारीरिक स्तर पर हम प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने को कितने असहाय रहे होंगे? इंसान का एक अकेला बच्चा क्या जंगल में जवान हो पाएगा? संभवतः नहीं। इसलिए, इंसानों ने समूह बनाया। एक साथ हमने कबीले बनाये, गाँव बसाए। खेती ने हमें खाद्य सुरक्षा दी। बड़े-से-बड़े बंगला में बैठा व्यक्ति आज भी उस व्यवस्था पर निर्भर करता है, जो ज़मीन से लेकर खाने की मेज पर खाना पहुँचाती है। इसी व्यवस्था को हम राजनीति के माध्यम से क़ायम करते हैं, जो हमारी सामूहिक और व्यक्तिगत जरूरतों को पूरी कर सके।
अपनी जरूरतों के लिए हमें दूसरों पर निर्भर करना ही पड़ता है। विकास की दौड़ में व्यक्तिगत व्यापार से बढ़ते-बढ़ते हमारी निर्भरता बाजार तक पहुँच गई। अगर बाज़ार व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक बंधुत्व को सुनिश्चित कर पाता, तो राजनीति की जरूरत नहीं होती। जब बाज़ार में आदान-प्रदान के माध्यम से लेकर प्रतिष्ठा और अवसर की समता का अभाव होता है, तब हमें राजनीति की जरूरत जान पड़ती है। क्योंकि बाज़ार से हमें सामान तो मिल जाता है, पर न्याय नहीं मिलता। और जहाँ न्याय नहीं मिलता, वहाँ हमें स्वतंत्रता नहीं मिल सकती — विचार की, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता नहीं मिल सकती।
राजनीति कई प्रकार की हो सकती है। राजशाही, तानाशाही या हो लोकशाही, चाहे किसी भी प्रकार की राजनीति हो, हमें एक चीज इन सब में ज़रूर मिलती है। चाहे लिखित हो या नहीं, हर देश काल में हर समाज के पास एक संविधान रहा है। संविधान ऐसे नियम-क़ानूनों का दस्तावेज है, जो उस समाज की राजनीति की हदों को निर्धारित करती है। राजनीति के दो पहलू होते हैं, एक तरफ़ सत्ता होती है, और दूसरी तरफ़ समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता। सत्ता के पास शक्ति होती है कि वह समाज के प्रबंधन के लिए नियम क़ानून बना सके। राजनीति के विभिन्न प्रकारों में सत्ता और स्वतंत्रता के बीच ही संघर्ष चलता आया है। राजशाही में राजा के पास कानून बनाने की शक्ति थी। तानाशाही में यही ताक़त कोई एक व्यक्ति या संस्था ले लेती है। लोकशाही में राजनीति की हदें बहुमत निर्धारित करती है।
जब विधान के निर्धारण की शक्ति सीमित होगी, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमायें भी संकुचित होंगी। राजशाही और तानाशाही में बस शासक की नैतिकता का अंतर होता है। दोनों ही शासन में संविधान किसी एक व्यक्ति या संस्था के फरमान तक सीमित रहता है। दूसरा विश्वयुद्ध ऐसी व्यवस्था के ख़िलाफ़ मानवता के एक संघर्ष की पराकाष्ठा थी। हिटलर ने दुनिया को लोकशाही का चुनाव करने को मजबूर कर दिया।
लोकशाही या लोकतंत्र के संविधान लिखित होते हैं। संविधान किसी देश का वह सर्वोच्च, लिखित कानून है जो वहाँ की सरकार, शासन व्यवस्था, नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण करता है।
इतिहास से लड़कर 26 नवंबर, 1949 को हमने भारत को एक लिखित संविधान दिया, जिसकी प्रस्तावना में लिखा है —
“हम, भारत की जनता, भारत को एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और इसके सभी नागरिकों को निम्नलिखित सुरक्षा प्रदान करने का दृढ़ संकल्प लेते हैं:
न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता; स्थिति और अवसर की समानता; और उन सभी के बीच समानता को बढ़ावा देना।
बंधुत्व जो व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करता है; हमारी संविधान सभा में, 26 नवंबर, 1949 को, हम इस संविधान को अपनाते, अधिनियमित करते और स्वयं को प्रदान करते हैं।”
इस संविधान में हम ख़ुद को न्याय, स्वतंत्रता, समानता, और बंधुत्व प्रदान करने का संकल्प लेते हैं। और ऐसा करने के लिए हम — एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का वादा करते हैं। यह वादा हमने एक दिन में नहीं किया। इसके पीछे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए हमने लगभग एक सदी का संघर्ष किया तब जाकर 15 अगस्त, 1947 को हमें आजादी मिली। विभाजन की त्रासदी के बावजूद भारत की संविधान सभा 2 साल, 11 महीने और 18 दिन में 11 सत्रों में बहस कर इस संविधान तक पहुँचे। इसके लिए 60 अन्य देशों के संविधान का अध्ययन किया गया। संविधान सभा का चुनाव और प्रतिनिधित्व एक जटिल प्रक्रिया से होकर गुजरा, बहुलता प्रधान इस भूखंड के लिए एक संविधान बनाना कोई आसान काम नहीं रहा होगा।
क्या आज 2026 में 76 साल बाद हम अपने ही द्वारा निर्धारित आदर्शों पर कायम रह पाए हैं?
धर्म के नाम पर विभाजन, क्या एक पाकिस्तान काफ़ी नहीं था? आज भी देश की राजनीति हिंदू-मुस्लिम, जात-पात पर आधारित है। क्या बंधुत्व का बोध आपको होता है?
शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं में क्या हमें समानता देखने को मिलती है?
क्या विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा को हम स्वतंत्र हैं?
क्या मौजूदा राजनीति में हम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की कल्पना भी कर सकते हैं?
एक ऐसी ही कल्पना की कोशिश “इहलोकतंत्र” है। हमें धर्मनिरपेक्ष होने के लिए, अपनी राजनीति को इसी लोक तक सीमित करना होगा। परलोक का लालच, और पाताल का डर दिखाकर लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना असंभव जान पड़ती है।
Democracy का Demos लोग हैं, लोक नहीं। शब्दशः Democracy का अनुवाद लोगतंत्र होना चाहिए था। पर भारत के भौगोलिक भूखंड की विशालता, और सामाजिक विविधता को देखते हुए हमने लोगों को ही नहीं समस्त लोक को राजनीति के दायरे में ला रखा। नतीजा राजनीति आज समाजवाद के रास्ते से भटक गई है। जब भी राजनीति बाजार के पक्ष में भारी होगी, उसकी संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी। क्योंकि बाजार में असमानता का होना उसका अनिवार्य गुण है, और राजनीति को अर्थ ही न्याय की अवधारणा से मिलती है।
इहलोकतंत्र की कल्पना तक पहुँचने के लिए हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधार की जरूरत जान पड़ेगी। इस मंच पर हम कुछ जरूरी परिवर्तन पर चर्चा करेंगे, जो हमारे लिए न्याय के राज को सुनिश्चित कर सके। सामाजिक समाधान का रास्ता संविधान से होकर ही गुज़रता है।

युवा लेखक और चिंतक, दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री ( गोल्ड मेडलिस्ट)









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