डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में चवदार तालाब आंदोलन (महाड़ सत्याग्रह) हुआ 20 मार्च 1927 को। इस महान आंदोलन को पूरे सौ वर्ष होने वाले हैं। चवदार का मराठी में अर्थ होता है स्वादिष्ट। चवदार का स्वादिष्ट पानी उच्च जातियाँ पी सकती थीं, मुस्लिम समूह भी पी सकते थे। यहाँ तक कि दलित जातियों की भैंसें और गायें भी चवदार तालाब का पानी पी सकती थीं। अगर कोई पानी नहीं पी सकता था तो वे थीं दलित जातियाँ। जो तथाकथित हिन्दू थे और जिनके लिए समाज में ऊँचा स्थान निर्धारित था, उनमें इतनी घृणा और हिंसा भरी हुई थीं कि वे दलितों को जानवरों से भी गया-बीता मानते थे। धर्म की उस बुनावट को समझिए, जिसमें आदमी के साथ आदमी की तरह व्यवहार नहीं होता था।
उसी महाराष्ट्र में 2025 में महान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गठित हो चुका था। यह संगठन ‘‘हिन्दू-हिन्दू‘ करने लगा था। सौ वर्ष बाद भी वही कर रहा है, लेकिन इसे हिन्दुओं की एकता नहीं चाहिए। इसे जाति की सुपरमेसी चाहिए। जब डॉ अम्बेडकर ने चवदार तालाब आंदोलन किया, तब गोलवलकर चुप रहे और आज 2026 में, सौ साल बाद, समतापूर्ण व्यवहार कायम करने के लिए यूजीसी एक्ट आया, तब भी मोहन भागवत चुप रहे। गोरखपुर में मोहन भागवत ने बयान दिया है कि जाति के लिए नहीं, हिन्दू समाज के लिए काम करना चाहिए। जाति बने रहे और आप ‘‘हिन्दू-हिन्दू‘ करते रहें। वोट लेते रहें और खुद घी-मलीदा खाते रहें। गजब ढोंग और ढकोसला का वितान तान रखा है। जो लोग प्रधानमंत्री को विष्णु का अवतार घोषित कर रहे थे, वे उन्हें तेलिया कहने पर उतारू हो गए। ऐसे नैतिकताहीन लोग प्रधानमंत्री को ‘हिन्दू सम्राट’ के पद से उतार कर तेली की माला पहनाने लगे। यूजीसी एक्ट के पूरे प्रकरण में महानुभाव मोहन भागवत मुँह पर ताला लगाये रहे।
डॉ अम्बेडकर चवदार तालाब का सिर्फ पानी पीने नहीं गये थे। वे हजारों वर्षों के कलंक को धोने गये थे। वह जाति की छाती पर चढ़ कर उसे रौंदने गये थे। सौ वर्ष बीत गए। हिन्दू धर्म में मौजूद जाति-विद्वेष से आहत होकर डा अम्बेडकर जीवन के अंतिम क्षण में बौद्ध हो गये थे। उनके बहुत से अनुयायी उस वक्त भी बौद्ध हुए और बाद के दिनों में भी। सनातन धर्मी ने दलित जातियों को कभी सम्मान से नहीं देखा, न बराबरी का दर्जा दिया। मजबूर होकर कभी उन्होंने इस्लाम ग्रहण किया, कभी ईसाई हुए और कभी बौद्ध।
आज भी हिन्दुओं में आदमी जन्म कहाँ लेता है? वह तो जाति बन कर जन्म लेता है। गांधी, लोहिया, जयप्रकाश की परंपरा से उठी जाति विरोधी आवाज और महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर, पेरियार की परंपरा से उठी जाति-विरोधी आवाज सत्ता में भागीदारी पर ठिठक गयी है। सत्ता में भागीदारी चाहिए। जरूर चाहिए, लेकिन समतापूर्ण समाज भी चाहिए। जाति एक दड़वा बनाती है, जिसमें इंसान घुटता रहता है। जाति के हजारों दड़वे हैं और उन दड़वों में इंसान जितना भी स्नान कर ले, लेकिन देह पर फिर भी मैल जमी ही रहती है, मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह। यों संप्रदाय भी एक बड़ा दड़वा ही है, जिसमें पल कर वह दूसरे संप्रदाय के प्रति क्रूर हो उठता है। मनुष्य की लिंचिंग करता है। जाति को कायम रख कर हम जो समाज बनायेंगे, उसमें करूणा, विवेक और सद्भावना की जगह कम ही होगी। और जहाँ करूणा, विवेक और सद्भावना न रहे, वह समाज भी क्या सभ्य होगा?
हम असभ्य समाज के उत्तराधिकारी हैं। अगर नयी पीढ़ी को भी उत्तराधिकार में यही विरासत सौंपना चाहते हैं तो कोई बात नहीं और अगर नया समाज सौंपना चाहते हैं तो दड़वों की सीमाएँ तोड़नी ही होगी।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







