लोकतंत्र मनुष्य की चाहत है, क्योंकि इस तंत्र में मनुष्य को ज्यादा-से-ज्यादा आजादी मिल सकती है। और तंत्र में मनुष्य के दिल और दिमाग पर ज्यादा कब्जा करने की गुंजाइश है। यों जिस तरह से नेट और एआई का संजाल फैला है, उसमें मनुष्य की निजता और स्वतंत्रता खतरे में है। दुनिया एक या दो दिन की बनी हुई है नहीं, हजारों हजार वर्ष लगे हैं। इस दुनिया में मनुष्य पर शासन करने के लिए भी अनेक तंत्र का विकास हुआ है। अनेक जीवन पद्धतियाँ भी विकसित हुई हैं, जिसमें मनुष्य सुकून से रह सके। मनुष्य ने, समय-समय पर, उसमें बदलाव के लिए भी विद्रोह किया है। यह क्रम आज भी जारी है और आगे भी जारी रहने की संभावना है।
हम लोकतंत्र को लेकर कुछ ज्यादा ही आग्रही रहे हैं। जब चीन में थ्येनमान चौक पर आंदोलन के लिए उतारू हजारों नवयुवकों को गोलियों से भूना जाता है तो अच्छा नहीं लगता या फिर स्टालिन द्वारा ही अनेक विपक्षियों या लेखकों को कैदखाने में डालता है या साइबेरिया भेजता है, मन में कसक होती है। हिटलर ने जिस तरह यहूदियों को गैस चैंबर में मरवाया, वह किसे सुखद लगेगा। स्टालिन के आज भी बहुत से प्रशंसक हैं और चीन विकास और ताकत के संदर्भ में पूरी दुनिया को चुनौती दे रहा है। हर तानाशाह के कुछ चमकते नारे होते हैं, जिसमें जनता उलझ-पुलझ कर रहे जाती है। जनता नारों का गुलाम बन कर देश की गुलामी पर दस्तखत कब कर देती है, इसका पता नहीं चलता।
बावजूद इसके मनुष्य की तलाश जारी रहती है। निरंकुश नेता और शासक कई बार लोकतंत्र की खाल पहन कर आते हैं। लोग उसकी पहचान नहीं कर पाते। यह सवाल भी बहुत मौजू है कि हम निरंकुश मानसिकता को कैसे समझें। इसकी क्या कसौटी हो सकती है। मुझे लगता है कि इसके पाँच-छह पैमाने हो सकते हैं – पहला- लोकतंत्र के नियम-कायदों के प्रति प्रतिबद्धता, दूसरा- विपक्षियों के प्रति उसका रवैया, तीसरा – हिंसा के प्रति उसकी सोच, चौथा – नागरिक स्वतंत्रता के प्रति उसका रवैया, पाँचवाँ – अल्पसंख्यकों के प्रति उसका व्यवहार और अंतिम – उसकी कथनी और करनी के व्यवहार। लोकतंत्र के नियमों और कायदों के अंतर्गत संविधान, संसद, चुनाव आयोग, न्यायपालिका आदि आते हैं। इनके उल्लंघन की कोशिश निरंकुश सत्ता की पहचान है। अपनी लोकप्रियता के चक्कर में निरंकुश सत्ता लोकतंत्र के कायदों को चुनौती देती रहती है। वह विपक्षियों को खारिज करती है और उसे देशद्रोही के खाँचे में डालती है। निरंकुश सत्ता अपने कार्यकर्ताओं की हिंसा का समर्थन करती है। नागरिक स्वतंत्रता के माध्यमों पर हमला करती है और उसकी आजादी में तरह-तरह के रोड़े अटकाती है। वह अल्पसंख्यक समूहों के प्रति निर्दय होती है और उसके खिलाफ विष-वमन करती रहती है। निरंकुश सत्ता गरैई मछली की तरह होती है। अपने वादों से हर वक्त फिसलती रहती है। अपने कहे गए पर वह टिकती नहीं है।
मनुष्य तो वर्तमान की समस्याओं से ही जूझता है। इतिहास सबक मात्र प्रस्तुत कर सकता है। हर देश में चरमपंथियों का एक गिरोह पहले भी सक्रिय था, आज भी सक्रिय है। चरमपंथियों का इतिहास भी नया नहीं है। हम उसके इतिहास से सीख सकते हैं। मनुष्य शरीर भी है और मन भी। हमें वह व्यवस्था चाहिए, जिसमें दोनों की भूख शांत हो सके। भूखे भजन नहीं होता है। लेकिन भूख मिटने के बाद भजन न हो तो जीवन भी निरर्थक हो जाता है। लोकतंत्र अन्य तंत्रों के मुकाबले ज्यादा उदात्त होता है। हो सकता है कि अन्य तंत्र मनुष्य को ज्यादा रोटी दे, लेकिन लोकतंत्र रोटी के साथ मन के लिए भी स्पेस देता है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर






