2013-14 में जब नरेंद्र मोदी जी का भारतीय पटल पर उदय हो रहा था तो वे एक नई भाषा लेकर आये। किसी को ‘जर्सी गाय’ कहा, किसी को ‘पचास लाख का गर्ल फ्रेंड’ बताया, यहाँ तक कि पू्र्व प्रधानमंत्री को रेनकोट में ही नहला दिया। नरेंद्र मोदी जी को किसी ने नीच कहा तो किसी ने लाशों का सौदागर। व्यक्तिगत टीका टिप्पणी बताने लगी थी कि आगे पक्ष और विपक्ष में बहस कम, तीखी और अंदर तक काटने वाली बातें ज्यादा होंगी। विचारों का लोप होता जायेगा और अंधत्व का प्रवाह तेज होगा। लोग एक-दूसरे की बखिया उधेड़ने में मजा लेंगे और जनता को अंधी गुफा में कैद कर सत्ता पर काबिज होंगे।
अब भी कभी ‘अबोध बालक’ या ‘पप्पू’ या अन्य विशेषणों का इस्तेमाल करते हैं तो किसी के विचारों को खारिज करते हैं। आपने कान बंद कर लिया है। दिमाग कुंद है। कुछ सुनना नहीं है, न सोचना है। पक्ष और विपक्ष में परस्पर विश्वास न हो, तो लोकतांत्रिक व्यवहार का क्षरण होता है। प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता पर इसकी जिम्मेदारी ज्यादा होती है कि वह लोकतंत्र को बचाये रखे। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी लोकतंत्र को नष्ट करने में सहायक होती है। प्रधानमंत्री ने जो जंग शुरू की है, उसका कुल परिणाम यही होना था कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बिना प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को बोले, लोकसभा में पारित हो जाय। सांस्थानिक लोकतंत्र की हालत क्रमशः छीजती चली जा रही है। ऐसी हालत देखकर कुछ लोग कह रहे हैं कि जब घर में लोकतंत्र नहीं है, तब संसद में लोकतंत्र कहाँ रहेगा? घर-परिवार और समाज लोकतांत्रिक होगा, तभी देश में लोकतंत्र कायम रहेगा। लोकतंत्र को ऊपर से थोपा नहीं जा सकता, बल्कि लोकतंत्र नीचे से ही सँवरेगा।
देश जब आजाद हुआ तो घर-परिवार या समाज लोकतांत्रिक नहीं था। घर-परिवार में पुरुष की चलती थी। जो घर के मुखिया होते थे, वे ही फैसले लेते रहते थे। बहुत कम घरों में लोग मिलजुल कर फैसला लेते थे। यहाँ तक कि भारत में भी दो भारत था- एक रजवाड़ों का भारत और दूसरा सामान्य भारत। रजवाड़ों की एक अलग दुनिया थी और उसमें स्वतंत्रता आंदोलन का भी बहुत कम असर था। रजवाड़े अंग्रेजों को ही अपने सर्वेसर्वा मानते थे। देश जब आजाद हुआ तो रजवाड़ों ने अंग्रेजों से प्रार्थना की कि उन्हें भी आजाद कर दीजिए। अगर उनकी प्रार्थना अंग्रेज स्वीकार कर लेते तो भारत पांच सौ से अधिक टुकड़ों में बँट जाता। जो लोग सत्ता में आये, उनके सामने विकट समस्या थी। समझाने-बुझाने पर कई रजवाड़ों ने अधीनता स्वीकार कर ली। लेकिन कई उछल-कूद मचाने लगे। तत्कालीन गृहमंत्री ने पहले समझाया -बुझाया, रजवाड़े नहीं माने तो धमकी दी और तब भी नहीं माना तो जबर्दस्ती भारत की सत्ता कायम की। इस वजह से सरदार पटेल को ‘लौह पुरुष’ कहा जाता था। लोकतांत्रिक व्यवहारों की दृष्टि से देखें तो यह सही नहीं था, लेकिन देश की एकता के लिए यह व्यवहार जरूरी था।
सांस्थानिक लोकतंत्र की हालत देखिए। बिहार के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार और विपक्ष के नेता हैं तेजस्वी यादव। नीतीश कुमार उम्रदराज हैं। उन्होंने तेजस्वी यादव के पिता लालू प्रसाद के साथ राजनीति की है। अब इसका हवाला देकर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहें कि ‘बैठो, बैठो, तुम्हारे बाप के समय के हैं’, तो यह लोकतांत्रिक व्यवहार कतई नहीं है। सांस्थानिक लोकतंत्र में बहस और संवाद से मतलब है। हम एक दूसरे के विचारों के बारे में बात कर सकते हैं। तेजस्वी यादव की उम्र कम है, तो क्या उनके विचारों का कोई मतलब नहीं होता।
लोकतंत्र में लोक केंद्र में रहता है। लोक और उसकी दुनिया, लोक के विचार और उनकी जरूरतें ही महत्वपूर्ण होते हैं। मगर आज लोकतंत्र के केंद्र से लोक गायब है। तंत्र को संचालित करने का हुनर ही केंद्र में है। हुनर का मतलब है – झूठ, नफ़रत, साजिश, धन पशुओं की महत्ता, चालबाजी, नये नये नैरेटिव।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





