इन दिनों : वंदे मातरम और माता की रुलाई

"मान लिया कि उन्हें महात्मा गांधी और नेहरू पसंद नहीं है। उनकी तस्वीरें हिन्दू महासभा और आरएसएस के दफ्तरों में नहीं लगाती जा सकतीं। कम-से कम-सरदार पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें तो लगाते। मगर किसी आर एस एस के दफ्तर में इनकी तस्वीरें नहीं हैं।" - इसी आलेख से

मां मर गई। उसे वापस घर ले जाने का कोई इंतजाम नहीं है। बेटे ने अस्पताल से प्रार्थना की, गिड़गिड़ाया। बहुत मिन्नतें कहीं तो स्ट्रेचर मिला। स्ट्रेचर इस शर्त पर डॉक्टर ने दिया कि जब तक स्ट्रेचर वापस नहीं मिलता है, तब तक पत्नी और बेटा गिरवी रहेंगे। घटना नवादा जिले के अकबरपुर स्वास्थ्य केंद्र की है। इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं होगा, न किसी पर कार्रवाई होगी। इंसानियत शर्मशार हुई या नहीं, लेकिन हमारी वास्तविक तस्वीर यही है। ये तो निर्धन लोग हैं। लोकतंत्र में इनकी हैसियत महज एक वोट है । पच्चीसों हजार लोग भूखे-प्यासे हवाई अड्डे में पड़े रहे। दिल्ली और अन्य जगहों के भाड़े बेतहाशा बढ़े। लोग रोते गिड़गिड़ाते रहे। कौन देखने गया? विमान मंत्री या सांसद या और कोई?

समाज में कितनी ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जिनमें मानवता नाम की कोई चीज नहीं है, लेकिन किसी के चेहरे पर शिकन नहीं आती। हम संसद में वंदे मातरम पर बहस कर रहे हैं। प्रधानमंत्री हफस रहे हैं। घंटे भर बोलते रहे। नेहरू और कांग्रेस ने कौन-कौन से पाप किए, गिनाते रहे। भाजपाइयों को कम-से-कम इतनी बुद्धि तो होनी चाहिए कि वंदे मातरम का इतिहास लिख कर उनके हाथ में थमा देते। 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम के दो अंतरे लिखे। सात साल बाद यानी 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंद मठ’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें अन्य अंतरे जोड़े गए। क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम के नारे लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूलते रहे। जब 1930 के बाद सांप्रदायिक विवाद हुआ, मुस्लिम लीग ने सवाल उठाया, उसके बाद महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल, पंडित नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने मिलकर दो अंतरे को राष्ट्रगीत घोषित किया। संविधान सभा ने भी इसे माना। यहां तक कि हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी मौजूद थे।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा कि इस ऐतिहासिक घटना में अपना सिर डाल कर हिन्दू-मुस्लिम की दूरी को और चौड़ी की जा सकती है, जिससे बंगाल चुनाव जीता जा सकता है।

मान लिया कि उन्हें महात्मा गांधी और नेहरू पसंद नहीं है। उनकी तस्वीरें हिन्दू महासभा और आरएसएस के दफ्तरों में नहीं लगाती जा सकतीं। कम-से कम-सरदार पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीरें तो लगाते। मगर किसी आर एस एस के दफ्तर में इनकी तस्वीरें नहीं हैं। मज़ा यह है कि प्रधानमंत्री जिस मुस्लिम लीग का जिक्र कर मुस्लिम तुष्टिकरण की बात कर रहे हैं, उसी मुस्लिम लीग के साथ उनके पूर्वज बंगाल और सिंध में राजपाट का आनंद लूट रहे थे।

बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी है तो उसकी राष्ट्रीयता इतनी ओछी क्यों है कि उसमें बीस- पच्चीस करोड़ जनता के लिए कोई स्पेस नहीं है? क्या यह हिन्दू या कहें कि हिन्दुओं के कट्टर समूहों का तुष्टिकरण नहीं है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कम से कम आजादी की लड़ाई का जिक्र कर अपने भद नहीं करवानी चाहिए। उस लड़ाई में आपके वैचारिक गुरु अंग्रेजों की दलाली कर रहे थे। एकाध वीर तो अंग्रेजों से पेंशन तक लेते रहे। पूरे बावन साल तक आर एस एस ने न राष्ट्रगीत स्वीकार किया, न अपने यहां तिरंगा फहराया। आज भी उनका गाना वंदे मातरम नहीं है। अब इस गान के लिए प्रेम उमड़ आया है तो आज से अपने स्वयंसेवकों से गवाना शुरू करवा दें। उनके इतिहास पर जो कालिख लगी है, इससे थोड़ी हल्की हो जायेगी।

अच्छे दिन आयेंगे से लेकर ग्राम गोद तक और चौकीदारी से लेकर स्टार्ट अप इंडिया तक प्रधानमंत्री नैरेटिव ही गढ़ते रहे। नैरेटिव से चुनाव जीता जा सकता है, राष्ट्र तो गर्त में ही जाता है।

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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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