हस्तिनापुर में कृपाचार्य पांडव और कौरव को शिक्षा दे रहे थे। एक दिन भीष्म उनकी पाठशाला में पहुंचे। हाल-समाचार पूछने के बाद भीष्म ने कृपाचार्य से पूछा कि पांडव और कौरव को किस-किस चीज की शिक्षा दे रहे हैं? कृपाचार्य ने उल्लसित होकर उत्तर दिया कि इन्हें मल्ल युद्ध, धनुर्धर विद्या और शस्त्र संचालन की अनेक विद्याएँ दी जा रही हैं। भीष्म पितामह चिंतित हुए। उन्होंने कृपाचार्य से फिर पूछा कि क्या बच्चों को शास्त्रों की शिक्षा नहीं दी जा रही? शस्त्र संचालन जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है कि वे शास्त्र से अवगत हों। शास्त्र के बिना शस्त्र संचालन की शिक्षा खतरनाक है। इससे बच्चों में दस्यु – वृत्ति बढ़ेगी। बच्चों को इसकी जानकारी जरूरी है कि बच्चे जानें कि शस्त्र का प्रयोग कहाँ करना चाहिए? शस्त्र – संचालन के पीछे विवेक की बहुत जरूरत है। यह ज्ञान शास्त्र से ही संभव है। भीष्म के जाने के बाद कृपाचार्य द्वन्द्वग्रस्त हो गये। धृतराष्ट्र कहते हैं कि उनके बच्चों को शस्त्र की शिक्षा चाहिए, शास्त्र की नहीं। शास्त्र की शिक्षा से बच्चों में सात्विक गुणों का विकास होता है, शस्त्र से रजोगुण का। मुझे रजोगुण वाला बच्चे चाहिए जो राजपाट संभाल सके।
कृपाचार्य बचपन से ही हस्तिनापुर में पले बढ़े थे। वे हस्तिनापुर के ऋणी थे। उस वक्त सम्राट धृतराष्ट्र थे। वे धृतराष्ट्र की अवहेलना नहीं कर सकते थे। कृपाचार्य भीष्म के व्यवहार से आहत हुए। उन्होंने सोचा कि सत्ता पोषित शिक्षक एक भृत्य यानी नौकर की तरह होता है, उसमें स्वतंत्र बुद्धि की तलाश करना बेईमानी है। कौरव और पांडव की शिक्षा के लिए कृपाचार्य काफी नहीं है। मुकम्मल शिक्षा के लिए किसी अन्य शिक्षक की जरूरत है।
आर एस एस के चीफ मोहन भागवत कह रहे हैं कि विश्व शक्ति की ओर देखता है, सत्य को नहीं। उन्हें शस्त्र चाहिए, शास्त्र नहीं। उनके इस बयान से पता चलता है कि आर एस एस का संचालन किस आधार पर होता है। अविवेक उनकी थाती है। शस्त्र पर घमंड करने वाले कौरवों का क्या हुआ? अंततः उन्हें न केवल जान देनी पड़ी, बल्कि उनके इतिहास के प्रति भी लोगों की निगाह अच्छी नहीं है।
दुर्भाग्य यह है कि पूरी शिक्षा पद्धति का भी यही हाल है। हम बच्चों को सूचनाएँ दे रहे हैं। इन सूचनाओं का इस्तेमाल कैसे करें, यह नहीं सिखा रहे। हम शब्द सिखा रहे हैं, लेकिन शब्दों के इस्तेमाल का तरीका नहीं सिखा रहे। हमारी हालत रहीम कवि के दोहे की तरह है-
“रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।”
जो मन में आये, जिह्वा तो बक देती है, लेकिन उसकी बदतमीजी का खामियाजा कपार को झेलना पड़ता है। जीभ अंदर बैठी रहती है और कपार पर लाठी बजरती रहती है। आज की शिक्षा की दुर्गति-कथा यही है। शब्द में शक्ति होती है। इस शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझ कर करना चाहिए, वरना यह शक्ति कलही हो जाती है।देश में जो अशांति है, उसकी बड़ी वजह शब्दों का ग़लत चयन है और गलत चयन इसलिए है, क्योंकि दुर्नीति से प्रेम है।
दुनिया में वही अमर होता है जो शास्त्र और शक्ति के संतुलन को साध लेता है। बुद्ध तो राजा थे। राज्य की शक्ति उनके पास थी, लेकिन वे उससे असंतुष्ट रहे। उन्होंने शास्त्र का रास्ता अपनाया। शास्त्र और संवेदना को साधा। दुनिया में ईसा पूर्व के गौतम बुद्ध मौजूद हैं। शक्ति की आराधना करने वाले कितने सम्राट आये और गये। यहां तक कि गांधी के सीने में गोली मार कर उनके शरीर को खत्म किया गया, लेकिन दुनिया के अनेक देशों में गांधी मौजूद हैं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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Very nicely explained Shastra an
d Shashtra but as a nation we should be strong and capable of defending our nation and the world and experts in Shastra I.e. arms.
For internal management our people should be learned and experts in Shaastra.
Thanks Jitendra ji! This article doesn’t deny importance of arms. It stabilises only importance of knowledge. It is shaastra that cultivates ‘vivek’.