1922 में वनिटो मुसोलिनी का उदय इटली में हुआ तो 1933 में जर्मनी में एडोल्फ हिटलर का। दोनों ने सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने के पहले सत्ता को उलटने की असफल कोशिश की थी। इस कोशिश में दोनों को सजा काटनी पड़ी थी। दोनों धीरे-धीरे लोकप्रिय होते गये और नेतृत्व की विकल्पहीनता के दौर में गठबंधन के माध्यम से सत्ता पर कब्जा कर लिया। दोनों देशों में उस वक्त इनसे बड़े नेता मौजूद थे, लेकिन वे अपने देश की समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे थे। देश के बूढ़े और घाघ नेतृत्व ने सोचा था कि मुसोलिनी या हिटलर से काम निकालने के बाद उसे त्याग देंगे। हिटलर को शीर्ष पर पहुँचाने वाले एक वास्तुकार वान पापेन थे। उन्होंने 30 जनवरी 1933 को बड़े ही आश्वस्तकारी ढंग से कहा- “हमने उसे अपने काम पर लगाया है। बस दो महीने की बात है, उसके बाद हम उसे ऐसे कोने में धकेल देंगे कि वह किकियाया फिरेगा।” लेकिन इतिहास में यह बात दर्ज है कि असल में कौन हिटलर के सामने किकियाने लगा । दोनों ने बहुत चालाकी से एक-एक को निबटाया।
अस्सी-नब्बे के दशक में वेनेजुएला में भी यही हुआ। हुगो चावेज जब सत्ता में आये तो फिर वह सत्ता के शीर्ष पर नंगा नाच किया। आज ही चीन के बारे में एक खबर है। राष्ट्रपति जिनपिंग ने पिछले तीन सालों में 30 से ज्यादा जनरल हटाए, जिनमें से कई गायब कर दिए गए।
सत्ता के शीर्ष पर पहुँच कर ज्यादातर लोग सामान्य व्यवहार नहीं करते। वे अहंकार में डूब जाते हैं और अपने समक्ष किसी को जी नहीं लगाते।
भारत को ही देखिए। जब देश आजाद हुआ तो एक राष्ट्रीय सरकार बनी थी, जिसमें विरोधियों को भी जगह मिली थी। पचास-साठ वर्षों तक विरोधियों के साथ दुश्मन की तरह व्यवहार नहीं किया गया, लेकिन इधर के वर्षों में दोनों की ऐसी तनातनी है जैसे दोनों दो देश का नेतृत्व कर रहे हों। दुनिया के स्तर पर भी हम देखें तो नेतृत्व बहुत आश्वस्त नहीं करता। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप एक लिच्चड़ नेता की तरह विश्व के सामने पेश आ रहे हैं। भारत के नेतृत्व की कमी के कारण वह देश पर चढ़ बैठा है और भारत क्या फैसला ले रहा है, वह पहले घोषणा कर देता है। नरेंद्र मोदी और उसके समर्थक अमेरिका से डील पर जितना इतरायें, लेकिन क्या यह बेहूदगी नहीं है कि अमेरिका के सामान पर जीरो ट्रैफिक और भारतीय सामानों पर 18 प्रतिशत ट्रैफिक, जबकि मनमोहन सिंह के समय तीन प्रतिशत से भी कम था।
हम नितांत एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जिसमें कीर्तन कम और हरि बोल ज्यादा है। इतने लचर नेतृत्व के पक्ष में दलील देते हुए लोग शर्म भी नहीं महसूस करते। जिस समाज में लोभियों की संख्या जितनी रहेगी, ठग उतने ही मौज में रहेंगे। लोकतंत्र पर खतरा इस बात से भी है कि वह फिलहाल दुष्प्रचार पर टिका है। चैनल पर एंकर लोगों को पत्रकार या विशेषज्ञ की हैसियत से बुलाते हैं, लेकिन ये लोग अंदर से सत्ता की दलाली करते हैं। इनकी विशेषज्ञता इस बात में रहती है कि कैसे सत्ता की रक्षा करें। सत्ता की बेवकूफियों पर भी कसीदे काढ़ने का हुनर इनके पास है। लोकतंत्र में पारदर्शिता और बहस की बहुत गुंजाइश है। प्रधानमंत्री को पारदर्शिता में कोई भरोसा नहीं है, इसलिए कभी वे पत्रकारों के समक्ष नहीं आते। संवाद कितने निम्न स्तर पर है, यह संसद की बहसों को सुन कर महसूस होता है।
लोकतंत्र को छीजते हुए देखना कम कष्टकारी नहीं होता। लोकतंत्र के ढाँचे में जो दीमक घुस आया है, उसकी पहचान और उसके खिलाफ संघर्ष आज की सबसे बड़ी जरूरत और जिम्मेदारी है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर





