अमेरिका जैसे संपन्न और लंबी लोकतांत्रिक परंपरा वाले देश में जेफ्री एपस्टीन का विकास कैसे हुआ? इतना घिनौना, बर्बर और हिंसक यौन उत्पीडन कैसे संभव हुआ? यह विकसित सभ्यता पर सिर्फ बदनुमा दाग नहीं है, बल्कि मनुष्य सभ्यता पर ही गहरा सवालिया निशान है। यह दुर्घटना मामूली दुर्घटना नहीं है। इस दुर्घटना में कोई सामान्य नागरिक नहीं है। है कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष और जानी-मानी हस्तियाँ आखिर दुनिया में हो क्या रहा है? क्या ऐसे विकास में ही ऐसी अमानवीय घटनाएँ अंतर्निहित है। नाबालिग लड़कियों से सिर्फ यौन संबंध ही नहीं बनाये गये। जबर्दस्ती गर्भधारण करवाया गया और उसके बच्चे गायब कर दिए गए। कई की हत्या कर दी गई। इसके संजाल दूर-दूर तक फैले हैं।
मुझे तो आश्चर्य लगता है कि इसके चक्कर में राष्ट्राध्यक्ष कैसे आते हैं? जिसने भी जेफ्री एपस्टीन की मदद ली, उनके पास शर्म बहुत कम है। वे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं देंगे। हमारे यहाँ तो चन्दन-टीका धारी प्रधानमंत्री हैं। धर्म की राजनीति करते हैं। अगर यह चर्चा है कि इस कांड में वे शामिल हैं, तो तत्काल इस्तीफा दें और अगर शामिल नहीं हैं तो अपनी सफाई दें और जहाँ से बात आती है, उस पर कानूनी कार्रवाई करें। उनकी चुप्पी का आखिर क्या मतलब है? उनके बड़बोले नेता इस पर प्रकाश क्यों नहीं डालते? एक बड़े बुद्धिजीवी ने फेसबुक पर लिखा कि एपिस्टीन फाइल में लोगों के प्राइवेट लाइफ है, इस पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए। सवाल है कि क्या यह महज निजता का मामला है? क्या दो बालिग स्त्री-पुरुष का मामला है? यह निर्दय, अनैतिक और कानून का बखिया उधेड़ने वाला मामला है। ऐसे राष्ट्राध्यक्ष जो एपस्टीन मामले के हिस्सेदार हैं, वे अपने देश की महिलाओं की क्या रक्षा करेंगे?
मौजूदा विकास में आदमी के स्वरूप क्या हैं और वे किस दिशा में जा रहे हैं, यह इसका नायाब उदाहरण है। इस मामले में या तो धनकुबेर हैं या शासक। धन का अतिरिक्त संग्रह दुनिया को अमानवीय बनाता है और सत्ता का अतिरेक अय्याशी की ओर ले जाता है। हमें इस दुनिया की बनावट के बारे में सोचना चाहिए। यह घटना मर्दवादी समाज की पोल खोलती ही है, साथ ही बताती है कि मनुष्य अभी तक निरा जानवर ही है। ज्ञान और विवेक उसे छू तक नहीं पाया है। सत्ता और धन का केंद्रीकरण मौजूदा विकास की जड़ में है। दोनों के केंद्रीकरण से अन्य अमानवीय कुकर्मों का जन्म होता है। यह केंद्रीकरण एक ऐसी अपसंस्कृति को जन्म देता है, जिसमें आदमी वस्तु में तब्दील हो जाता है।
एपस्टीन कोई एक दिन में जन्म नहीं लेता। एपस्टीन की मानसिकता आदमी को जानवर से भी बदतर बनाती है। जानवरों में जितना संयम है, उतना संयम भी मनुष्य में नहीं है। मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष माना गया, क्योंकि उसमें भी सृजन का गुण है और नाश का भी। मनुष्य चाहे तो नव संस्कृति का सृजन कर सकता है या फिर सृजित संस्कृति का नाश भी। फिलहाल तो नव संस्कृति की उम्मीद नहीं दिखती। असत्य भाषण करने और नफ़रत बोकरने में जिसका हृदय थोड़ा भी नहीं काँपता, उससे उम्मीद बाँधना बेमतलब है।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि वे देश को बोफोर्स डील से ट्रेड डील तक ले आए। बोफोर्स कांड को दिल्ली उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। और रहा ट्रेड डील। मनमोहन सिंह ने अमेरिका से ट्रेड डील 2.93 टैरिफ पर किया और वर्तमान प्रधानमंत्री ने 18 प्रतिशत टैरिफ पर। इसे वे अपनी जीत मान कर राज्य सभा में गरज रहे हैं। अमेरिकी सामान भारत में जीरो टैरिफ पर बिकेगा और भारत का सामान अमेरिका में बिकने जायेगा तो 18 प्रतिशत टैरिफ पर। आखिर प्रधानमंत्री किसे बेवकूफ बना रहे हैं?

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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