भागलपुर में एक अंग्रेज जज हुआ करते थे – सैंडिस। वे 1857 से 1860 तक जज रहे। दो-तीन वर्षों के बाद वे फिर 1863 में जज बन कर भागलपुर आये। उन्हीं की याद में शहर के मध्य में सैंडिस कम्पाउन्ड है। वैसे अब यह कंपाउंड जयप्रकाश नारायण के नाम कर दिया गया है, लेकिन लोग आदतन सैंडिस कंपाउंड ही कहते हैं। इसके दक्षिणी छोर पर एक बरगद का छायादार पेड़ था, जिसके नीचे सैंडिस अपना कोर्ट लगाते थे। भागलपुर में एकमात्र सार्वजनिक स्थल था, जिसमें लोग स्वच्छंदतापूर्वक जाते थे और घूमते थे। बच्चे विभिन्न तरह के खेल खेलते थे। हाई कोर्ट का सख्त आदेश है कि इस स्थल पर कोई स्ट्रक्चर नहीं बनाया जाय। लेकिन अधिकारियों ने कभी उनके आदेश को तवज्जो नहीं दी। विभिन्न तरह के स्ट्रक्चर बनते रहे। स्मार्ट योजना के तहत स्ट्रक्चर बनाने में गति प्रदान की गई।
अब यह मैदान ठेकेदार को थमा दिया गया है। ठेकेदार ने मैदान में प्रवेश के लिए टिकट लगा दिया है। आठ बजे दिन से चार बजे तक प्रति व्यक्ति दस रुपए। मैदान में जो पैसा लगा है, वह किसी अधिकारी का नहीं है। स्मार्ट योजना में भी पैसा किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नहीं लगा है, वह पैसा या तो जनता का है या जनता के माथे पर कर्ज का है। पैसा जनता का, कमाई ठेकेदार और अधिकारी की। गजब लोकतंत्र है। आम लोगों ने भी अपनी नियति मान ली है। अधिकारियों के घर और दफ्तर चमकाये जा रहे हैं और सड़कों पर निर्धन जनता पर बुल्डोजर चल रहा है।
मुझे तो इस बात की हैरत होती है कि जनता को गुस्सा क्यों नहीं आता?
मैं तीन-चार वैसे नेताओं को जरूर जानता हूँ, जिसकी राजनीति आजकल चमक बिखेर रही है। उसकी संपत्ति में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। कमाई दो पैसे की और आमदनी करोड़ों की। ईडी के लिए अवसर-ही-अवसर है। वह आँखें मूँदकर ज्यादातर घाघ नेताओं और अफसरों पर छापे डाल सकती है। लेकिन वह छापे डाले भी कैसे? उसके हाथ बंधे हैं और जीभ में ताले लगे हैं। ऊपर से जितनी चाभी भरी जायेगी, खिलौना उतना ही नाचेगा न!
देश पर दो तरह के लोगों ने कब्जा जमा रखा है। एक, जिसे कोई नहीं मिला, गाँव-घर में उसे लफुआ तक कहते थे, निकम्मे, बेरोजगार लोग। इनमें बहुत से विधायक और सांसद हुए। फिर मंत्री और…। दूसरे, प्रतिभाशाली, तेजतर्रार, पढ़ाकू। इनमें बहुत से लोग अफसर बने, कंपनियों के सीईओ, कंपनियों के मालिक। दोनों का देश पर कब्जा है। जिसे कोई काम न मिला, वह देश चला रहा है। घर भर रहा है। जिसे काम मिला, वह मजे कर रहा है। शहर-दर-शहर में अपार्टमेंट पीट रहा है। उन्हें सिर्फ इतना दुःख है कि बेपढ़े का हुक्म बजाना पड़ता है। कुछ लोगों ने खींज कर अपनी नौकरी छोड़ दी और बेपढ़ों की जमात में शामिल हो गए। वैसे दोनों में फर्राटे से लेन-देन होता है। दोनों मौसेरे भाई ही हैं।
नेताओं के नवज्ञान से यह देश चमत्कृत है। सांसद निशिकांत दुबे ने तो खैर सत्ता पक्ष की चमक बिखेर दी और सूडान को भी अपने देश में मिला लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को सुडान का राज्यपाल बना दिया। अगर आपको यह लगता है कि यह हंसने का विषय है तो आप गलतफहमी में हैं। आपका देश ऐसे ही होनहार लोगों के हाथ में चला गया है। प्रधानमंत्री तक इस नवज्ञान का विस्तार है। वे कभी तक्षशिला को बिहार ले आए थे।
नियति में मुझे कभी भरोसा नहीं रहा, लेकिन अब लगता है कि नियति पर भरोसा कर लेना चाहिए। ऐसे-ऐसे धुरंधर जहाँ कानून बना रहे हों, उस देश को नियति ही बचा सकती है।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







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