(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) है। इस अवसर पर लेखिका नमिता भंडारे ने “Women Won’t Go Back” (महिलाएँ पीछे नहीं जाएँगी) शीर्षक से एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा है। उनके अनुसार दुनिया का वर्तमान दौर नारीवादी होने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। आज ज़्यादा आवश्यक है कि महिलाओं के लिए पहले से ज़्यादा बोला जाये, लिखा जाये और किया जाये। यह इसलिए, क्योंकि आज दुनिया में महिलाओं के अधिकार शायद पिछले कई दशकों में सबसे बड़े खतरे के दौर से गुजर रहे हैं।
लगभग आधी सदी में महिलाओं ने जो उपलब्धियाँ हासिल की थीं, उनमें से कई पर अब पीछे जाने का खतरा मंडरा रहा है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत ही विविधता, समानता और समावेशन (DEI) से जुड़ी संघीय नीतियों को समाप्त करके की। उन्होंने यह भी कहा कि केवल दो ही लिंग होते हैं, जिसे ट्रांसजेंडर अधिकारों को पीछे ले जाने वाला कदम माना गया। कई विश्वविद्यालयों और स्कूलों में जेंडर स्टडीज़ के पाठ्यक्रम हटाए जा रहे हैं। टेक्सास ए एंड एम विश्वविद्यालय ने महिलाओं और जेंडर अध्ययन के अपने कार्यक्रम को बंद करने की घोषणा कर दी, जबकि फ्लोरिडा के स्कूलों में जेंडर पहचान से जुड़े पाठ हटाए जा रहे हैं।
दुनिया भर में चल रहे युद्ध और संघर्षों ने भी महिलाओं और लड़कियों की असुरक्षा को बढ़ाया है। बलात्कार आज भी युद्ध के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल दो वर्षों में यौन हिंसा के मामलों में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
कई क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों की स्थिति बेहद दयनीय है। उदाहरण के तौर पर, गाज़ा में अक्टूबर 2023 से शुरू हुए हमलों में 2025 तक लगभग 28,000 महिलाएँ और बच्चे मारे जा चुके थे। सूडान में लगभग 1.1 करोड़ महिलाएँ और लड़कियाँ भीषण खाद्य संकट का सामना कर रही हैं।
दुनिया के 64 देशों में समलैंगिक संबंध अभी भी अपराध हैं, और सात देशों, जैसे ब्रुनेई, युगांडा और यमन आदि में इसके लिए मौत की सजा तक दी जा सकती है। रूस से प्रेरित होकर हंगरी ने बुडापेस्ट प्राइड कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगा दिया।
विश्व बैंक की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले केवल 64 प्रतिशत कानूनी अधिकार ही प्राप्त हैं। और वास्तविक स्थिति इससे भी खराब है, क्योंकि कई देशों में इन अधिकारों को लागू करने के लिए जरूरी व्यवस्थाएँ ही मौजूद नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर कागजी रूप से 98 अर्थव्यवस्थाओं में समान वेतन का कानून है, लेकिन यह जानकर आश्चर्य होता है कि केवल 35 देशों में वेतन पारदर्शिता या उसे लागू करने की ठोस व्यवस्था है। यह स्थिति बताती है कि केवल कानून बन जाने से सामाजिक न्याय स्थापित नहीं होता। यदि संस्थागत ढाँचा मजबूत न हो, तो कानून कागज पर ही सीमित रह जाते हैं।
दुनिया के लगभग 54 प्रतिशत देशों में बलात्कार की कानूनी परिभाषा अभी भी “सहमति” (consent) पर आधारित नहीं है। फ्रांस ने भी केवल हाल के वर्षों में अपने कानून में सहमति की अवधारणा को शामिल किया है। संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की कार्यकारी निदेशक सीमा बहौस ने कहा है—
“ऐसी न्याय प्रणाली, जो आधी आबादी के साथ न्याय नहीं कर सकती, उसे न्याय व्यवस्था कहलाने का अधिकार नहीं है।”
संरचनात्मक स्त्रीद्वेष
ये सब केवल संयोग नहीं हैं। यह अक्सर सत्ता में बैठे पितृसत्तात्मक ढाँचों द्वारा निर्मित नीतिगत स्त्रीद्वेष का परिणाम है। कई जगहों पर घरेलू हिंसा को भी अप्रत्यक्ष रूप से वैधता मिलती दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, कुछ कानूनी व्यवस्थाओं में पति द्वारा पत्नी को मारने पर तब तक अपराध नहीं माना जाता जब तक गंभीर चोट न पहुँचे।
फिर भी महिलाएँ पीछे नहीं जाएँगी
इन सब चुनौतियों के बावजूद एक बात स्पष्ट है कि महिलाएँ अब पीछे नहीं लौटेंगी। वे जानती हैं कि जो अधिकार उन्होंने हासिल किए हैं, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ेगा। आज दुनिया भर में सड़कों पर उतरती महिलाओं के चेहरों में यह दृढ़ संकल्प दिखाई देता है -वे बेटियाँ हैं, माताएँ हैं, बहनें हैं। उन्हें पता है कि दांव पर क्या लगा है।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि अधिकार कभी स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं होते; उन्हें लगातार बचाना और आगे बढ़ाना पड़ता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि एक बार जब स्वतंत्रता की चेतना जाग जाती है, तो उसे वापस दबाया नहीं जा सकता। इसलिए, तमाम चुनौतियों और प्रतिगामिता के बावजूद, महिलाओं का संघर्ष जारी रहेगा।
और वे पीछे नहीं जाएँगी।
मूल आलेख : (htgender.substack.com)

कार्यकर्ता और लेखक
डॉ. अनिल कुमार रॉय सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए अथक संघर्षरत हैं। उनके लेखन में हाशिए पर पड़े लोगों के संघर्ष और एक न्यायसंगत समाज की आकांक्षा की गहरी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।







[…] महिलाएँ पीछे नहीं जाएँगी […]
आज का दिन उन सभी महिलाओं के साहस, उनकी शक्ति और समाज में उनके अतुलनीय योगदान को सम्मान देने का है, जो हर दिन दुनिया को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करती हैं।