इन दिनों : सत्य की छाती पर असत्य का तांडव

"आंदोलन की शमा कब की बुझ चुकी। उससे जो आंदोलनकारी निकले, सत्ता में जाकर उन्होंने कोई नया इतिहास नहीं लिखा, बल्कि जिन मुद्दों के खिलाफ आंदोलन किया, उन्हीं में वे समा गए।" - इसी आलेख से

पूरबा हवा की तासीर अलग होती है। मुलायम और ठंडी। पछिया रुखडी और उसकी गर्मी चुभने वाली होती है। पूरबा हवा होती है मुलायम, लेकिन देह में दर्द पैदा करती है। पछिया में रेत की तरह लू बहती है। सुबह से पूरबा हवा बह रही है। जाड़े के दिनों में सूरज पर प्यार उमड़ आता है, लेकिन गर्मी में उसे देखने का मन नहीं करता। उगता सूरज ज़्यादा चौंध पैदा करे तो मन में उत्साह नहीं होता।

बंगाल के चुनाव में सत्ता चौंधिया गई है। बौराई तो पहले से ही थी, लेकिन अब आँखों में गड़ने लगी है। मतदान के दिन सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के काम में बाधा पहुँचाने के लिए ममता बनर्जी को लानत भेजा है। क्या टाइमिंग है? लाखों-लाख वोट मतदाता सूची से काट दिए गए। 27 लाख मतदाता की ट्रव्यूनल में सुनवाई नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट चुप रहा। और ईडी क्या है? उसके कितने केस कोर्ट में सिद्ध हुए? जिस केस में ईडी प्रमाण नहीं जुटा सकी और लोगों को गिरफ़्तार किया, उस केस में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के अधिकारियों को सजा क्यों नहीं दी? ईडी को ज़िम्मेदारी से काम करना चाहिए। वह सरकार का टूल नहीं है।

ऐसा लगता है कि बंगाल में चुनाव नहीं हो हुआ। युद्ध हो रहा था, जिसमें एक तरफ़ थे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, उसके लगुए-भगुए, चुनाव आयोग, सेना और सुप्रीम कोर्ट और दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी। ममता बनर्जी पर कांग्रेस, वामपंथी और ओबैसी की पार्टी भी हमलावर है। ईडी और सीबीआई तो घिना चुकी ही है, अब कोर्ट भी अपने को इसमें दाखिल कर दिया है।

सत्ता का खेला समझिए। हाल में पटना में लड़की के बलात्कार और मर्डर की घटना हुई। कई नाम उछले। उनमें कुछ आरोपियों की गिरफ़्तारी हुई। मुक़दमा सीबीआई को सौंपा गया। लेकिन सीबीआई ने कोर्ट में आरोपियों के ख़िलाफ़ हलफनामा दायर नहीं किया और आरोपी को आसानी से ज़मानत मिल गई। तोता भी कभी-कभी टाँय-टॉय करता है, ईडी और सीबीआई उतना भी नहीं कर सकती। इसमें सत्ता की मंशा साफ़ है। इस केस की जाँच न हो और इसकी जाँच हो तो इसकी दिशा बदल दी जाए। इस केस में बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं।

रामगोपाल दीक्षित ने जेपी आंदोलन के दौरान एक क्रांति गीत लिखा था, जिसका अंतिम पैरा है- “आओ कृषक, श्रमिक, नागरिक, इंकलाब का नारा दो/ कविजन, शिक्षक, बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो./ फ़िर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है, बौराई है। तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है।” आंदोलन की शमा कब की बुझ चुकी। उससे जो आंदोलनकारी निकले, सत्ता में जाकर उन्होंने कोई नया इतिहास नहीं लिखा, बल्कि जिन मुद्दों के खिलाफ आंदोलन किया, उन्हीं में वे समा गए। भ्रष्टाचार हो या परिवारवाद या हो जातिवाद-संप्रदायवाद – वे उनमें डूबते चले गए। सत्ता के पावन-स्नान का मजा जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, चिराग़ पासवान, बेदखल किए गए नीतीश कुमार ले रहे हैं। काश, लालू प्रसाद परिवारवाद और भ्रष्टाचार से मुक्त हो पाते! जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, चिराग़ पासवान आदि नेता विपक्ष के खिलाफ बोलते हुए वे झिझकते नहीं हैं, यह बड़ी बात है। राजनीति में चमड़ी ही मोटी नहीं होती, ज़ुबान भी मोटी होती है।

रामगोपाल दीक्षित के गीत की ख़ुशबू मौजूद है, लेकिन आज कृषक, श्रमिक, नागरिक, कवि, शिक्षक और बुद्धिजीवियों की हालत क्या है? आज कृषक आंदोलन करते हैं तो उनकी राहों पर कीलें गाड़ी जाती हैं। सड़कें खोद दी जाती है और उन्हें सड़क पर मरने छोड़ दिया जाता है। सैकड़ों आंदोलन करते मर गए। श्रमिक की गर्दन पूँजीपतियों को थमा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि श्रमिकों का मिनिमन मेहनताना निर्धारित किया गया तो पूँजीपति उन्हें काम नहीं देंगे। और अन्य समूह लोभ, लालच और डर के चक्कर में हैं। सत्य की छाती पर असत्य नंगा नाच कर रहा है।

जन पत्रकारिता को समर्थन देने के लिए उपर्युक्त QR Code को स्कैन करके 20, 50 या 100 रुपये की सहायता राशि प्रदान कर सकते हैं।
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प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर

डॉ योगेन्द्र
डॉ योगेन्द्र

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग

पूर्व डीएसडब्ल्यू, ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

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