मैं जब सुबह टहल कर लौट रहा होता हूँ तो सड़क किनारे एक बूढ़ा को दो छोटी-छोटी डलिए में कभी बैंगन, तो कभी भिंडी लिए बैठा देखता हूँ। जाड़े में भी देखता था, गर्मी में भी देखता हूँ। बूढ़े की उम्र सत्तर से कम नहीं होगी। पता नहीं, उसे कितना मुनाफा होता है! जीने लायक़ पैसे होते हैं या नहीं? उसी सड़क पर जाड़े के दिनों में एक बहुत बड़ी किराने की दुकान खुली। मुश्किल से चार महीने हुए हैं। अब वहाँ मोटरसाइकिल और स्कूटर की हुजूम लगती रहती है। युवा कंधे पर फ्लिपकार्ट की बैग टाँगे और दौड़ते-भागते नज़र आते हैं। आप घर बैठे छोटे-छोटे सामान भी पा सकते हैं। छोटी पूँजी वाली दूकानें मंद होती जाती हैं और पसरते बाज़ार पर पूँजीपतियों का क़ब्ज़ा होता जा रहा है।
एक अपार्टमेंट के सामने एक औरत हर दिन सुबह सुबह खुले में चाय की दूकान लगाती है। आधे किलोमीटर दूर चौक पर हर दिन मज़दूर सड़क पर कुदाल-हँसिया लेकर बिकने के लिए खड़े रहते हैं। आस पड़ोस में ही देखता हूँ कि कितनी बड़ी आर्थिक खाई है! रघुवीर सहाय ने ‘राष्ट्रगीत’ शीर्षक से एक कविता लिखी है-
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है। मखमल टमटम बल्लम तुरही पगड़ी छत्र चंवर के साथ तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर जय-जय कौन कराता है। पूरब-पश्चिम से आते हैं नंगे-बूचे नरकंकाल सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है। कौन-कौन है वह जन-गण-मन अधिनायक वह महाबली डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज बजाता है।
आज मज़दूर दिवस है। अमेरिका का शिकागो शहर। मज़दूरों ने काम के घंटे को लेकर हड़ताल की। दिन था 1 मई 1886। शहर में बम के धमाके हुए और पुलिस ने हड़ताली मज़दूरों पर गोली चला दी। सात मज़दूर शहीद हो गए। हड़ताल लंबी चली, लेकिन अंततः मज़दूरों की जीत हुई। काम के 8 घंटे निर्धारित किए गए। छुट्टियों के भी अधिकार निर्धारित हुए और मज़दूरों को अन्य अधिकार भी मिले।
यह बात तो बहुत पुरानी हो गई। सच्चाई मुँह फाड़े चुनौती दे रही है। मज़दूरों की आज हालत क्या है? पूँजीपतियों के सामने सुप्रीम कोर्ट हाथ जोड़े खड़ा है। वह निर्णय दे रहा है कि अगर न्यूनतम मजदूरी तय कर दी गई तो पूँजीपति मज़दूरों को काम नहीं देंगे। यानी देश संविधान से नहीं, पूँजीपतियों के अनुसार चलेगा। आज पूँजीपतियों के बल्ले-बल्ले है। एक तो मशीनों के लगातार नवीनीकरण से मज़दूरों की संख्या घटती गई। जो भी मज़दूर कल-कारख़ानों में बचे, उन्हें कई स्तरों में बाँट दिया। उनमें विद्रोह की क्षमता बची नहीं। जो बिखरे हुए मज़दूर हैं, उनमें एकता की कोई संभावना नहीं है।
मज़दूरों की दुनिया आज कितनी बेबस है! खेती उजड़ गई, जंगल उजाड़े जा रहे हैं और कल- कारख़ाने भी स्वचालित बनते जा रहे हैं तो मज़दूर जायें तो कहाँ जाएँ? गोदान का नायक है होरी। होरी किसान था, मज़दूर बनकर मरा। उसका बेटा गोबर किसानी से ऊब कर शहर गया। वहाँ भी उसने सबकुछ खोया। सोलहवीं सदी में तुलसीदास लिखते हैं-
‘खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज न चाकर को चाकरी। जीविका-बिहीन लोग सीद्यमान, सोच-बस, कहैं एक एकन सों ‘कहॉं जाई, का करी?’
सोलहवीं सदी में भी ‘जीविका-बिहीन’ लोग खुद से सवाल करते थे- कहाँ जायें, क्या करें? आज भी पूरी दुनिया की कम से कम आधी जनसंख्या सोलहवीं सदी की तरह ही अनिश्चित जीवन जी रही है। दुनिया में कितनी तरह की क्रांति हुई, लेकिन आज भी ऊपर-ऊपर पीने वालों की संख्या बढ़ रही है। क्रांतियाँ अब तक सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं जुटा पाईं।

प्रोफेसर, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग
पूर्व डीएसडब्ल्यू,ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय,भागलपुर







