
" राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं।" इसी आलेख से

"भारतीय राजनीति में आदर्श और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष नया नहीं है। अनेक नेता सिद्धांतों की बात करते रहे हैं, लेकिन समय और परिस्थितियों के दबाव में उनके निर्णय बदलते रहे हैं। नीतीश कुमार का हालिया कदम भी शायद इसी राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा है।" - इसी आलेख से

नेता पति, पत्नी, बेटा, बेटी, समधी, समधन - सभी देश की सेवा के लिए न्यौछावर हो गये। देश इनका कृतज्ञ हैं। वे सेवा किए जा रहे हैं और देश सेवा नहीं ले पा रहा है। देश सेवा के लिए जगह कम है और देश सेवक बहुत हैं।