
दुनिया के अलग-अलग देशों में गहरी आर्थिक असमानता है और यह असमानता एक देश के भीतर अलग-अलग-क्षेत्रों और समुदायों में भी चिंताजनक रूप से व्याप्त है। यह आर्थिक असमानता शैक्षिक अवसरों की असमानता सृजित करती है और शैक्षिक असमानता सामाजिक-आर्थिक असमानता को पुनर्स्थापित करती है।

सड़कों के किनारे बसे हुए लोग केवल झुग्गी-झोपड़ियाँ ही नहीं खड़ी करते, बल्कि अपने लिए रोज़ी-रोजगार भी खड़े करते हैं। जब सरकार शहर की सफाई के नाम पर झोपड़ियों को उजाड़ती है तो केवल झोपड़ी नहीं उजड़ती है, बल्कि उन ग़रीबों का रोज़गार भी उजड़ता है।

जिस राज्य में महज 22% लोग ही किसी तरह पाँचवीं कक्षा तक पहुँच सके हों, एक तिहाई लोगों ने कभी स्कूल-कॉलेज का मुँह नहीं देखा हो और 21% बच्चे दसवीं कक्षा की चौखट तक पहुँचने के पहले ही स्कूल से बाहर हो जाते हों, वह राज्य तो मध्यकाल के किसी पिछड़े हुए असभ्य समाज की तस्वीर पेश करता है। वहाँ के लिए स्वास्थ्य, रोजगार, समृद्धि आदि की बात ही बेमानी है। - इसी आलेख से

जिस उदात्त सोच के साथ इस देश की संवैधानिक बुनियाद रखी गई थी, समय बीतने के साथ ही लगातार वह जर्जर होती गई। और, अब तो यकीन करना भी मुश्किल है कि यह वही देश है, स्वतन्त्रता के संघर्ष से निकले हुए तप:पूतों ने जिसका प्रस्ताव पास किया था।

यह शिक्षा नीति शिक्षकों के ‘प्राचीन सम्मान’ को लौटाने का वाचिक आश्वासन भले ही देती हो, शिक्षकों से एक स्पंदनशील शैक्षिक वातावरण के निर्माण की अपेक्षा भले ही करती हो, परंतु उनके वेतनमान पर चुप्पी साध लेती है, सेवाशर्तों को कमजोर बनाने की अनुशंसा करती है, उनके व्यक्तित्व के दब्बू होने का इंतजाम करती है और विद्यालीय परिवेश में उनके महत्व का अवमूल्यन करती है।

जब जोंक पूँजीपति खून चूसने में मशगूल होते हैं, राजसत्ता उन रक्त्जीवियों की हिफाजत में सन्नद्ध होती है और बुद्धिजीवी भी सत्ता के दरबार में सारंगी बजाकर चारण-गान करने में विभोर होते हैं तो घने अंधेरों में घिरे भूखे और अधनंगे लोग, रोशनी की तलाश में, सड़कों पर उतर आते हैं. दुनिया में अब तक जितनी भी क्रांतियाँ हुई हैं, वहाँ भी इसी तरह का फर्क रहा है. एक तरफ बेतहाशा अमीर रहे हैं और दूसरी तरफ अन्न और वस्त्र के लिए बिलबिलाते लोगों का हुजूम रहा है. और, इन दोनों के बीच खड़ी सत्ता अमीरों की तरफदारी में बिलबिलाते लोगों को क़ानून का पाठ पढ़ा-पढ़ाकर डंडे बरसाती रही है.