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हार के बाद क्यों शुरू होता है ‘आंतरिक लोकतंत्र’?

प्रस्तुत आलेख में चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हो रही टूट के बहाने भारत के राजनीतिक परिदृश्य की विवेचना की गयी है।

इन दिनों : निर्लज्जता और लोकतंत्र 

black and white human face drawing
"हर नेता कहता है कि मैं तो जनता का सेवक हूँ, लेकिन सच यह है कि वह जनता का शासक है। जीत के बाद सेवा का कोई मतलब नहीं होता। यह तो महज एक जुमला है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : संवैधानिक मताधिकार और चुनाव आयोग के ठहाके

एआई द्वारा निर्मित प्रतीकात्मक चित्र
"आज़ादी मिली तो भारतीयों को वयस्क मताधिकार मिला। संविधान ने गारंटी दी कि हर भारतीय को वोट देने का अधिकार है और सभी के वोट बराबर होंगे। संविधान के इस मूलभूत अधिकार को चुनाव आयोग ही नष्ट कर रहा है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बर्बर पशुता और खंडित मर्यादाओं के युग में

"क्या ईडी के ऐसे अफसरों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जो रेड डालते हैं और कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं कर पाते? क्या उनकी अफलातूनी कार्रवाई से सामान्य लोग परेशान नहीं होते और उनके मौलिक अधिकारों में क्या यह हस्तक्षेप नहीं है? ईडी की नासमझ कार्रवाई से ईडी पर गहरे सवाल हैं।" - सवाल, जो इस आलेख से निकलते हैं।