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इन दिनों : प्रकृति, असमय के मेघ और षडयंत्र

"मुड़वारा के बारे में तीन क़िस्से हैं, जिनमें से एक है अंग्रेज़ों और बाग़ियों से संबंधित। लोग सत्ता के ख़िलाफ़ बगावत न कर दें, इसके लिए अंग्रेज़ बाग़ियों के सिर काटकर टाँग देते थे। इसलिए इस स्थल का नाम मुड़वारा है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : कुछ ऐसा करें कि पड़ोसी का घर भी महक जाए

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"धूप से जले हुए मंजर धरती पर बिखरे पड़े हैं। कुछ दिन पूर्व पेड़ों के लाड़ले थे, अब उपेक्षित हैं। उपेक्षा टीस मारती है। जीवन को दग्ध करती है, लेकिन सीख भी देती है।" इसी आलेख से

इन दिनों : कमाबे लंगोटिया, खाय लंब धोतिया

" राजनीतिक दलों के लिए खून-पसीना बहाते हैं उसके कार्यकर्ता, मगर कार्यकर्ताओं पर नेताओं को भरोसा नहीं होता, इसलिए गोदाम में पड़े अपने पुत्र-पुत्रियों को धो-पोंछ कर व गाल पर पाउडर मल कर निकाल लाते हैं। और फिर उनके जयकारे लगने लगते हैं।" इसी आलेख से

इन दिनों : बुढ़ापा और जवानी: सौंदर्य और उदासी

"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से

इन दिनों : असंतुष्टों की जंग के शिकार

a couple of black birds sitting on top of a tree
"अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है।" इसी आलेख से

इन दिनों : सौंदर्य और स्वाभिमान

"जंगल और वनों को हमने नहीं बनाये। कुदरत ने करोड़ों पेड़ों का संवर्धन किया। जीव जंतु, झरने, नदियाँ। खूबसूरती। मगर दो टके के राजनेता और पूँजीपतियों ने इस खूबसूरती को उजाड़ा।" - इसी आलेख से