
"विरह और मिलन का क्रम ही तो जीवन है। कहाँ होता है विरह और मिलन? एक स्थल पर निर्धारित है मिलन भी और विरह भी। जीवन इसके संयोग से ही समृद्ध होता है।" इसी आलेख से

"अमानवीयता में कुरूपता है और संवेदना में सौंदर्य है। मनुष्य प्रकृति को खदेड़ता जा रहा है। वह जिसके कारण जीवित है, उसके खिलाफ ही युद्ध ठान रखा है।" इसी आलेख से

"जंगल और वनों को हमने नहीं बनाये। कुदरत ने करोड़ों पेड़ों का संवर्धन किया। जीव जंतु, झरने, नदियाँ। खूबसूरती। मगर दो टके के राजनेता और पूँजीपतियों ने इस खूबसूरती को उजाड़ा।" - इसी आलेख से