"तुलसीदास बहुत तंग हुए बनारस में। उनके समय से लेकर अब तक कितने मंदिर बने। आश्चर्य यह है कि मंदिर बनाने के लिए मुस्लिम बादशाहों ने जमीन दी। मगर एक बनावटी कथा में तुलसीदास के राम घिर गए। बाबरी मस्जिद में आधुनिक स्वार्थी राजनीतिक संतों ने राम को उलझा दिया।" - इसी आलेख से
आज डॉ० अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिवस है और बाबरी मस्जिद को ढाहने का दिवस भी। अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस के दिन बाबरी मस्जिद को ढाहने वाले आज भी झुग्गी-झोपड़ियों को ढाहते चले जा रहे हैं।
सुबह सूरज ठीक से उगा नहीं। सूरज पर कटे-कटे बादल छाये रहे। ठंड के कारण खिड़कियां बंद रहती हैं, इसलिए चिड़िया के स्वर सुनाई नहीं पड़े। खिड़कियों में लगे शीशे के बाहर सबकुछ शांत लगता है। आम, नारियल और महुगनी…
कुछ संत महिलाओं पर लगातार अभद्र टिप्पणियाँ कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। ये वही संत हैं, जो हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। ऐसा हिंदू राष्ट्र, जिसमें महिलायें मानवीय इकाई नहीं, एंजॉयमेंट का उपकरण होंगी।
"सच्चाई यह है कि दाढ़ी बढ़ाने या भगवा पहन कर टीका ललाट पर लगाने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता। मन धार्मिक होना चाहिए। यानी उसे मनुष्यता, करुणा और संवेदना में विश्वास होना चाहिए।" - इसी आलेख से
कहानी में कुछ ऐसा नहीं है, जो आकर्षित कर सके - न कथ्य, न शिल्प। लेकिन यह कुछ ऐसा है, जिसे बार-बार दुहराया गया है। इसीलिए बार-बार कहे जाने की जरूरत भी है। इसी जरूरत के कारण इसे फिर से कहा गया है। आप चाहें तो इसे फिर से पढ़ सकते हैं।
स्वामी विवेकानंद वेदांत लेकर विदेश पहुंचे थे, लेकिन उन्हें इस बात का गहरा अहसास था कि सभी धर्म एक ही राह के राही हैं। जब वे शिकागो में विश्व धर्म संसद में भाग ले रहे थे तो उन्होंने एक किस्सा…
"आजादी की लड़ाई में जाति थोड़ी दबी थी। एकजुटता का बोध बढ़ा था। आजादी के बाद की राजनीति ने जातियों को और गाढ़ा किया है और अब सिर पर नाच रहा है।" - इसी लेख से