Tag समाज

आप क्या चाहते हैं?

"जीवन अर्थवान है। इस अर्थ के वितरण की एक परिकल्पना है, पब्लिक पालिका। इस लोकतंत्र को एक चौथा मजबूत खंभा चाहिए, वह खंभा आर्थिक हो सकता है। पत्रकारिता तो दर्शक मात्र है। कहीं से सुनकर ख़बरें सुनाती है। आर्थिक अगर कोई खंभा होता तो सोचिए!" - इसी आलेख से।

नहीं मत मारो

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"हम मूर्ख हैं, या बनाये जा रहे हैं? अब तो समझ भी नहीं आता। कॉलेज के खुलने नहीं, बंद हो जाने के ढोल पीटे जा रहे हैं, क्योंकि अधर्मियों का दाखिला हो गया था। लगता तो है, हम मूर्ख हैं भी, और बनाये भी जा रहे हैं।" - इसी आलेख से

इन दिनों : डमरूवाद का घनचक्कर

"आर एस एस या बीजेपी के कार्यकताओं को हिन्दू एकता इसलिए चाहिए कि उनकी सत्ता कायम रहे। राम कथा वाचक भी जाति गिनते नजर आते हैं। उन्हें अपने ब्राह्मण होने पर बहुत गर्व है। इन लोगों को हिन्दू राष्ट्र चाहिए। इनके स्वभाव और विचार से ऐसा लगता है कि उन्हें ऐसा हिन्दू राष्ट्र चाहिए जिसमें जाति का वर्चस्व कायम रहे।" इसी आलेख से

हर कोई शास्त्री

"हम सबको मिलकर शिक्षा के बारे में सोचना ही होगा। एक ऐसी शिक्षा, जो जानवरों को ऐसा इंसान बना सके, जिसे जानवरों से भी सहानुभूति हो। यहाँ तो जानवरों के नाम पर भी भ्रष्टाचार चल रहा है, और नारे लग रहे हैं कि धर्म ख़तरे में है। होगा ही। जहाँ जीवन ख़तरे में हो, वहाँ धर्म पर दुधारी तलवार तो लटकती ही रहेगी।" - इसी आलेख से

सही सवाल

"हमारी समस्या ही यही है कि हम जवाब तलाश रहे हैं। और हमें सवाल ही पता नहीं होता। सही सवाल पूछेंगे, तभी तो सही जवाब तक पहुँचने की जिज्ञासा जागेगी।" - इसी आलेख से

इन दिनों : आजाद नस्लों पर मंडराते खतरे

"विदेशी कुत्ते विद्रोही नहीं होते। देशी कुत्ते झाँव-झाँव कर लेते हैं। विदेशी कुत्ते जितने मालिक के गुलाम होंगे, वे उतने ही सफल होंगे। उनकी सफलता गुलामी में है। बिना मेहनत के जो आदमी सफल होना चाहता है, उसमें विदेशी कुत्ते का गुण चाहिए।" - इसी आलेख से

इन दिनों : आदमी होने की कसौटी

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"मृत्यु सिर्फ देह की क्षय से नहीं होती। देह रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है। आपके अंदर का इंसान जैसे-जैसे छीजता जाता है, वैसे-वैसे आपकी मृत्यु होती जाती है। वह समाज मृत ही समझिए, जहाँ इंसानियत का टोटा पड़ जाता है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : जीने की कला में छेद

"हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक जाति और अनेक संस्कृतियाँ हैं। जो बहुल संस्कृति से प्यार करेगा, वही सच्चा भारतीय होगा।" इसी आलेख से

इन दिनों : बुद्धिखोरों की सड़ांध

"मुझे गर्व होता है कि मैं उस देश का वासी हूँ, जहाँ बुद्ध हुए हैं, लेकिन मुझे बुद्धिखोरों को लेकर शर्म आती है कि तात्कालिक लाभ के लिए इन्होंने अपने को गिरवी रख दिया है।" - इसी आलेख से

इन दिनों : बदलते वक्त में बेचैन चेतना

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"सुख कब दुख में बदल जाता है, कहा नहीं जा सकता। देह बहुत सुखी हुआ तो डायबिटीज, ब्ल्डप्रेशर, कैंसर। मन को ज्यादा सुख मिला तो अकेलापन।" - इसी आलेख से