“वंदे मातरम्” भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह उद्घोष है, जिसने गुलामी के अंधकार में राष्ट्र की चेतना को जगाया। यह वही स्वर है, जो जेलों में गूँजा, जो फाँसी के तख्तों तक गया और जिसने औपनिवेशिक सत्ता की नींव हिला दी। इसके बावजूद, या शायद इसी कारण, यह गीत समय-समय पर विवाद के केंद्र में रहा है। सवाल यह नहीं कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है या नहीं—सवाल यह है कि इसके विरोध को किस दृष्टि से देखा जाए।
इतिहास गवाही देता है कि “वंदे मातरम्” का विरोध किसी एक समुदाय की सामूहिक देश-विरोधी मानसिकता का परिणाम नहीं था। मुख्य आपत्ति गीत के उन अंशों को लेकर थी, जिनमें मातृभूमि को देवी-रूप में प्रस्तुत किया गया है। कुछ मुस्लिम संगठनों और धार्मिक विद्वानों का तर्क था कि धार्मिक प्रतीकों को राष्ट्रीय अनिवार्यता बनाना उनकी आस्था से टकराता है। इसीलिए उन्होंने पूरे गीत के बजाय उसके पहले दो अंतरों को—जो प्रकृति, भूमि और राष्ट्र की प्रशंसा तक सीमित हैं—स्वीकार्य माना।
राजनीतिक धरातल पर मुस्लिम लीग का विरोध भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वह इसे कांग्रेस-नेतृत्व वाले राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक प्रतीक मानती थी और आशंकित थी कि बहुसंख्यक प्रतीक अल्पसंख्यक पहचान पर दबाव बनेंगे। यह असहमति राष्ट्र से नहीं, बल्कि राष्ट्र की परिकल्पना से जुड़ी थी।
विडंबना यह है कि जिस गीत पर आज देशभक्ति की कसौटी तय की जाती है, उसी से औपनिवेशिक सरकार सबसे अधिक भयभीत थी। ब्रिटिश सत्ता ने “वंदे मातरम्” के गायन पर प्रतिबंध लगाए, क्योंकि यह नारा उनके लिए विद्रोह और प्रतिरोध का पर्याय बन चुका था।
राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस विवाद को टकराव की दिशा में नहीं जाने दिया। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा कि पहले दो अंतरों में कोई धार्मिक बाध्यता नहीं है और वे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत हैं। जवाहरलाल नेहरू इसके ऐतिहासिक महत्व के समर्थक थे, पर किसी भी प्रतीक को ज़बरदस्ती थोपने के विरोधी। अंततः संविधान सभा ने संतुलन का मार्ग चुना—’जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया, वह भी उसके सर्वमान्य अंशों के साथ।
आज समस्या इतिहास की नहीं, उसकी राजनीतिक व्याख्या की है। बीते वर्षों में सत्तारूढ़ राजनीति ने “वंदे मातरम्” जैसे सांस्कृतिक प्रतीक को राजनीतिक निष्ठा की कसौटी में बदलने की कोशिश की है। विशेषकर भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों ने इस गीत को बार-बार ऐसे प्रस्तुत किया, मानो इसके उच्चारण से ही राष्ट्रभक्ति प्रमाणित हो जाती हो और असहमति अपने आप संदिग्ध हो जाती हो। यह दृष्टिकोण न इतिहाससम्मत है, न लोकतांत्रिक।
विडंबना यह है कि जो दल आज “वंदे मातरम्” को अनिवार्य भाव से थोपने की मुद्रा में दिखता है, वह स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन के उस सांस्कृतिक प्रवाह का वाहक नहीं रहा, जिसमें यह गीत जन्मा और पला। राष्ट्रवाद की विरासत को हथियाने की यह प्रवृत्ति असल में इतिहास के सरलीकरण और चयनात्मक स्मृति का परिणाम है।
देशभक्ति को नारे और प्रतीकों तक सीमित कर देना—और फिर उन्हें राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना—लोकतंत्र को कमजोर करता है। भाजपा की राजनीति में “वंदे मातरम्” अक्सर संवाद का सेतु नहीं, बल्कि विभाजन की रेखा बनकर उभरा है। इससे न तो राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होती है, न विविधता में एकता की भारतीय परंपरा।
“वंदे मातरम्” की शक्ति उसकी स्वाभाविकता में है—उस स्मृति में है जब यह गुलामी के खिलाफ संघर्ष का गीत था, किसी सत्ता का आदेश नहीं। उसे राजनीतिक वफादारी का प्रमाणपत्र बना देना न बंकिमचंद्र के साथ न्याय है, न स्वतंत्रता संग्राम की विरासत के साथ।
निष्कर्ष स्पष्ट है: “वंदे मातरम्” न तो किसी दल की बपौती है, न वफादारी की परीक्षा। वह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की साझा धरोहर है—और धरोहरें प्रचार से नहीं, लोकतांत्रिक विवेक और सम्मान से जीवित रहती हैं।

शिक्षक, भौतिक बिज्ञान
कोषाध्यक्ष, बिहार राज्य समिति, एटक







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